यशायाह 30:28
पाठ
यशायाह एक ऐसे परमेश्वर का चित्र खींचता है जो दूर से चला आ रहा है, और उनकी साँस ही उनका हथियार है: "उसकी साँस ऐसी उमड़नेवाली नदी के समान है जो गले तक पहुँचती है।" पानी ठीक उस ऊँचाई तक, जहाँ साँस लेना असंभव हो जाए पर डूबना अभी तय न हो। फिर दो और चित्र: परमेश्वर जातियों को "नाश के सूप से" फटकेंगे, जैसे किसान भूसी उड़ाकर अनाज अलग करता है, और वे "देश-देश के लोगों को भटकाने के लिये उनके जबड़ों में लगाम" लगाएँगे, जैसे कोई बेकाबू घोड़े के मुँह में लगाम डालकर उसे उसकी मनचाही दिशा से मोड़ देता है। एक ही वाक्य में बाढ़, सूप और लगाम: तीनों बताते हैं कि साम्राज्यों की चाल किसके हाथ में है।
मूल बात
यह पद उस अध्याय के बीचोंबीच खड़ा है जहाँ यहूदा मिस्र की छाया में शरण खोज रहा था, और परमेश्वर कह चुके थे कि "लौट आने और शान्त रहने में तुम्हारा उद्धार है।" पद 28 बताता है कि यह बुलाहट खोखली धर्मिकता नहीं थी। जिस परमेश्वर पर भरोसा करने को कहा जा रहा है, वही अश्शूर की सेना के जबड़ों में लगाम डालने वाले हैं। यहाँ परमेश्वर के क्रोध को शर्मिंदगी के साथ नहीं, बल्कि राहत के साथ प्रस्तुत किया गया है: बाढ़ गले तक आती है, ऊपर नहीं; सूप नष्ट नहीं करता, वह अलग करता है। न्याय का मकसद सफाया नहीं, छँटाई है। और यही परमेश्वर के चरित्र की गहराई है, कि उनकी साँस एक ही समय में विनाश भी है और जीवन भी, इसलिए उनके सामने झुकना कमजोरी नहीं बल्कि इस अध्याय के अनुसार असली "वीरता" है।
जोड़नेवाला धागा
बाइबल में "साँस" और "सूप" दोनों आगे चलकर मसीह के हाथ में आ जाते हैं। यूहन्ना बपतिस्मा देनेवाला यरदन के किनारे ठीक यही चित्र उठाता है: आनेवाले के हाथ में सूप है, वह खलिहान साफ करेगा, गेहूँ और भूसी अलग करेगा। यशायाह जिसे परमेश्वर का काम कहता है, मत्ती उसे नासरत के उस बढ़ई के हाथ में रख देता है। और साँस? पुनरुत्थान की शाम यीशु मसीह बन्द दरवाजों के पीछे बैठे चेलों पर फूँक मारते हैं और कहते हैं, पवित्र आत्मा लो। वही साँस जो जातियों को बहा ले जाती है, डरे हुए लोगों में जीवन फूँकती है। यह कोई खींची हुई तुलना नहीं; यह एक ही धारा के दो सिरे हैं। और यदि न्याय की बाढ़ गले तक ही रुकती है, तो गुलगुता वह एक जगह है जहाँ वह किसी के सिर के ऊपर से गुजरी, ताकि हमारे लिए वह गले पर आकर ठहर जाए।
दर्पण
आपका मिस्र क्या है? यशायाह के श्रोताओं ने ऊँटों पर खजाना लादकर उस देश को भेजा था जिससे "कुछ लाभ न होगा"। हमारे पास ऊँट नहीं, पर सूचियाँ हैं: वह बॉस जिसे नाराज नहीं कर सकते, वह रिश्तेदार जिसकी सिफारिश से काम बनता है, वह बीमा पॉलिसी जिसे देखकर रात को नींद आती है, वह कर्ज जो हर महीने गला दबाता है। हम इन्हें बुरा नहीं मानते, बस उन्हें अपनी छाया बना लेते हैं। पद 28 इन सब पर एक ही बात कहता है: इनके जबड़ों में भी लगाम है। जिस शक्ति से आप डरते हैं, वह बिना मुँह के नहीं घूम रही।
आज दस मिनट निकालिए: कागज पर उस एक नाम या स्थिति को लिखिए जिससे आप सबसे ज्यादा डरते हैं, और उसके नीचे यह वाक्य अपनी आवाज में बोलकर लिखिए, "इसके जबड़े में भी परमेश्वर की लगाम है।"
प्रश्न
पाठ कहता है कि परमेश्वर लगाम लगाते हैं "भटकाने के लिये"। यह असहज है। हम मानना चाहते हैं कि परमेश्वर केवल सही रास्ता दिखाते हैं; यहाँ वे किसी को गलत मोड़ पर ले जाते दिखते हैं। यशायाह इसे नरम नहीं करता। अश्शूर ने अपनी मर्जी से चढ़ाई की थी, पर उसकी चाल की दिशा उसके हाथ में नहीं रही; उसका अपना घमंड ही उसे उस रास्ते पर ले गया जहाँ वह गिरा। बाइबल इसे रहस्य की तरह छोड़ती है: मनुष्य पूरी जिम्मेदारी के साथ चुनता है, और फिर भी उसका चुनाव किसी बड़े हाथ की पकड़ से बाहर नहीं। मुझे इसका सुथरा समाधान नहीं मिला, और मैं आपको नकली समाधान नहीं दूँगा। बस इतना: यह लगाम उस मुँह में है जिसने आपके लिए क्रूस पर "पूरा हुआ" कहा।
