इब्रानियों 12:13
पाठ
"अपने पाँवों के लिये सीधे मार्ग बनाओ" — ध्यान दीजिए, आज्ञा यह नहीं है कि सीधे मार्ग पर चलो, बल्कि यह कि मार्ग बनाओ। जैसे कोई पथरीली, ऊबड़-खाबड़ पगडंडी से पत्थर हटाकर उसे चलने योग्य बनाता है। और इसका कारण तुरन्त बताया जाता है, और वह कारण चौंकाने वाला है: "कि लँगड़ा भटक न जाए, पर भला चंगा हो जाए।" अपने पैरों के लिए मार्ग सीधा करो, पर किसी और की खातिर। पिछली आयत में ढीले हाथ और निर्बल घुटने सीधे किए जा रहे थे; अब वही थके हुए धावक अचानक मार्ग-निर्माता बन जाते हैं। जो स्वयं लड़खड़ा रहा है, उसे कहा जा रहा है: तुम्हारे कदमों के निशान किसी लँगड़े के लिए रास्ता बन सकते हैं।
केंद्र
यहाँ एक बात खुलती है जिसे हम आसानी से चूक जाते हैं: परमेश्वर की ताड़ना, जिसका वर्णन आयत 5 से 11 तक चलता है, व्यक्तिगत रूप से सही जाती है, लेकिन उसका फल निजी नहीं रहता। "चैन के साथ धार्मिकता का प्रतिफल" किसी अकेले धावक की ट्रॉफी नहीं है; वह एक समुदाय के लिए बनाया गया रास्ता बन जाती है। परमेश्वर हमें आकार देते हैं, और उस आकार से दूसरों को चलने की जगह मिलती है।
यह अनुग्रह के विषय में कुछ गहरा कहता है। अनुग्रह ऊपर से सीधे गिरने वाली वस्तु ही नहीं, वह हाथों से होकर आता है, कदमों से होकर, उन लोगों से होकर जिन्होंने अपने दुःख को व्यर्थ नहीं जाने दिया। और यहाँ एक प्रश्न बचा रह जाता है, जिसे पत्र का लेखक खुला छोड़ देता है: क्या होता है जब कोई मार्ग बनाने से इनकार कर दे? लँगड़ा कहाँ जाता है तब?
सूत्र
आयत 12 में यशायाह 35 की गूँज है, और वह अध्याय एक राजमार्ग का वर्णन करता है जिस पर छुड़ाए हुए लोग लौटते हैं, जहाँ लँगड़ा हिरन की तरह कूदता है। इब्रानियों का लेखक उस भविष्यवाणी को उठाकर मण्डली के हाथों में रख देता है: वह राजमार्ग अब तुम्हारे बीच बनना है। और यह सूत्र और पीछे तक जाता है। जो मसीह "उस आनन्द के लिये जो उसके आगे धरा था, लज्जा की कुछ चिन्ता न करके, क्रूस का दुःख सहा", उन्होंने ठीक यही किया, अपना दुःख दूसरों के लिए मार्ग बनने दिया। उनकी पीड़ा निजी बनी रह सकती थी; वह नहीं रही। अब जो उनके पीछे दौड़ते हैं, उनसे कहा जाता है कि वे उसी ढंग से जिएँ। छोटे पैमाने पर, अपने घर की गली में, वही काम।
दर्पण
आप थके हुए हैं। शायद इसीलिए यह आयत चुभती है। जब नौकरी में अपमान सहना पड़ रहा हो, जब घर में कोई लम्बी बीमारी है, जब प्रार्थनाएँ महीनों से एक ही दीवार से टकरा रही हों, तब भीतर से आवाज़ आती है: मेरे पास देने को कुछ नहीं बचा। पर यह आयत यह नहीं कहती कि पहले चंगे हो जाओ, फिर मार्ग बनाओ। वह लड़खड़ाते हुए घुटनों से ही कहती है: पत्थर हटाओ।
और अक्सर सबसे बड़ा पत्थर हमारा दिखावा होता है। जब आप कमज़ोर लोगों के सामने यह अभिनय करते हैं कि आपके साथ सब ठीक चल रहा है, तो आप उनके लिए मार्ग ऊबड़-खाबड़ बना देते हैं; वे सोचते हैं कि विश्वास केवल मज़बूत लोगों का खेल है।
आज एक व्यक्ति चुनिए जो विश्वास में आपसे पीछे चल रहा है, और उसे एक संदेश भेजिए जिसमें आप अपने वर्तमान संघर्ष का एक वाक्य ईमानदारी से लिखें।
परिचय
ये लोग नए विश्वासी नहीं थे। वे वर्षों से मसीह के पीछे चल रहे थे, और उसकी कीमत चुका चुके थे: सम्पत्ति की हानि, रिश्तेदारों का तिरस्कार, आराधनालय से कट जाना। यहूदी समाज में अपनी विरासत छोड़ना केवल धार्मिक निर्णय नहीं था, वह सामाजिक आत्महत्या थी। अब थकान आ चुकी थी। कुछ सभा में आना छोड़ रहे थे, कुछ पुरानी परिचित व्यवस्था की ओर लौटने की सोच रहे थे।
