बाइबल व्याख्या

सभोपदेशक 3:11

बाइबल
यह वचन YGC PENTECOSTAL CHURCH OF GOD द्वारा समर्पित है

पाठ

"अपने-अपने समय पर वे सुन्दर होते हैं।" यही वह वाक्य है जिससे यह आयत खुलती है: परमेश्वर ने हर चीज़ को ऐसा गढ़ा कि वह अपने ठीक क्षण में ठीक बैठती है, जैसे पकी हुई फ़सल कटाई के दिन। उसके बाद एक ऐसी बात आती है जो मनुष्य को बेचैन कर देती है: उसी परमेश्वर ने मनुष्य के मन में "अनादि-अनन्तकाल का ज्ञान" डाल दिया है, यानी समय के पार देखने की प्यास। और फिर तीसरा वाक्य, जो पहले दोनों को कसकर बाँध देता है: इतना सब होने पर भी मनुष्य परमेश्वर के काम को "आदि से अन्त तक" समझ नहीं सकता। सुन्दरता है, तड़प है, पर पूरा नक्शा हाथ में नहीं है।

मूल

यह आयत दो बातें एक साथ कहती है जिन्हें हम आमतौर पर अलग रखना चाहते हैं। पहली: सृष्टि बेतरतीब नहीं है, हर समय का अपना सौंदर्य है, यहाँ तक कि रोने और छाती पीटने के समय का भी (पद 4)। दूसरी: उस क्रम को पूरा पढ़ लेने की क्षमता हमें नहीं दी गई। यह कोई दुर्घटना नहीं, परमेश्वर का जानबूझकर किया हुआ निर्णय है। अनन्तता की भूख हमारे भीतर रखी गई है ताकि हम मिट्टी और पेट से आगे देखें, और साथ ही सीमा भी रखी गई है ताकि हम स्वयं को परमेश्वर न समझ बैठें। यहीं से पद 14 का निष्कर्ष निकलता है: "परमेश्वर ऐसा इसलिए करता है कि लोग उसका भय मानें।" भय, यानी वह विनम्र श्रद्धा जो न समझ पाने पर भी भरोसा करना सीखती है। यह आयत हमें ज्ञान नहीं, स्थान देती है: सृष्टिकर्ता के सामने प्राणी का स्थान।

सूत्र

बाइबल की बड़ी कहानी में यह आयत एक खुला प्रश्नचिह्न है, और नया नियम उसे बन्द नहीं करता, वह उसे भर देता है। सभोपदेशक कहता है: हर चीज़ अपने समय पर सुन्दर, पर पूरा नक्शा तुम्हारे हाथ में नहीं। पौलुस लिखते हैं कि जब समय पूरा हुआ, तब परमेश्वर ने अपने पुत्र को भेजा। यानी वह "ठीक समय" कोई अमूर्त सिद्धान्त नहीं रहा, वह एक तारीख़, एक गाँव, एक जन्म बन गया। और ध्यान दीजिए: उस समय में जो सबसे सुन्दर था, वह देखने में सबसे कुरूप लगा, एक क्रूस। आदि से अन्त तक वहाँ भी किसी ने नहीं समझा; शिष्य भागे, स्त्रियाँ रोईं। मसीह में परमेश्वर हमें सब कुछ समझा नहीं देते, वे स्वयं हमारे समय के भीतर उतर आते हैं। समझ की जगह संगति मिलती है।

दर्पण

आप शायद इस समय किसी ऐसी चीज़ के बीच में हैं जिसका कोई सिरा दिखाई नहीं देता: एक नौकरी जो तीन साल से जहाँ की तहाँ है, एक रिश्ता जो न टूटता है न जुड़ता, एक रिपोर्ट जिसका नतीजा अगले हफ़्ते आएगा, एक बच्चा जो अब बात नहीं करता। और भीतर वह ज़िद बैठी है जो इस आयत ने उजागर की: मुझे समझना है, अभी, पूरा। यह ज़िद पाप नहीं, यह वही अनन्तता की भूख है जो परमेश्वर ने डाली। पर जब हम उस भूख को नियन्त्रण में बदल देते हैं, तो हम रात को छत ताकते हैं और दिन में चिड़चिड़े रहते हैं। यह आयत आपसे जिज्ञासा नहीं छीनती, वह आपसे सर्वज्ञता का दावा छीनती है।

आज ही एक काग़ज़ पर वह एक प्रश्न लिखिए जिसका उत्तर आपको नहीं मिल रहा, उसके नीचे लिखिए "इसका समय आपके हाथ में है", उसे ज़ोर से परमेश्वर के सामने पढ़िए, और काग़ज़ को दराज़ में रखकर बन्द कर दीजिए।