एक बारीकी
"गले तक"। यह माप ध्यान देने लायक है। नदी सिर के ऊपर नहीं, गले तक। इस्राएल इस चित्र को पहचानता था: इसी पुस्तक में पहले अश्शूर की बाढ़ यहूदा की गर्दन तक पहुँची थी। अब वही माप उलट दिया गया है, और जो पानी कभी परमेश्वर के लोगों की ठुड्डी छू रहा था, वह अब जातियों पर उमड़ रहा है। पर माप वही रहता है। परमेश्वर का क्रोध भी नपा-तुला है; वह अंधाधुंध बाढ़ नहीं। जो गले तक आती है वह डराती है, हिलाती है, पर वह एक इंच छोड़ देती है, और उसी एक इंच में साँस है, और साँस में पुकारने की गुंजाइश है, और पद 19 कहता है कि वे पुकार सुनते ही मान लेते हैं।
संदर्भ
समय लगभग 701 ईसा पूर्व, हिजकिय्याह का यरूशलेम। अश्शूर उत्तर से एक के बाद एक शहर निगल चुका है, और यहूदा जैसा छोटा राज्य दो महाशक्तियों के बीच पिस रहा है। राजनयिक तर्क सीधा था: मिस्र से संधि करो, घोड़े और रथ खरीदो, बच जाओगे। इसलिए राजदूत सोअन और हानेस तक गए, खजाना गदहों और ऊँटों पर लदकर रेगिस्तान पार गया। यशायाह इस पूरी नीति को एक नाम देता है: "बैठी रहनेवाली रहब", यानी बड़ा नाम, कोई हरकत नहीं। दरबार में उसकी बात अलोकप्रिय थी; लोग साफ कह रहे थे कि हमें "चिकनी-चुपड़ी बातें" सुनाओ। ऐसे माहौल में, जहाँ भरोसा हथियारों की गिनती से नापा जाता था, पद 28 राजनीति नहीं, धर्मशास्त्र बोलता है: साम्राज्य घोड़े हैं, और घोड़े की लगाम किसी और के हाथ में है।
चिंतन
आपके जीवन में वह कौन-सी "मिस्र की छाया" है जिस पर आप चुपचाप भरोसा करते हैं, और उसे छोड़ना आपको कमजोरी क्यों लगता है?
यदि परमेश्वर का सूप नष्ट करने के लिए नहीं बल्कि अलग करने के लिए है, तो इस समय आपके जीवन में वे क्या उड़ा देना चाहते हैं, और क्या रखना चाहते हैं?
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Isaiah 30:28 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
यशायाह 30:28 का क्या अर्थ है?
यशायाह 30:28 किस विषय में है?
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यशायाह 30:28 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
यशायाह 30:28 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Isaiah 30 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पिता, कई बार मैं ऐसी बातें सुनना चाहता हूँ जो मुझे सहज लगें, और तेरी सच्चाई से मुँह मोड़ लेता हूँ। मुझे माफ़ कर। मेरे मन को ऐसा बना कि जब तेरा वचन मुझे चुभे, तब भी मैं उसे सुनूँ और तेरे रास्ते पर ही चलता रहूँ।
यशायाह कहता है, "क्योंकि ये बलवा करनेवाले लोग हैं, धोखा देनेवाले लड़के, ऐसे लड़के जो यहोवा की व्यवस्था सुनना नहीं चाहते।" गौर कर, सच उनके कानों तक पहुँचा था। कमी सुनने की नहीं, चाहने की थी। आज भी हम वही वचन चुनते हैं जो चुभे नहीं। तू किस बात को जानबूझकर अनसुना कर रहा है?
इस्राएल मिस्र से मदद माँगने भागा था, परमेश्वर से नहीं। फिर भी यशायाह कहता है, "वह तुम्हारी चिल्लाहट का शब्द सुनते ही तुम पर अनुग्रह करेगा; और सुनते ही तुम्हें उत्तर देगा।" सुनते ही। कोई देरी नहीं, कोई ताना नहीं कि पहले कहाँ गए थे। तेरी आवाज़ ही काफ़ी है। आज जो रोना तू छिपा रहा है, उसे उसके सामने खुलकर रो ले।
मिस्र पर भरोसा करना, यही तो इस्राएल का पाप था। संकट के समय वे परमेश्वर के पास नहीं, बल्कि उस बड़ी शक्ति के पास दौड़े जो असल में कुछ भी नहीं कर सकती थी। यशायाह ने मिस्र को "बैठी रहनेवाली रहब" कहा, यानी वह बड़ा दिखता है, पर हिलता तक नहीं।
आज भी हम अक्सर ऐसे ही "मिस्र" ढूंढते हैं, कोई इंसान, कोई पैसा, कोई योजना, जो देखने में मजबूत लगे। पर क्या वे सच में उठकर तुम्हारी मदद करेंगे? या बस बैठे रहेंगे? परमेश्वर पूछ रहा है, तेरा असली सहारा कौन है?
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