इन कानों के लिए "लँगड़ा" कोई रूपक नहीं था, बल्कि एक चेहरा था। वे जानते थे कि उनके बीच कौन डगमगा रहा है, कौन मजबूरी में चुप है, किसका परिवार टूटने की कगार पर है। लेखक उनसे यह नहीं कहता कि नेता कुछ करें। वह पूरी मण्डली से कहता है, जिसमें सबसे थके हुए लोग भी शामिल हैं।
एक बारीकी
"भटक न जाए" के पीछे जो यूनानी शब्द है, ἐκτραπῇ (एक्त्रपे), उसके दो अर्थ हैं, और लेखक शायद दोनों चाहता है। एक अर्थ है रास्ते से मुड़ जाना। दूसरा अर्थ चिकित्सा की भाषा से आता है: जोड़ का अपनी जगह से उतर जाना, हड्डी का उखड़ जाना।
इस दूसरे अर्थ पर ठहरिए। एक लँगड़ा आदमी ऊबड़-खाबड़ रास्ते पर चलता है और उसका टखना मुड़ जाता है। वह गिरता नहीं, वह टूट जाता है। जो चोट पहले से थी, वह अब स्थायी हो जाती है। और उसके बाद आता है वह शब्द जो पूरी आयत को खोल देता है: "पर भला चंगा हो जाए।" दो रास्ते, एक ही पगडंडी पर। किस ओर वह जाएगा, यह इस पर निर्भर करता है कि किसी ने पत्थर हटाया या नहीं।
पृष्ठभूमि
अध्याय 12 एक स्टेडियम से शुरू होता है, गवाहों की भीड़, दौड़ता हुआ धावक। पर आयत 13 तक दृश्य बदल चुका है: अब हम खुले मैदान की पथरीली सड़क पर हैं, जैसे कोई कारवाँ चल रहा हो। प्राचीन संसार में जब राजा आने वाला होता था, तो लोग पहले से सड़क समतल करते थे, गड्ढे भरते थे, पत्थर हटाते थे। यहाँ वही काम मण्डली को सौंपा गया है।
और यह सड़क कहीं जाती है। आयत 22 बताती है कहाँ: "सिय्योन के पहाड़ के पास, और जीविते परमेश्वर के नगर स्वर्गीय यरूशलेम के पास।" यह तीर्थयात्रा की भाषा है, और तीर्थयात्रा कभी अकेले नहीं होती। इसलिए यह आज्ञा भावुक सलाह नहीं, यात्रा-नियम है: पीछे वालों को पीछे मत छोड़ो।
चिंतन
आपके जीवन में इस समय कौन "लँगड़ा" है, यानी कौन ऐसा है जो आपको देखकर तय कर रहा है कि विश्वास का रास्ता चलने लायक है या नहीं?
अपने दुःख को व्यर्थ न जाने देने का क्या अर्थ होगा, जब वह दुःख अभी खत्म नहीं हुआ है और उसका कोई उत्तर भी नहीं मिला है?
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Hebrews 12:13 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
इब्रानियों 12:13 का क्या अर्थ है?
इब्रानियों 12:13 किस विषय में है?
इब्रानियों 12:13 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
इब्रानियों 12:13 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
इब्रानियों 12:13 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Hebrews 12 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पिता, मेरे कंधों पर कितना बोझ है, कुछ पाप और कुछ ऐसी चिंताएँ जो मुझे थका देती हैं। मुझे मदद कर कि मैं इन्हें उतार दूँ और उस राह पर धीरज से चलता रहूँ जो तूने मेरे लिए ठहराई है। जो तुझ पर भरोसा करते हुए पहले चल चुके हैं, उनकी गवाही मुझे हिम्मत दे।
क्या आत्माओं के पिता के और भी अधीन न रहें जिससे जीवित रहें?" ध्यान दे, यहाँ सवाल यह नहीं कि परमेश्वर ताड़ना क्यों देता है, बल्कि यह कि तू किसके हाथ में है। पिता का हाथ मारता नहीं, थामता है। जो चोट आज तुझे तोड़ती लग रही है, वही तुझे जीवन की ओर मोड़ रही है। अधीन होना हार नहीं, जीने का रास्ता है।
और अपने पाँवों के लिये सीधे मार्ग बनाओ, कि लँगड़ा भटक न जाए, वरन् चंगा हो जाए।" ध्यान दो, बात सिर्फ तुम्हारे चलने की नहीं है। तुम्हारे पीछे कोई लँगड़ाता हुआ आ रहा है, और वह तुम्हारे बनाए रास्ते पर पाँव रखेगा। तुम्हारी टेढ़ी चाल किसी और की चोट गहरी कर सकती है। आज तुम्हारे पीछे कौन चल रहा है?
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