बाइबल व्याख्या

यशायाह 33

बाइबल
यह अध्याय JL Group के सहयोग से संभव हुआ है

पाठ

सिय्योन के बीचोंबीच एक चीख उठती है: "हम में से कौन प्रचण्ड आग में रह सकता?" अध्याय उस नाश करनेवाले पर "हाय" से शुरू होता है जिसने अब तक केवल नाश किया है और कभी नाश नहीं हुआ, फिर अचानक प्रार्थना में बदल जाता है, "हे यहोवा, हम लोगों पर अनुग्रह कर; हम तेरी ही बाट जोहते हैं।" बीच में उजड़े राजमार्गों, टूटी वाचा और कुम्हलाए लबानोन का शोक है। फिर परमेश्वर स्वयं उठ खड़े होते हैं, और अंत में एक नगर दिखाई देता है जिसका कोई खूँटा कभी उखाड़ा न जाएगा, जहाँ "कोई निवासी न कहेगा कि मैं रोगी हूँ"।

मर्म

ध्यान दीजिए कि आयत 14 में थरथराने वाले अन्यजाति नहीं, "सिय्योन के पापी" हैं। यही इस अध्याय का धर्मशास्त्रीय केंद्र है: परमेश्वर की पवित्रता पक्षपाती नहीं है। जो आग देश-देश के लोगों को फूँके हुए चूने के समान कर देती है, वही आग परमेश्वर के अपने नगर में बैठे हुए भक्तिहीनों को भी काँपा देती है। उद्धार यहाँ परमेश्वर से बचकर भागना नहीं, बल्कि उनके पास रहना है, और यही सबसे डरावनी बात है। इसलिए आयत 6 धन की नई परिभाषा देती है: "यहोवा का भय उसका धन होगा।" जहाँ अश्शूर के पास हथियार और कर वसूलने वाले थे, वहाँ सिय्योन की पूँजी न्याय, बुद्धि और परमेश्वर का भय है। आयत 22 इसे तीन बार दोहराती है: यहोवा ही न्यायी, हाकिम और राजा हैं, और इसीलिए वही उद्धार भी करेंगे।

सूत्र

आयत 15 का उत्तर ईमानदारी से पढ़िए: ऊँचे स्थानों में वही निवास करेगा जो धार्मिकता से चलता, घूस नहीं लेता, खून की बात सुनने से कान बन्द करता है। यह सूची किसी को आराम नहीं देती; यह प्रश्न को और गहरा करती है। और फिर आयत 17 कुछ ऐसा कहती है जो आज्ञा नहीं, वरदान है: "तू अपनी आँखों से राजा को उसकी शोभा सहित देखेगा।" यही वह धागा है जो यशायाह से सुसमाचार तक खिंचता है। यूहन्ना लिखता है कि वचन देहधारी हुआ और "हमने उसकी महिमा देखी" (यूहन्ना 1:14)। भस्म करनेवाली आग के सामने खड़ा होने योग्य एक ही मनुष्य निकला, और वह अपनी योग्यता हमें सौंपता है। आयत 24 का अंतिम शब्द इसीलिए क्षमा है, शर्त नहीं।

दर्पण

आयत 15 की सूची आश्चर्यजनक रूप से सांसारिक है: पैसा, जबान, कान और आँख। "अंधेर के लाभ से घृणा" उस बिल के बारे में है जिसे आपने थोड़ा बढ़ाकर भेजा। "घूस नहीं लेता" उस चुप्पी के बारे में है जो किसी एहसान के बदले खरीदी जाती है। और "खून की बात सुनने से कान बन्द करता" तथा "बुराई देखने से आँख मूँद लेता" उस चीज़ के बारे में है जिसे हम रात को मनोरंजन कहकर देखते हैं, दूसरों की बदनामी, हिंसा, घोटाले, जिनसे हमें कोई असुविधा नहीं होती क्योंकि हम उनमें शामिल नहीं हैं। यशायाह कहता है: आँख और कान भी पवित्रता के अंग हैं। आज अपने फोन में वह एक खाता या समूह खोलिए जहाँ से आप नियमित रूप से दूसरों की बदनामी या हिंसा का तमाशा पाते हैं, और अभी, इसी समय, उसे हटा दीजिए।

