उत्पत्ति 32:29
पाठ
रात भर की लड़ाई के बाद, नया नाम पा लेने के बाद, याकूब एक आखिरी चीज़ माँगता है: "मैं विनती करता हूँ, मुझे अपना नाम बता।" उसने अपना नाम दे दिया था, अपनी कमज़ोरी खोल दी थी, अपनी जाँघ की नस गँवा दी थी; अब वह चाहता है कि सामने वाला भी अपनी पहचान खोले। उत्तर मिलता है, पर वह उत्तर नहीं है: "तू मेरा नाम क्यों पूछता है?" और फिर, प्रश्न के बदले में, आशीर्वाद। नाम छिपा रहता है, बरकत हाथ में आ जाती है। याकूब उसी अजनबी के साथ सुबह तक टिका रहा जिसका चेहरा उसने देखा पर जिसका नाम उसे कभी नहीं मिला।
मूल बात
प्राचीन दुनिया में नाम जानना केवल जानकारी नहीं था, वह पकड़ थी। नाम पुकारकर आप देवता को बुला सकते थे, उसे बाध्य कर सकते थे, जादू में बाँध सकते थे। याकूब का माँगना इसलिए बिलकुल याकूब जैसा है: जन्म से वह पकड़ता आया है, एड़ी, पहलौठे का अधिकार, आशीर्वाद, लाबान के झुण्ड। अब वह परमेश्वर पर भी हाथ रखना चाहता है। और यहीं वह रोक दिया जाता है। परमेश्वर स्वयं को देते हैं, पर अपने ऊपर नियंत्रण नहीं देते। यह अस्वीकार निर्दयता नहीं, दया है: जिसे आप संभाल सकते हैं वह परमेश्वर नहीं हो सकता। इसलिए इनकार और आशीर्वाद एक ही वाक्य में आते हैं। याकूब को वह नहीं मिलता जो वह पकड़ सकता, बल्कि वह मिलता है जो उसे थाम सकता है।
सूत्र
याकूब को नाम नहीं मिला, पर कहानी यहीं खत्म नहीं होती। बाइबल का पूरा बहाव इसी अनुत्तरित प्रश्न की ओर झुका हुआ है: वह अजनबी कौन है जो परमेश्वर की तरह आशीर्वाद देता है, पर मनुष्य की तरह कुश्ती लड़ता है? याकूब उसे यब्बोक के किनारे मुट्ठी में नहीं पकड़ सका, पर सदियों बाद वही देह लेकर आया, और तब नाम स्वयं बोला गया। यूहन्ना लिखता है कि परमेश्वर को किसी ने कभी नहीं देखा, पर एकलौते पुत्र ने उन्हें प्रकट किया; यानी जो पनीएल में छिपा रहा, वह बैतलहम में खुल गया। और पौलुस फिलिप्पियों में कहता है कि परमेश्वर ने उन्हें वह नाम दिया जो हर नाम से श्रेष्ठ है। ध्यान दीजिए: नाम छीना नहीं गया, दिया गया। यही अंतर पूरे सुसमाचार का अंतर है। साथ ही वह विवरण जो कोई रूपक नहीं, बस सच्चाई है: आशीर्वाद घाव के साथ आया। याकूब लँगड़ाते हुए सूरज में निकला; मसीह छेदे हुए हाथों के साथ उठे। बरकत सस्ती कभी नहीं रही।
दर्पण
हम भी नाम माँगते हैं, बस दूसरे शब्दों में। हम पूछते हैं: यह बीमारी क्यों, यह नौकरी क्यों गई, मेरा बच्चा क्यों लौटकर नहीं आता, और कब तक। ये प्रश्न गलत नहीं हैं, याकूब का प्रश्न भी गलत नहीं था। पर उनके भीतर अक्सर एक चुपचाप सौदा छिपा होता है: मुझे समझ में आ जाए तो मैं आगे भरोसा कर लूँगा। यानी हम परमेश्वर को समझ की मुट्ठी में चाहते हैं, ताकि आगे की रात अकेले न काटनी पड़े। इस रात का सबक कड़वा और मीठा दोनों है: उत्तर रोक लिया गया, पर वह अजनबी वहीं रुका रहा और आशीर्वाद दे गया। आज एक काम कीजिए: कागज़ पर वह एक प्रश्न लिखिए जिसका उत्तर आप महीनों से परमेश्वर से माँग रहे हैं, और उसके नीचे वह नाम लिखिए जो आपको दिया जा चुका है, यीशु मसीह; फिर ज़ोर से कहिए, "उत्तर नहीं मिला, पर आप मिले हैं।"
