उत्पत्ति 32
पाठ
याकूब लाबान के देश से लौट रहा है, और रास्ते में परमेश्वर के दूत उसे मिलते हैं; वह उस जगह का नाम महनैम रखता है। पर स्वर्गीय दल देखने के बाद भी, जैसे ही खबर आती है कि एसाव चार सौ आदमियों के साथ आ रहा है, याकूब "बहुत डर गया, और संकट में पड़ा।" वह अपने परिवार और पशुओं के दो दल बाँटता है, प्रार्थना करता है, और भारी भेंट आगे भेजता है ताकि भाई का क्रोध शान्त हो। रात को वह सबको यब्बोक नदी के पार उतारकर खुद अकेला रह जाता है, और वहाँ एक अनजान पुरुष उससे पौ फटने तक मल्लयुद्ध करता है। सुबह याकूब का नाम बदलकर इस्राएल हो जाता है, उसकी जाँघ चढ़ जाती है, और वह लँगड़ाता हुआ आशीर्वाद लेकर आगे बढ़ता है।
मूल बात
यहाँ परमेश्वर वह नहीं करते जो हम धार्मिक कहानियों से उम्मीद करते हैं। वे याकूब का डर दूर नहीं करते, उसका शत्रु नहीं हटाते, उसे सुरक्षा की गारंटी नहीं देते। वे रात के अँधेरे में आकर उससे भिड़ जाते हैं। और जब याकूब झुकता नहीं, तो वे जीतने के लिए उसे तोड़ते हैं: जाँघ की नस छूकर। यही इस अध्याय का धड़कता हुआ हृदय है, कि परमेश्वर का आशीर्वाद और परमेश्वर की चोट एक ही हाथ से आते हैं। "जब तक तू मुझे आशीर्वाद न दे, तब तक मैं तुझे जाने न दूँगा," यह पकड़ किसी बलवान की नहीं, एक अपंग हो चुके आदमी की है। नया नाम इस्राएल किसी उपलब्धि का इनाम नहीं; वह उस आदमी की पहचान है जो हार कर भी टिका रहा। अनुग्रह यहाँ चालाकी को पुरस्कृत नहीं करता, उसे घुटनों पर लाकर बदल देता है।
जोड़ने वाला सूत्र
याकूब की कहानी अब्राहम से शुरू हुई उस वचन की कड़ी है: "तेरे वंश को समुद्र के रेतकणों के समान बहुत करूँगा।" पर ध्यान दीजिए, वह वंश जिस आदमी से निकलता है, वह लँगड़ाता हुआ आदमी है। इस्राएल नाम की जड़ में जीत नहीं, एक टूटी जाँघ है। यह पैटर्न पूरे बाइबिल में चलता है और सलीब पर अपने चरम पर पहुँचता है: परमेश्वर अपने लोगों को घायल किए बिना नहीं बचाते, और खुद भी घाव लेकर ही बचाते हैं। याकूब कहता है, "परमेश्वर को आमने-सामने देखने पर भी मेरा प्राण बच गया है।" यही आश्चर्य यूहन्ना के सुसमाचार का दिल है, कि परमेश्वर मनुष्य के सामने आए और मनुष्य जीवित रहा, क्योंकि परमेश्वर ने कमज़ोर होना चुना।
आईना
आप भी दो दल बाँटते हैं। जब रिश्ता बिगड़ता है, जब बॉस की ईमेल आती है, जब पुराना कर्ज़ या पुरानी गलती दरवाज़ा खटखटाती है, तो आप योजना बनाते हैं: यह कहूँगा, वह छिपाऊँगा, इतना दूँगा ताकि गुस्सा ठंडा हो। याकूब की भेंट की सूची इतनी लंबी है कि पढ़ते-पढ़ते थकान होती है, दो सौ बकरियाँ, बीस बकरे, तीस ऊँटनियाँ। यह प्रार्थना के बाद की सूची है। हम भी प्रार्थना करके फिर अपनी व्यवस्था पर लौट आते हैं, क्योंकि हमें गहरे में भरोसा नहीं कि प्रार्थना काफी है। और परमेश्वर उस रात हमें वहीं मिलते हैं जहाँ सारी व्यवस्था नदी के पार जा चुकी होती है और हम अकेले रह जाते हैं।
आज रात सोने से पहले उस एक व्यक्ति का नाम ज़ोर से बोलिए जिससे मिलने से आप डरते हैं, और उसके बाद बोलिए: "मेरी विनती सुनकर मुझे बचा।" बस इतना, बिना योजना जोड़े।
कठिन प्रश्न
क्यों परमेश्वर याकूब को घायल करते हैं जब वह पहले से ही डरा हुआ है? आदमी अपने जीवन की सबसे भयानक सुबह से पहले वाली रात में है, और परमेश्वर उसे और कमज़ोर कर देते हैं। इसका कोई मीठा जवाब नहीं है। पाठ यह नहीं कहता कि याकूब को इससे शान्ति मिली; कहता है कि सूरज निकला और "वह जाँघ से लँगड़ाता था।" शायद यही बात है: जो आदमी जीवन भर एड़ी पकड़कर आगे बढ़ता रहा, उसकी चाल ही बदल दी गई। पर यह सांत्वना नहीं, सर्जरी है। और सर्जरी के बाद दर्द बना रहता है। परमेश्वर हमेशा समझाते नहीं; कभी-कभी वे केवल छूते हैं और चले जाते हैं।
मुख्य पात्र
याकूब यहाँ अपने सबसे ईमानदार रूप में है। उसकी प्रार्थना में वह वाक्य है जो उसने पहले कभी नहीं कहा: "मैं एक के भी योग्य तो नहीं हूँ।" जो आदमी जन्म से अधिकार छीनता आया, वह पहली बार कहता है कि उसके पास दावा नहीं, केवल दया है। फिर भी वही आदमी भेंट भेजता है, गणना करता है, सुरक्षा की परतें बिछाता है। यही मनुष्य है: टूटा हुआ विश्वास और तेज़ दिमाग एक ही सीने में। और जब वह पूछता है, "मुझे अपना नाम बता," तो उसे जवाब नहीं मिलता, आशीर्वाद मिलता है। याकूब परमेश्वर को समझ नहीं पाता, पर उन्हें छोड़ता भी नहीं। यही उसकी सच्ची महानता है।
पहले सुननेवाले
जिन इस्राएलियों ने यह कहानी पहली बार सुनी, वे जानते थे कि एदोम उनका पड़ोसी और अक्सर उनका शत्रु है। उनके लिए यह केवल पारिवारिक झगड़ा नहीं, राष्ट्रों का इतिहास था। और वे अपने राष्ट्र का नाम एक ऐसी रात से निकलता देखते थे जिसमें उनका पूर्वज हारा भी और टिका भी। अंतिम आयत भोजन के नियम से जुड़ी है: हर बार माँस काटते समय उन्हें याद आता कि उनकी पहचान की जड़ में एक चोट है। यह गर्व नहीं, विनम्रता सिखाने वाला रिवाज़ था। इस्राएल होना मतलब चुना जाना, और साथ ही लँगड़ाना।
चिंतन
आपकी ज़िंदगी में वह "दूसरा दल" क्या है, वह बैकअप योजना जिसे आप प्रार्थना के बाद भी चुपचाप तैयार रखते हैं?
परमेश्वर ने आपके साथ जो किया है, उसमें कोई ऐसी चोट है जिसे आप अब तक आशीर्वाद नहीं कह पाए? उसे नाम दीजिए।
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