शास्त्र का संवाद

आयत 14 का प्रश्न नया नहीं है। भजन 24 भी पूछता है कि यहोवा के पवित्र स्थान पर कौन खड़ा हो सकता है, और वहाँ भी उत्तर साफ हाथ और सच्चे मन का है। अंतर यह है कि यशायाह में यह प्रश्न आराधना के शांत वातावरण में नहीं, जलते हुए देश के बीच पूछा जाता है। और इब्रानियों का लेखक, जो परमेश्वर को भस्म करनेवाली आग कहता है, इसी यशायाह की भाषा उठाकर नई वाचा के विश्वासियों पर लगाता है। अर्थात मसीह में आने का अर्थ यह नहीं कि आग ठंडी हो गई; अर्थ यह है कि अब हम उस आग के भीतर जीना सीखते हैं, जलकर नहीं, शुद्ध होकर।

एक बारीकी

आयत 20 में यरूशलेम को "विश्राम का स्थान" और तम्बू कहा गया है, जिसका खूँटा कभी न उखड़ेगा और "न कोई रस्सी कभी टूटेगी"। यह अजीब है: तम्बू तो स्वभाव से ही अस्थायी चीज़ है, खूँटे और रस्सियाँ इसलिए होती हैं कि कल उखाड़कर आगे बढ़ा जा सके। यशायाह जानबूझकर सबसे कमज़ोर ढाँचे की तस्वीर चुनता है और उसे अनंत कह देता है। और तीन आयतों बाद वही शब्द लौटता है, पर दुश्मन के जहाज़ पर: "तेरी रस्सियाँ ढीली हो गईं।" जिसके पास शोभायमान जहाज़ थे, उसकी रस्सियाँ ढीली पड़ीं; और जिसके पास केवल तम्बू है, उसकी रस्सी कभी नहीं टूटती। स्थायित्व सामग्री में नहीं, निवासी में है, क्योंकि "वहाँ महाप्रतापी यहोवा हमारे लिये रहेगा"।

कठिन प्रश्न

"कोई निवासी न कहेगा कि मैं रोगी हूँ" पढ़कर कोई भी ईमानदार पाठक रुक जाता है। हमारे गिरजों में लोग कैंसर से मरते हैं, और बहुत से भक्त लोग बिस्तर पर पड़े-पड़े क्षमा की आशा में ही चले जाते हैं। यशायाह यह नहीं बताता कि यह कब होगा, और वह बताने का वादा भी नहीं करता। वह केवल दो चीज़ों को एक साथ बाँध देता है: बीमारी का अंत और अधर्म की क्षमा। यह सांत्वना भी है और ठेस भी, क्योंकि इसका अर्थ है कि हमारी देह की टूटन और हमारे पाप की जड़ एक ही गहराई में जुड़ी हैं, और उनमें से एक का इलाज हमें अभी मिल चुका है, दूसरे का नहीं। उस असमानता के साथ जीना ही विश्वास है। यशायाह उसे सुलझाता नहीं; वह नगर की ओर उँगली उठाकर चुप हो जाता है।

मनन

आयत 6 कहती है कि यहोवा का भय ही धन है। आपके जीवन में वास्तव में किस चीज़ को "आधार" माना जाता है, जब पैसा या सुरक्षा हिल जाए?

आयत 15 की चार बातों में से कौन-सी आपके लिए सबसे असुविधाजनक है, और क्यों?

Isaiah में और गहराई से जानें

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Isaiah 33 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

