सभोपदेशक 3
समय की उस लय में
"जन्म का समय, और मरण का भी समय।" यह पंक्ति इतनी परिचित है कि हम इसके ऊपर से फिसल जाते हैं, मानो कोई कविता हो जिसे शादियों और अंत्येष्टियों में पढ़ा जाता है। परन्तु सभोपदेशक इसे कविता के रूप में नहीं लिख रहा। वह एक कठोर सत्य को सुन्दर लय में बाँध रहा है: आपके जीवन का हर मोड़ पहले से ही किसी समय-रेखा में जड़ा हुआ है, और उस रेखा को आपने नहीं खींचा। चौदह जोड़े, अट्ठाईस समय, एक पूरा जीवन-चक्र, और आप उसमें बहते हुए एक पत्ते जैसे हैं।
पाठ
तीसरा अध्याय एक प्रसिद्ध कविता से खुलता है, जो जीवन के हर अनुभव, जन्म और मृत्यु, रोना और हँसना, चुप्पी और बोलना, को उनके नियत समय में रखती है। फिर सभोपदेशक इस पर विचार करता है कि परमेश्वर ने अनन्तकाल का ज्ञान मनुष्य के मन में डाला है, फिर भी वह उसके कामों को समझ नहीं सकता। अन्त में वह न्याय की विकृति और मनुष्य तथा पशु की समान नियति पर सोचता है।
हृदय की बात
इस अध्याय का धड़कता हुआ हृदय पद ग्यारह में है: "उसने सब कुछ ऐसा बनाया कि अपने-अपने समय पर वे सुन्दर होते हैं; फिर उसने मनुष्यों के मन में अनादि-अनन्तकाल का ज्ञान उत्पन्न किया है, तो भी जो काम परमेश्वर ने किया है, वह आदि से अन्त तक मनुष्य समझ नहीं सकता।" यहाँ मनुष्य होने की पूरी पीड़ा एक वाक्य में समा गई है। हमारे भीतर अनन्त की एक खिड़की है, हम पूरे चित्र की तलाश करते हैं, आदि से अन्त तक; परन्तु हमें एक-एक क्षण ही दिया जाता है, टुकड़ों में, बिना संदर्भ के। परमेश्वर ने हमें इतना बड़ा बनाया कि हम कम में तृप्त न हों, और इतना छोटा कि हम पूरा न समझ सकें।
बड़ी कथा से जोड़
सभोपदेशक की यह ईमानदार निराशा मसीह में एक अप्रत्याशित उत्तर पाती है। जब पौलुस गलातियों में लिखता है कि "समय की पूर्णता पर परमेश्वर ने अपने पुत्र को भेजा," तब वह ठीक इसी शब्दावली को उठा रहा है, समय, नियत क्षण। सभोपदेशक कहता है कि हर काम का एक समय है, परन्तु वह उस समय को नहीं देख सकता जिसमें सारा अर्थ एकत्र होगा। मसीह का देहधारण वह क्षण है जिसमें अनादि-अनन्तकाल स्वयं समय में प्रवेश करता है। जो ज्ञान परमेश्वर ने मनुष्य के मन में डाला था, अनन्त की वह भूख, वह भूख अन्ततः किसी अवधारणा से नहीं, बल्कि एक व्यक्ति से भरती है।
दर्पण
यह पाठ आपको वहाँ छूता है जहाँ आप नियंत्रण खोते हैं। आप अपनी संतान के लिए योजना बनाते हैं, और बीमारी आ जाती है। आप विवाह में सिलाई कर रहे हैं, और कोई फाड़ने का समय शुरू हो गया है। आपकी नौकरी, जिसमें आपने बीस साल दिए, अचानक "फेंक देने" के समय में आ जाती है। सभोपदेशक आपको सिखाने नहीं आया कि आप कैसे नियंत्रण पा सकते हैं; वह आपसे कह रहा है कि आपके पास वह नियंत्रण कभी था ही नहीं। और यह विचित्र रूप से मुक्तिदायक है। क्योंकि यदि हर समय परमेश्वर के हाथ में है, तो आपको आदि से अन्त तक समझने का बोझ भी नहीं उठाना है। आज खाइए, पीजिए, अपने काम में आनन्दित होइए; यही आपका भाग है।
पहले सुननेवाले
प्राचीन इस्राएल का श्रोता इन शब्दों को ऐसी संस्कृति में सुनता था जहाँ जीवन का अर्थ स्पष्ट माना जाता था: व्यवस्था का पालन करो, समृद्धि पाओ; पाप करो, दण्ड पाओ। सभोपदेशक इस साफ-सुथरे समीकरण को तोड़ता है। वह कहता है, न्याय के स्थान में दुष्टता होती है, धर्मी और दुष्ट दोनों एक ही मिट्टी में लौटते हैं। यह किसी भी धार्मिक व्यक्ति के लिए झटका था, और आज भी है। परन्तु उन श्रोताओं के लिए, जो मन्दिर की व्यवस्था और परमेश्वर के भय में पले-बढ़े थे, पद चौदह की पंक्ति एक लंगर थी: "जो कुछ परमेश्वर करता है वह सदा स्थिर रहेगा।" संसार अस्थिर है; परमेश्वर का कार्य नहीं।
मुख्य पात्र
