बाइबल व्याख्या

यशायाह 55:3

बाइबल

पाठ

"कान लगाओ, और मेरे पास आओ; सुनो, तब तुम जीवित रहोगे।" तीन आदेश, और तीनों कान से जुड़े हैं: ध्यान दो, निकट आओ, सुनो। और इनके बाद जो वादा आता है वह भोजन या पानी नहीं, बल्कि जीवन ही है। फिर परमेश्वर एक कदम और आगे बढ़ते हैं: "मैं तुम्हारे साथ सदा की वाचा बाँधूँगा, अर्थात् दाऊद पर की अटल करुणा की वाचा।" यानी जो कृपा किसी समय एक राजा के घराने से जुड़ी थी, वह अब प्यासे, कंगाल, खाली हाथ आए लोगों के हाथ में सौंपी जा रही है। सुनना और जीना यहाँ एक ही क्रिया के दो नाम बन जाते हैं।

मूल बात

गौर कीजिए कि परमेश्वर यहाँ कोई शर्त नहीं गिनाते। वे यह नहीं कहते, "सुधर जाओ, तब मैं वाचा बाँधूँगा।" वे कहते हैं, सुनो, और जियो, और वाचा मेरी ओर से आएगी। वाचा परमेश्वर का काम है, हमारा नहीं; हमारा हिस्सा केवल कान है। और यह बात असहज करती है, क्योंकि हम कुछ देकर कुछ पाने के आदी हैं।

"अटल करुणा" के पीछे इब्रानी शब्द हेसेद है, वह निष्ठावान प्रेम जो वादा तोड़ना जानता ही नहीं। दाऊद का घराना निर्वासन में मिट चुका था, सिंहासन खाली था, और तब भी परमेश्वर उसी घराने की करुणा को "अटल" कहते हैं। यही इस पद का केंद्र है: परमेश्वर की विश्वसनीयता हमारी विफलता से बड़ी है। प्रश्न यह नहीं कि क्या वाचा टिकेगी, प्रश्न यह है कि क्या हम सुनने के लिए ठहरेंगे।

बड़ी कहानी का सूत्र

दाऊद से किया गया वादा इस्राएल की सबसे बड़ी उम्मीद और सबसे गहरा घाव, दोनों था। एक स्थायी सिंहासन का वचन, और सामने खाली खंडहर। यशायाह इस वादे को तोड़ता नहीं, वह उसे फैला देता है। अगले ही पद में परमेश्वर कहते हैं कि उन्होंने उसको "राज्य-राज्य के लोगों के लिये साक्षी और प्रधान और आज्ञा देनेवाला ठहराया है।" जो वाचा एक वंश की थी, वह अब जातियों तक पहुँचती है। पौलुस ने अन्ताकिया की सभा में यही पद उठाकर कहा कि यीशु के जी उठने में दाऊद की वे अटल करुणाएँ पूरी हुईं। यानी सिंहासन खाली नहीं रहा; वह खाली कब्र से भरा गया। और वाचा का रूप बदला: अब वह एक व्यक्ति में है, जिसे सुनकर लोग जीते हैं।

आईना

पद 2 का प्रश्न आज भी चुभता है: हम उस चीज़ के लिये क्यों परिश्रम करते हैं जिससे पेट नहीं भरता? यह केवल पैसे की बात नहीं। यह उस थकान की बात है जो महीने के अंत में बचती है, उस दौड़ की जिसमें पदोन्नति मिल जाती है पर नींद नहीं, उन रिश्तों की जिन्हें हम व्यस्तता से जोड़े रखने की कोशिश करते हैं। और गौर करें: परमेश्वर का उपाय हमारी अपेक्षा से कितना छोटा है। वे और मेहनत नहीं माँगते, वे कान माँगते हैं। यही सबसे कठिन है, क्योंकि सुनने में हम कुछ नियंत्रित नहीं कर पाते। शायद हमारी बहरापन कोई विद्रोह नहीं, केवल शोर है जिसे हमने खुद चुना है।

आज शाम भोजन से पहले अपना फोन दूसरे कमरे में रखिए, और दस मिनट बैठकर यह पद तीन बार धीरे-धीरे ऊँची आवाज़ में पढ़िए, फिर चुप रहिए।

पहले सुननेवाले

ये लोग बाबेल में थे, या हाल ही में लौटे थे। न मंदिर, न राजा, न सेना। उनके लिए "दाऊद" शब्द किसी जीवित संस्था का नाम नहीं था, बल्कि एक बंद अध्याय था, जैसे किसी मिट चुके गाँव का नाम। जब परमेश्वर उसी घराने की करुणा को "अटल" कहते हैं, तो यह उनके कानों में लगभग उपहास जैसा लग सकता था, या फिर साँस लौटाने वाली खबर। और ध्यान दें कि वाचा किसी विजयी राष्ट्र से नहीं बाँधी जा रही, बल्कि उन लोगों से जिनके पास "रुपया न हो।" निर्वासन ने उनसे सौदेबाज़ी की सारी ताकत छीन ली थी। ठीक उसी हालत में उन्हें वाचा का भागी बनाया जा रहा है।