श्रोता
जो इस्राएली यह कहानी सुनते थे, वे अपने पड़ोसियों की दुनिया जानते थे, जहाँ पुजारी देवताओं के गुप्त नाम रटते थे ताकि उन्हें काम पर लगाया जा सके। उनके लिए यह वाक्य चौंकाने वाला था: उनके पुरखे ने नाम माँगा और नहीं पाया। उनका परमेश्वर किसी मंत्र में नहीं बँधता। और फिर भी वही परमेश्वर बाद में मूसा को सीनै में अपना नाम बताते हैं, बिना माँगे, कृपा से। यही उनकी पहचान की जड़ थी: हम वह जाति हैं जिसे नाम दिया गया, छीना नहीं गया। साथ ही वे हर भोजन में इस रात को याद करते थे, क्योंकि जंघानस नहीं खाई जाती थी। उनकी थाली में एक लँगड़े पुरखे की स्मृति रखी रहती थी, जिससे कोई भूल न जाए कि इस्राएल नाम विजय से नहीं, चिपके रहने से मिला था।
प्रश्न
फिर भी यह इनकार खटकता है। यदि परमेश्वर स्वयं को देना चाहते हैं, तो नाम क्यों रोकें? और उससे पहले का वाक्य तो और उलझाता है: "तू परमेश्वर से और मनुष्यों से भी युद्ध करके प्रबल हुआ है।" कौन जीता? वह जो चाहकर भी याकूब को हरा नहीं सका, या वह जो एक स्पर्श से उसकी जाँघ चढ़ा गया? पाठ इसे साफ नहीं करता, और शायद जानबूझकर। परमेश्वर हारने का नाटक नहीं करते; वे अपनी शक्ति सीमित करके हमें टिके रहने की जगह देते हैं। यह हमारी तर्कबुद्धि को संतुष्ट नहीं करता। मसीह में नाम खुल गया, पर रहस्य नहीं मिटा; क्रूस पर भी एक प्रश्न अनुत्तरित हवा में लटका रहा। हमें यह मानना ही होगा कि परमेश्वर को जानना और परमेश्वर को समझ लेना एक बात नहीं है।
संदर्भ
बीस साल बाद याकूब लौट रहा है, अमीर पर असुरक्षित। जिस भाई का आशीर्वाद उसने छल से लिया था, वह चार सौ आदमी लेकर आ रहा है, और चार सौ आदमी भेंट लेने नहीं आते। याकूब ने सब कुछ भेज दिया है: झुण्ड, भेंट, पत्नियाँ, ग्यारह बच्चे, सब यब्बोक के पार। वह खुद इस तरफ अकेला बचा है, बिना संपत्ति, बिना परिवार, बिना उन चालों के जो अब तक काम आती रहीं। यहाँ वह अपने भाई को "मेरे प्रभु एसाव" और खुद को "तेरा दास" कहता है; जो जीता था, वह झुककर लौट रहा है। ठीक इसी सबसे नंगी घड़ी में परमेश्वर उस पर टूट पड़ते हैं। ध्यान दीजिए कि हमलावर एसाव नहीं निकला। जिस रात उसे सबसे ज़्यादा बल चाहिए था, उसी रात उसकी जाँघ तोड़ दी गई, और तभी वह इस्राएल बना।
चिंतन
आप परमेश्वर से इस समय कौन सा "नाम" माँग रहे हैं, यानी कौन सी समझ या नियंत्रण, और यदि वह न मिले तो क्या आप फिर भी सुबह तक टिके रहेंगे?
आपके जीवन में कौन सा घाव है जो आशीर्वाद के साथ ही आया, और आप उसे छिपाते हैं या उसमें परमेश्वर की छाप पहचानते हैं?
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इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पिता, धन्यवाद कि आपने याकूब को रातभर लिपटे रहने दिया और उसे ठुकराया नहीं, बल्कि कहा, "तेरा नाम अब याकूब नहीं, परन्तु इस्राएल होगा।" धन्यवाद कि मेरी कमजोरी और छल के बावजूद आप मुझे नया नाम और नई पहचान देते हैं, और मेरे संघर्ष की हर रात को आशीष में बदल देते हैं।
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