यहाँ मुख्य पात्र स्वयं परमेश्वर है, परन्तु एक ऐसे रूप में जिसे हम कम पहचानते हैं: समय का स्वामी, जो प्रत्येक क्षण को उसकी जगह पर रखता है और फिर भी उसे मनुष्य से छिपाए रखता है। यह वह परमेश्वर नहीं है जो अपनी योजनाएँ हमारे कैलेंडर में लिख देता है। यह वह परमेश्वर है जिसकी उपस्थिति मृत्यु के समय में उतनी ही सच्ची है जितनी जन्म के समय में, बैर के समय में उतनी ही जितनी प्रेम के समय में। पद सत्रह में सभोपदेशक कहता है, "परमेश्वर धर्मी और दुष्ट दोनों का न्याय करेगा।" जो अभी छिपा है, वह छिपा नहीं रहेगा। समय का स्वामी न्याय का भी स्वामी है, और इसी में हमारा विश्राम है।
अन्य शास्त्र-वचन
भजन नब्बे इसी विषय पर ध्यान करता है: "हमारी आयु के दिन सत्तर वर्ष के होते हैं… तू हमें ऐसी बुद्धि दे कि हम अपने दिनों को गिनते जाएँ।" मूसा भी समय की छोटी लय के सामने खड़ा होता है और वही प्रार्थना करता है जो सभोपदेशक कर रहा है, यद्यपि शब्दों में नहीं: हमें इस क्षण में जीना सिखा। और यीशु पहाड़ी उपदेश में यह लय प
पढ़ने योग्य मसीही पुस्तकें
आपकी भाषा में उपलब्ध, सावधानी से चुनी गई पुस्तकें।
अगस्तीन की व्यक्तिगत साक्षी परमेश्वर की अनुग्रह से बदलने वाली शक्ति को गहराई से प्रकट करती है।
चालीस दिनों की यह यात्रा आपको परमेश्वर के दिए जीवन-उद्देश्य को खोजने और जीने में सहायता करती है।
परमेश्वर की उपस्थिति का अभ्यास
रसोई में सेवा करते हुए भी परमेश्वर के साथ निरंतर संगति करने की सरल कला यह पुस्तक सिखाती है।
नाज़ी यातना-शिविर में भी क्षमा और विश्वास की यह सच्ची साक्षी परमेश्वर की विश्वासयोग्यता की गवाही देती है।
प्रतिदिन के भक्ति-लेख यीशु की कोमल आवाज़ सुनने और उसकी शांति में विश्राम पाने में सहायता करते हैं।
एक Amazon Associate के रूप में, Faith.network योग्य खरीदारी से आय अर्जित करता है। इससे मंच निःशुल्क बना रहता है।
Ecclesiastes 3 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
सभोपदेशक 3 का क्या अर्थ है?
सभोपदेशक 3 किस विषय में है?
सभोपदेशक 3 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
सभोपदेशक 3 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
सभोपदेशक 3 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Ecclesiastes 3 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पिता, तू जानता है कि मैं कितना छोटा हूँ। मेरी साँस भी तेरी दी हुई है, और फिर भी मैं अक्सर खुद को बड़ा समझ बैठता हूँ। मुझे नम्र बना, ताकि मैं सच देख सकूँ कि मैं तेरे हाथों की रचना हूँ, और इसी में चैन पाऊँ।
रोटी खाना, पानी पीना, दिन भर के काम में मन लगना, ये इतनी छोटी बातें लगती हैं कि हम इनके लिए धन्यवाद देना भूल जाते हैं। पर सुलैमान कहता है, "और यह भी कि प्रत्येक मनुष्य खाए और पीए और अपने सब परिश्रम में सुख भोगे; यह परमेश्वर का दान है।" ध्यान दो, खाना दान नहीं, खाने का स्वाद लेना दान है। बहुतों के पास थाली भरी है, पर मन खाली। आज तेरी थाली के सामने बैठकर पूछ: क्या मैं इसका आनन्द ले पा रहा हूँ?
कब्र के सामने हमारी सारी उपाधियाँ चुप हो जाती हैं। सभोपदेशक कहता है, "दोनों की श्वास एक सी है, और मनुष्य पशु से कुछ बढ़कर नहीं।" यह हमें छोटा करने के लिए नहीं, बल्कि सच्चाई पर लाने के लिए कहा गया है। जो श्वास तू आज ले रहा है, वह तेरी कमाई नहीं, उधार है। तो फिर आज किसके सामने अकड़कर चल रहा है?
गले लगाने का समय, और गले लगाने से रुकने का समय।" सुलैमान प्यार को मना नहीं कर रहा, वह कह रहा है कि प्यार के भी दो हाथ होते हैं। कभी बच्चे को सीने से लगाना प्यार है, कभी उसे जाने देना प्यार है। कभी चुपचाप पास बैठना, कभी थोड़ी दूरी दे देना। क्या तुम पहचान पाते हो कि आज परमेश्वर तुमसे कौन सा समय माँग रहा है?
इस अंश को किसी और स्तर पर देखें
शुरुआती, धर्मशास्त्री, या कोई अलग लंबाई? सेटिंग्स बदलें और अपना संस्करण बनाएँ।
अध्ययन टूल में खोलें
