निर्गमन 23:26
पाठ
यह एक वाक्य है जो शरीर के बारे में है, गर्भ के बारे में, और उन वर्षों के बारे में जो कोई जीता है: "तेरे देश में न तो किसी का गर्भ गिरेगा और न कोई बाँझ होगी; और तेरी आयु मैं पूरी करूँगा।" इससे ठीक पहले की पंक्ति बताती है कि यह वचन किस बात से जुड़ा है, अपने परमेश्वर यहोवा की उपासना से; और वहीं कहा गया है कि वे अन्न और जल पर आशीष देंगे और रोग दूर करेंगे। तो यहाँ तीन चीज़ें एक साथ बाँधी गई हैं: भोजन, संतान, और जीवन की लम्बाई। यानी वह सब कुछ जिसकी चिन्ता एक किसान परिवार सुबह उठते ही करता है।
मूल बात
ध्यान दें कि परमेश्वर यहाँ कोई आत्मिक इनाम नहीं, बल्कि दूध, गेहूँ, बच्चे और बुढ़ापा देने का वादा करते हैं। वाचा का परमेश्वर उन जगहों पर अधिकार जताते हैं जहाँ मनुष्य सबसे कम नियंत्रण रखता है: गर्भ के भीतर और आयु के अंत में। प्राचीन संसार में यही दोनों क्षेत्र प्रजनन-देवताओं के थे; लोग बाल और अशेरा की मूर्तियों के सामने बच्चों और फ़सल के लिए झुकते थे। इसलिए पद 24 में मूर्तियों को तोड़ने की आज्ञा और पद 26 का यह वादा एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। परमेश्वर कह रहे हैं: जो तुम कहीं और माँगने जाते हो, वह मेरे हाथ में है। और यह लेन-देन नहीं है, यह वाचा है; आशीष उपासना का वेतन नहीं, उस रिश्ते का स्वाभाविक फल है जिसमें जीवन का स्रोत स्वयं उपस्थित रहता है।
सूत्र
व्यवस्थाविवरण में यही वादा और विस्तार से दोहराया गया है, और फिर इस्राएल का पूरा इतिहास इसी वादे के साथ जूझता हुआ आगे बढ़ता है। सारा, रिबका, हन्ना, इलीशिबा; हर बार बाँझपन उस स्त्री के दरवाज़े पर आकर खड़ा होता है जिसके द्वारा परमेश्वर वंश को आगे ले जाना चाहते हैं, और हर बार वे गर्भ को खोलते हैं। यह पैटर्न संयोग नहीं है। बाइबल बार-बार दिखाती है कि जीवन कहीं और से नहीं, परमेश्वर से आता है, और वह अंततः एक ऐसे गर्भ में पहुँचता है जो पूरी तरह उनके वचन पर खुलता है। यीशु मसीह उस वादे को न रद्द करते हैं न सस्ता बनाते हैं; वे उसे उस जगह तक खींच ले जाते हैं जहाँ मृत्यु स्वयं हार जाती है। "तेरी आयु मैं पूरी करूँगा" का अंतिम अर्थ खाली कब्र के सामने खुलता है।
दर्पण
अब ईमानदारी का क्षण। यह पद आपको कहीं चुभता है, क्योंकि आप ऐसे लोगों को जानते हैं, शायद आप स्वयं वे हैं, जिनके यहाँ गर्भ गिरा है, जिनकी गोद खाली रही, जिनका बेटा तीस साल में चला गया। और उपासना में कोई कमी नहीं थी। यह वादा एक ऐसी जाति को दिया गया था जो एक देश में वाचा के अधीन जी रही थी, यह हर व्यक्ति के लिए बीमा-पत्र नहीं है; पर यह कहकर दर्द कम नहीं होता। सवाल यह है कि उस खालीपन में आप किसके पास जाते हैं। आज भी प्रजनन-देवता मौजूद हैं, बस नाम बदल गए हैं: रिपोर्ट, नुस्खे, बचत, बीमा, वे सब जिनके सामने हम चुपचाप झुकते