उत्पत्ति 1:9
पाठ
सृष्टि के तीसरे दिन परमेश्वर तीसरी बार बोलते हैं, और इस बार आदेश जल को मिलता है: "आकाश के नीचे का जल एक स्थान में इकट्ठा हो जाए और सूखी भूमि दिखाई दे।" दूसरे दिन जल ऊपर और नीचे बाँटा गया था; अब नीचे का जल एक ओर समेटा जाता है, ताकि उसके पीछे से वह चीज़ उभर आए जिस पर पाँव टिक सकें। ध्यान दीजिए, यहाँ किसी नई वस्तु के बनाए जाने की बात नहीं है, बल्कि जगह खाली होने की। और वाक्य वैसे ही समाप्त होता है जैसे पिछले आदेश समाप्त हुए थे: "और वैसा ही हो गया।" कोई संघर्ष नहीं, कोई देरी नहीं, कोई प्रतिरोध नहीं।
मर्म
जिस दुनिया में यह वचन पहली बार सुना गया, वहाँ समुद्र डरावना था। मेसोपोटामिया और कनान की कहानियों में देवता को खारे जल के दैत्य से युद्ध करना पड़ता था, उसे चीरना पड़ता था, तब कहीं जाकर संसार खड़ा होता था। यहाँ परमेश्वर लड़ते नहीं; वे एक वाक्य बोलते हैं और जल आज्ञाकारी दास की तरह अपनी जगह पर सिमट जाता है। यही इस पद का धार्मिक हृदय है: अराजकता परमेश्वर की प्रतिद्वंद्वी नहीं, उनकी प्रजा है। और उनके शासन का पहला फल विनाश नहीं, बल्कि स्थान है, सूखी भूमि, जहाँ जीवन खड़ा हो सके। परमेश्वर का राज्य करना और उनका जगह बनाना एक ही क्रिया के दो पहलू हैं, और अगली ही आयत में वह भूमि हरी होने लगती है।
सूत्र
इस्राएल ने यह वाक्य बाद में एक बार अपनी आँखों से घटित होते देखा। लाल समुद्र के किनारे जल पीछे हटा, सूखी भूमि दिखाई दी, और एक गुलाम भीड़ उस पर चलकर राष्ट्र बन गई। निर्गमन की वह रात सृष्टि के तीसरे दिन की प्रतिध्वनि है: वही जल, वही आदेश, वही परिणाम, पर अब उद्धार के इतिहास के भीतर। इसलिए जब गलील की झील पर एक थका हुआ बढ़ई नाव में उठकर हवा और लहरों को डाँटता है और वे तुरंत शांत हो जाती हैं, तो शिष्यों का काँपता हुआ प्रश्न "यह कौन है?" असल में इसी आयत की ओर इशारा करता है। जल केवल उसकी सुनता है जिसने उसे पहले दिन जगह दी थी। मसीह में वही आवाज़ फिर से बोलती है, और वह आज भी लोगों के लिए खड़े होने की भूमि बनाती है।
दर्पण
आपके जीवन में भी कुछ है जो चढ़ता हुआ पानी जैसा लगता है। शायद वह कर्ज़ है जो हर महीने थोड़ा ऊपर आ जाता है, या कोई रिपोर्ट जिसका इंतज़ार है, या घर में वह रिश्ता जिसमें बातचीत अब सिर्फ़ चुप्पी के ऊपर तैरती है। हम प्रायः प्रार्थना में माँगते हैं कि पानी गायब हो जाए। यह आयत कुछ और देती है: पानी रहता है, पर उसकी सीमा बाँध दी जाती है, और उसके पीछे से खड़े होने की भूमि निकल आती है। परमेश्वर पहले जगह बनाते हैं, फिर जीवन उगाते हैं। आज ही एक कागज़ लीजिए, उस पर वह एक चीज़ लिखिए जो आपको डुबोती हुई लगती है, और उसके नीचे लिखिए: "आकाश के नीचे का जल एक स्थान में इकट्ठा हो जाए", फिर उसे ऊँची आवाज़ में पढ़िए।
मुख्य पात्र
यहाँ का मुख्य पात्र एक ऐसा परमेश्वर है जिसे हथियार उठाने की ज़रूरत नहीं। आसपास की जातियों के देवता पसीने में तरबतर होकर अराजकता से जूझते थे; यह परमेश्वर बोलते हैं और काम हो जाता है। पर ध्यान दीजिए, उनकी शक्ति का पहला उपयोग विनाश नहीं है। वे समुद्र को मिटाते नहीं, उसे एक स्थान देते हैं। संयम यहाँ कमज़ोरी नहीं, दया है। ऐसे परमेश्वर के भीतर कोई घबराहट नहीं है, कोई जल्दबाज़ी नहीं। वे किसी को हराने के लिए नहीं, किसी के लिए जगह बनाने के लिए काम करते हैं। जो अपनी सृष्टि के साथ ऐसा व्यवहार करते हैं, वे आपके साथ भी उतावले नहीं होंगे।
प्रश्न
तो फिर समुद्र आज भी लोगों को क्यों निगलता है? तटीय गाँव बह जाते हैं, नावें लौटती नहीं, बाढ़ खेत और बच्चे दोनों ले जाती है। यदि जल परमेश्वर के एक वाक्य से अपनी जगह पर सिमट गया, तो वह सीमा टूटती क्यों है? उत्पत्ति 1 यह प्रश्न पूछने से मना नहीं करती, पर इसका उत्तर भी नहीं देती। बाइबल स्वयं आगे चलकर मानती है कि जल फिर लौट सकता है। इसलिए यहाँ ईमानदारी यही है कि हम कहें: यह आयत अनुभव का वर्णन नहीं, बल्कि एक दावा है, कि आख़िरी अधिकार पानी का नहीं है। जिन दिनों सीमा टूटती दिखती है, यह दावा सांत्वना नहीं देता; यह केवल पकड़ने को एक किनारा देता है, और कभी-कभी इतना ही मिलता है।
पहले सुननेवाले
इस्राएली नाविक नहीं थे, किसान थे। समुद्र उनके लिए पड़ोसियों का इलाका था, पलिश्तियों और फीनीकियों का, और उनकी भाषा में वह अक्सर मृत्यु और अनियंत्रित शक्ति का चेहरा था। जिन कानों ने बाबेल में हर नववर्ष पर वह कहानी सुनी होगी जिसमें देवता खारे जल के दैत्य को चीरकर संसार बनाता है, उनके लिए यह आयत लगभग विद्रोही लगी होगी: हमारा परमेश्वर लड़ता नहीं, वह बोलता है। और "सूखी भूमि" शब्द उन लोगों के कानों में सादा नहीं था। भूमि ही तो वह वादा थी जिसे वे खो चुके थे या जिसकी ओर वे चल रहे थे। सृष्टि के तीसरे दिन ही परमेश्वर ने वह चीज़ बनाई जिसकी उन्हें सबसे ज़्यादा भूख थी: खड़े होने की जगह।
चिंतन
आपके जीवन का कौन-सा "पानी" आप हटाना चाहते हैं, जबकि परमेश्वर शायद उसे सीमा में बाँधकर आपको उसके किनारे खड़े होना सिखा रहे हैं?
अगर परमेश्वर के शासन का पहला फल जगह बनाना है, तो आपके अधिकार के दायरे में (घर, कक्षा, दफ़्तर, मंडली) किसे इस समय खड़े होने की भूमि चाहिए?
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