श्रोता

जिन लोगों ने ये शब्द पहली बार सुने, वे किसी बड़े साम्राज्य के नागरिक नहीं थे। वे यरूशलेम और उसके आसपास के छोटे से प्रान्त में रहते थे, फ़ारसी राज के अधीन, कर देते हुए, एक ऐसे मन्दिर के साये में जो पुराने वैभव की धुँधली नक़ल था। उनका समय घड़ी से नहीं, बरसात से नापा जाता था: जौ की कटाई, अंजीर का पकना, सूखे का डर, बच्चों की मौत जो असामान्य नहीं थी। इसी माहौल में ज्ञान-शिक्षक कहते थे कि सही समय पहचान लो तो जीवन सध जाएगा। सभोपदेशक उसी दावे पर हाथ रखता है: समय तो है, पर उसका पूरा पाठ तुम नहीं पढ़ सकते। यह उनके लिए ठण्डा दर्शन नहीं था, यह उस किसान की राहत थी जिसकी फ़सल ओले ने मारी और जिसे अब यह साबित नहीं करना पड़ता कि यह उसका पाप था।

बारीकी

"अनादि-अनन्तकाल" के पीछे इब्रानी शब्द है ओलाम, जिसका अर्थ है वह दूरी जहाँ तक नज़र जाती है और उससे आगे भी; न केवल भविष्य, बल्कि सुदूर अतीत भी। परमेश्वर ने यही क्षितिज मनुष्य के मन में रख दिया। इसलिए हम कब्र पर पत्थर लगाते हैं, नाम लिखवाते हैं, बच्चों को कहानियाँ सुनाते हैं, और मरने के बाद भी याद रहना चाहते हैं। पशु ऐसा नहीं करते, और पद 19 में सभोपदेशक बेरहमी से याद दिलाता है कि साँस तो एक सी है। फ़र्क़ यही है: हमारे भीतर एक ऐसी खिड़की है जो मिट्टी से बाहर खुलती है, पर उसके शीशे पर धुन्ध है। यह वरदान और घाव, दोनों एक साथ है।

मुख्य पात्र

इस आयत में सक्रिय केवल एक ही है: परमेश्वर। वे बनाते हैं, वे समय ठहराते हैं, वे मन में अनन्तता डालते हैं, और वे ही समझ को सीमित रखते हैं। यह कोई दूर बैठा उदासीन देवता नहीं है; जो व्यक्ति उदासीन होता है वह भूख नहीं जगाता। पर यह वह परमेश्वर भी नहीं है जो हर बात का कारण हमें रसीद की तरह थमा दे। वे सुन्दरता देते हैं और व्याख्या रोक लेते हैं। हमारे लिए यह कठोर लगता है, जब तक हम यह न देखें कि एक पिता अपने छोटे बच्चे को पूरा हिसाब नहीं, अपना हाथ देता है। पद 13 में यही परमेश्वर खाना, पीना और परिश्रम का सुख "दान" कहकर हमारे सामने रखते हैं। जो समझा नहीं सकते, वे उसे थामे रहते हैं।

चिन्तन के प्रश्न

आपके जीवन का कौन-सा हिस्सा अभी "अपने समय पर सुन्दर" नहीं लगता, और उसे न समझ पाने की बेचैनी आप किस तरह व्यक्त करते हैं: क्रोध, व्यस्तता, या चुप्पी?

अनन्तता की जो भूख परमेश्वर ने आपके भीतर रखी है, वह इन दिनों किन चीज़ों से भरने की कोशिश कर रही है?

Ecclesiastes में और गहराई से जानें

चुनी हुई पुस्तकें जो इस बाइबल पुस्तक को और गहराई से समझाती हैं।

Living Life Backward

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How Ecclesiastes teaches you to live well by keeping the end in view.

The Message of Ecclesiastes

Derek Kidner

A short, sane guide through the Preacher's search for meaning.

Ecclesiastes: An Introduction and Commentary

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Ecclesiastes, Song of Songs

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Ecclesiastes 3:11 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