हैं ताकि जीवन हमारे नियंत्रण में रहे। पद 24 और पद 26 आपको दोनों बातें एक साथ देते हैं: मूर्तियाँ तोड़ो, और जीवन उनसे माँगो जिनके हाथ में वह सचमुच है। आज यह करें: कागज़ पर उस एक चीज़ का नाम लिखें जिसके लिए आप सबसे ज़्यादा डरते हैं कि वह आपके हाथ से निकल जाएगी, और उसी कागज़ पर नीचे लिखें, "यह आपके हाथ में है," फिर उसे ज़ोर से पढ़कर परमेश्वर को सौंप दें।
प्रसंग
यह वचन सीनै पर्वत के नीचे दिया गया, उस संहिता के अंत में जिसे वाचा की पुस्तक कहा जाता है। अभी-अभी मिस्र से निकले लोग रेगिस्तान में खड़े हैं, उनके पीछे गुलामी है और आगे कनान, एक ऐसा देश जिसे वे जानते नहीं। वे खेती पर जीने वाले बनने जा रहे हैं, और कनान में वर्षा अनिश्चित है, ज़मीन ढलानदार, फ़सल मौसम पर टिकी। शिशु-मृत्यु दर भयानक थी, और संतान के बिना ज़मीन का उत्तराधिकार टूट जाता था; बाँझपन केवल निजी दुख नहीं, पूरे घराने का अंत था। इसी डर के बीच परमेश्वर वादा करते हैं, और यह वादा उस लंबी सूची के ठीक बाद आता है जिसमें न्याय, परदेशी, दरिद्र, शत्रु का गदहा और सातवें वर्ष की छुट्टी शामिल है। आशीष और न्याय एक ही साँस में बोले गए हैं।
श्रोता
कल्पना कीजिए कि आप उस भीड़ में खड़े हैं। आपने मिस्र में देखा था कि फ़िरौन के आदेश पर नवजात बेटों को नील में फेंका जाता था; गर्भ वहाँ मृत्यु का द्वार बना दिया गया था। अब वही परमेश्वर, जिन्होंने आपके पहलौठे को बचाया, कहते हैं कि आपके देश में कोई गर्भ नहीं गिरेगा। यह आपके कानों में केवल एक आशीर्वाद नहीं, बल्कि मिस्र का उलटा है। और जब आप कनान पहुँचेंगे और वहाँ के लोग अपने खेतों में प्रजनन-देवताओं की लाटें गाड़े देखेंगे, तब यह पंक्ति याद आएगी: उन पत्थरों की ज़रूरत नहीं, जिन्होंने समुद्र चीरा वे गर्भ भी खोल सकते हैं। पहले सुननेवालों के लिए यह वचन धर्मशास्त्र नहीं था, यह उनके अगले साल की रोटी थी।
अन्तर्पाठ
व्यवस्थाविवरण 7 में यही वादा लगभग शब्दशः लौटता है, वहाँ भी मूर्तियों को नष्ट करने की आज्ञा के ठीक साथ; यह जोड़ी आकस्मिक नहीं है, क्योंकि जहाँ जीवन का स्रोत भ्रमित होता है वहाँ उपासना भी भ्रमित होती है। दूसरी ओर अय्यूब की पुस्तक इसी वादे के किनारे पर खड़ी है और उसे तोड़ती नहीं, पर उसे सरल समीकरण बनने से रोकती है: धर्मी के बच्चे भी मरते हैं, और परमेश्वर फिर भी परमेश्वर रहते हैं। बाइबल इन दोनों आवाज़ों को साथ रखती है, और हमें भी रखनी चाहिए। वादा सच्चा है; उसका समय और रूप हमारे हाथ में नहीं।
चिंतन
आप जीवन, संतान, स्वास्थ्य या सुरक्षा के लिए चुपचाप किन "लाटों" के सामने झुकते हैं, जिन्हें आपने कभी मूर्ति नहीं कहा?
यदि "तेरी आयु मैं पूरी करूँगा" आपके जीवन पर सच है, तो आज का दिन आप किस तरह अलग तरीके से जिएँगे?
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