यशायाह 33 का क्या अर्थ है?
सिय्योन के बीचोंबीच एक चीख उठती है: "हम में से कौन प्रचण्ड आग में रह सकता?" अध्याय उस नाश करनेवाले पर "हाय" से शुरू होता है जिसने अब तक केवल नाश किया है और कभी नाश नहीं हुआ, फिर अचानक प्रार्थना में बदल जाता है, "हे यहोवा, हम लोगों पर अनुग्रह कर; हम तेरी ही बाट जोहते हैं।" बीच में उजड़े राजमार्गों, टूटी वाचा और कुम्हलाए लबानोन का शोक है। फिर परमेश्वर स्वयं उठ खड़े होते हैं, और अंत में एक नगर दिखाई देता है जिसका कोई खूँटा कभी उखाड़ा न जाएगा, जहाँ "कोई निवासी न कहेगा कि मैं रोगी हूँ"।
यशायाह 33 किस विषय में है?
आयत 15 का उत्तर ईमानदारी से पढ़िए: ऊँचे स्थानों में वही निवास करेगा जो धार्मिकता से चलता, घूस नहीं लेता, खून की बात सुनने से कान बन्द करता है। यह सूची किसी को आराम नहीं देती; यह प्रश्न को और गहरा करती है। और फिर आयत 17 कुछ ऐसा कहती है जो आज्ञा नहीं, वरदान है: "तू अपनी आँखों से राजा को उसकी शोभा सहित देखेगा।" यही वह धागा है जो यशायाह से सुसमाचार तक खिंचता है। यूहन्ना लिखता है कि वचन देहधारी हुआ और "हमने उसकी महिमा देखी" (यूहन्ना 1:14)। भस्म करनेवाली आग के सामने खड़ा होने योग्य एक ही मनुष्य निकला, और वह अपनी योग्यता हमें सौंपता है। आयत 24 का अंतिम शब्द इसीलिए क्षमा है, शर्त नहीं।
यशायाह 33 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
आयत 14 का प्रश्न नया नहीं है। भजन 24 भी पूछता है कि यहोवा के पवित्र स्थान पर कौन खड़ा हो सकता है, और वहाँ भी उत्तर साफ हाथ और सच्चे मन का है। अंतर यह है कि यशायाह में यह प्रश्न आराधना के शांत वातावरण में नहीं, जलते हुए देश के बीच पूछा जाता है। और इब्रानियों का लेखक, जो परमेश्वर को भस्म करनेवाली आग कहता है, इसी यशायाह की भाषा उठाकर नई वाचा के विश्वासियों पर लगाता है। अर्थात मसीह में आने का अर्थ यह नहीं कि आग ठंडी हो गई; अर्थ यह है कि अब हम उस आग के भीतर जीना सीखते हैं, जलकर नहीं, शुद्ध होकर।
यशायाह 33 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
"कोई निवासी न कहेगा कि मैं रोगी हूँ" पढ़कर कोई भी ईमानदार पाठक रुक जाता है। हमारे गिरजों में लोग कैंसर से मरते हैं, और बहुत से भक्त लोग बिस्तर पर पड़े-पड़े क्षमा की आशा में ही चले जाते हैं। यशायाह यह नहीं बताता कि यह कब होगा, और वह बताने का वादा भी नहीं करता। वह केवल दो चीज़ों को एक साथ बाँध देता है: बीमारी का अंत और अधर्म की क्षमा। यह सांत्वना भी है और ठेस भी, क्योंकि इसका अर्थ है कि हमारी देह की टूटन और हमारे पाप की जड़ एक ही गहराई में जुड़ी हैं, और उनमें से एक का इलाज हमें अभी मिल चुका है, दूसरे का नहीं। उस असमानता के साथ जीना ही विश्वास है। यशायाह उसे सुलझाता नहीं; वह नगर की ओर उँगली उठाकर चुप हो जाता है।
यशायाह 33 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
आयत 15 की चार बातों में से कौन-सी आपके लिए सबसे असुविधाजनक है, और क्यों?
हमारे साझेदारों के सहयोग से संभव

Isaiah 33 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

प्रार्थना संपादकीय पर पद 2

पिता, हर सुबह मेरी ताकत तू ही बन। मैं तेरी राह देखता हूँ, कभी धीरज से, कभी थककर। मुझ पर दया कर और जब दिन भारी लगे, तब मुझे थामे रख। मुश्किल की घड़ी में मेरा सहारा तू ही है, और यही मेरे लिए काफ़ी है।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 19

अश्शूर की सेना फाटकों पर खड़ी थी, और सबसे डरावना था उनका बोलना, ऐसी भाषा जो कोई समझ न पाए। डर अक्सर ऐसे ही आता है, बिना समझ में आए, बस एक शोर बनकर। पर परमेश्वर कहता है, "तू उस भयंकर जाति को फिर न देखेगा।" वह आवाज़ सदा तेरे कानों में नहीं गूँजेगी। एक दिन चुप्पी आएगी, और उस चुप्पी में तू उसका जाना पहचाना स्वर सुनेगा।

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