सभोपदेशक 3:11 का क्या अर्थ है?
"अपने-अपने समय पर वे सुन्दर होते हैं।" यही वह वाक्य है जिससे यह आयत खुलती है: परमेश्वर ने हर चीज़ को ऐसा गढ़ा कि वह अपने ठीक क्षण में ठीक बैठती है, जैसे पकी हुई फ़सल कटाई के दिन। उसके बाद एक ऐसी बात आती है जो मनुष्य को बेचैन कर देती है: उसी परमेश्वर ने मनुष्य के मन में "अनादि-अनन्तकाल का ज्ञान" डाल दिया है, यानी समय के पार देखने की प्यास। और फिर तीसरा वाक्य, जो पहले दोनों को कसकर बाँध देता है: इतना सब होने पर भी मनुष्य परमेश्वर के काम को "आदि से अन्त तक" समझ नहीं सकता। सुन्दरता है, तड़प है, पर पूरा नक्शा हाथ में नहीं है।
सभोपदेशक 3:11 किस विषय में है?
बाइबल की बड़ी कहानी में यह आयत एक खुला प्रश्नचिह्न है, और नया नियम उसे बन्द नहीं करता, वह उसे भर देता है। सभोपदेशक कहता है: हर चीज़ अपने समय पर सुन्दर, पर पूरा नक्शा तुम्हारे हाथ में नहीं। पौलुस लिखते हैं कि जब समय पूरा हुआ, तब परमेश्वर ने अपने पुत्र को भेजा। यानी वह "ठीक समय" कोई अमूर्त सिद्धान्त नहीं रहा, वह एक तारीख़, एक गाँव, एक जन्म बन गया। और ध्यान दीजिए: उस समय में जो सबसे सुन्दर था, वह देखने में सबसे कुरूप लगा, एक क्रूस। आदि से अन्त तक वहाँ भी किसी ने नहीं समझा; शिष्य भागे, स्त्रियाँ रोईं। मसीह में परमेश्वर हमें सब कुछ समझा नहीं देते, वे स्वयं हमारे समय के भीतर उतर आते हैं। समझ की जगह संगति मिलती है।
सभोपदेशक 3:11 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
आज ही एक काग़ज़ पर वह एक प्रश्न लिखिए जिसका उत्तर आपको नहीं मिल रहा, उसके नीचे लिखिए "इसका समय आपके हाथ में है", उसे ज़ोर से परमेश्वर के सामने पढ़िए, और काग़ज़ को दराज़ में रखकर बन्द कर दीजिए।
सभोपदेशक 3:11 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
"अनादि-अनन्तकाल" के पीछे इब्रानी शब्द है ओलाम, जिसका अर्थ है वह दूरी जहाँ तक नज़र जाती है और उससे आगे भी; न केवल भविष्य, बल्कि सुदूर अतीत भी। परमेश्वर ने यही क्षितिज मनुष्य के मन में रख दिया। इसलिए हम कब्र पर पत्थर लगाते हैं, नाम लिखवाते हैं, बच्चों को कहानियाँ सुनाते हैं, और मरने के बाद भी याद रहना चाहते हैं। पशु ऐसा नहीं करते, और पद 19 में सभोपदेशक बेरहमी से याद दिलाता है कि साँस तो एक सी है। फ़र्क़ यही है: हमारे भीतर एक ऐसी खिड़की है जो मिट्टी से बाहर खुलती है, पर उसके शीशे पर धुन्ध है। यह वरदान और घाव, दोनों एक साथ है।
सभोपदेशक 3:11 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
आपके जीवन का कौन-सा हिस्सा अभी "अपने समय पर सुन्दर" नहीं लगता, और उसे न समझ पाने की बेचैनी आप किस तरह व्यक्त करते हैं: क्रोध, व्यस्तता, या चुप्पी?
हमारे साझेदारों के सहयोग से संभव

Ecclesiastes 3 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 4

रोने का समय और हँसने का समय; छाती पीटने का समय और नाचने का समय।" परमेश्वर ने आँसुओं को भी एक समय दिया है, उन्हें जल्दी पोंछ देने का दबाव तुझ पर नहीं है। जब दुख आए, उसे जी ले। और जब आनंद लौटे, तो बिना अपराधबोध के नाच। दोनों उसी के हाथ से आते हैं।

प्रार्थना संपादकीय पर पद 18

पिता, तू जानता है कि मैं कितना छोटा हूँ। मेरी साँस भी तेरी दी हुई है, और फिर भी मैं अक्सर खुद को बड़ा समझ बैठता हूँ। मुझे नम्र बना, ताकि मैं सच देख सकूँ कि मैं तेरे हाथों की रचना हूँ, और इसी में चैन पाऊँ।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 13

रोटी खाना, पानी पीना, दिन भर के काम में मन लगना, ये इतनी छोटी बातें लगती हैं कि हम इनके लिए धन्यवाद देना भूल जाते हैं। पर सुलैमान कहता है, "और यह भी कि प्रत्येक मनुष्य खाए और पीए और अपने सब परिश्रम में सुख भोगे; यह परमेश्वर का दान है।" ध्यान दो, खाना दान नहीं, खाने का स्वाद लेना दान है। बहुतों के पास थाली भरी है, पर मन खाली। आज तेरी थाली के सामने बैठकर पूछ: क्या मैं इसका आनन्द ले पा रहा हूँ?

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 19

कब्र के सामने हमारी सारी उपाधियाँ चुप हो जाती हैं। सभोपदेशक कहता है, "दोनों की श्वास एक सी है, और मनुष्य पशु से कुछ बढ़कर नहीं।" यह हमें छोटा करने के लिए नहीं, बल्कि सच्चाई पर लाने के लिए कहा गया है। जो श्वास तू आज ले रहा है, वह तेरी कमाई नहीं, उधार है। तो फिर आज किसके सामने अकड़कर चल रहा है?

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