शास्त्र की गूँज

भजन 89 इस पद की पृष्ठभूमि है और उसका उलटा भी। वह भजन दाऊद की वाचा को गाता है और फिर फूट-फूटकर शिकायत करता है कि सिंहासन धूल में गिरा दिया गया। यशायाह 55 उस शिकायत का उत्तर है: वाचा टूटी नहीं, उसका दायरा खुल गया। दूसरी गूँज इसी अध्याय के भीतर है, पद 11 में, जहाँ परमेश्वर का वचन बारिश की तरह व्यर्थ नहीं लौटता। यानी जो शब्द पद 3 में हमें "सुनो" कहता है, वही शब्द अपने आप में फलदायक शक्ति रखता है। हमें सुनने के लिए पहले योग्य बनने की ज़रूरत नहीं; वचन सुनने की क्षमता अपने साथ लाता है।

पृष्ठभूमि

यशायाह के इस हिस्से की हवा छठी शताब्दी ईसा पूर्व की है: निर्वासन का अंत, घर लौटने की पुकार। पद 1 की भाषा बाज़ार की है, जहाँ पानी बेचनेवाले चिल्लाकर ग्राहक बुलाते थे। परमेश्वर उसी आवाज़ में बोलते हैं, पर दाम मिटा देते हैं। और प्राचीन पूर्व में वाचा राजा बाँधता था, अपनी शर्तों पर, अपने अधीनस्थों के साथ; यहाँ राजा वाचा बाँधने आ रहे हैं उनके साथ जिनके पास देने को कुछ नहीं। यह सामाजिक व्यवस्था को उलट देता है। सुनना यहाँ विनम्रता का कार्य है, क्योंकि जो सुनता है वह मानता है कि जीवन उसके भीतर से नहीं, बाहर से आता है।

चिंतन के प्रश्न

मेरे जीवन में वह कौन-सी चीज़ है जिसके लिये मैं सबसे ज़्यादा परिश्रम करता हूँ, और क्या वह सचमुच मेरा पेट भरती है?

अगर परमेश्वर की करुणा मेरी विफलता के बाद भी "अटल" है, तो मैं आज किस बात को उनसे छिपाना बंद कर सकता हूँ?

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Isaiah 55:3 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

यशायाह 55:3 का क्या अर्थ है?
"कान लगाओ, और मेरे पास आओ; सुनो, तब तुम जीवित रहोगे।" तीन आदेश, और तीनों कान से जुड़े हैं: ध्यान दो, निकट आओ, सुनो। और इनके बाद जो वादा आता है वह भोजन या पानी नहीं, बल्कि जीवन ही है। फिर परमेश्वर एक कदम और आगे बढ़ते हैं: "मैं तुम्हारे साथ सदा की वाचा बाँधूँगा, अर्थात् दाऊद पर की अटल करुणा की वाचा।" यानी जो कृपा किसी समय एक राजा के घराने से जुड़ी थी, वह अब प्यासे, कंगाल, खाली हाथ आए लोगों के हाथ में सौंपी जा रही है। सुनना और जीना यहाँ एक ही क्रिया के दो नाम बन जाते हैं।
यशायाह 55:3 किस विषय में है?
"अटल करुणा" के पीछे इब्रानी शब्द हेसेद है, वह निष्ठावान प्रेम जो वादा तोड़ना जानता ही नहीं। दाऊद का घराना निर्वासन में मिट चुका था, सिंहासन खाली था, और तब भी परमेश्वर उसी घराने की करुणा को "अटल" कहते हैं। यही इस पद का केंद्र है: परमेश्वर की विश्वसनीयता हमारी विफलता से बड़ी है। प्रश्न यह नहीं कि क्या वाचा टिकेगी, प्रश्न यह है कि क्या हम सुनने के लिए ठहरेंगे।
यशायाह 55:3 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
पद 2 का प्रश्न आज भी चुभता है: हम उस चीज़ के लिये क्यों परिश्रम करते हैं जिससे पेट नहीं भरता? यह केवल पैसे की बात नहीं। यह उस थकान की बात है जो महीने के अंत में बचती है, उस दौड़ की जिसमें पदोन्नति मिल जाती है पर नींद नहीं, उन रिश्तों की जिन्हें हम व्यस्तता से जोड़े रखने की कोशिश करते हैं। और गौर करें: परमेश्वर का उपाय हमारी अपेक्षा से कितना छोटा है। वे और मेहनत नहीं माँगते, वे कान माँगते हैं। यही सबसे कठिन है, क्योंकि सुनने में हम कुछ नियंत्रित नहीं कर पाते। शायद हमारी बहरापन कोई विद्रोह नहीं, केवल शोर है जिसे हमने खुद चुना है।
यशायाह 55:3 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
ये लोग बाबेल में थे, या हाल ही में लौटे थे। न मंदिर, न राजा, न सेना। उनके लिए "दाऊद" शब्द किसी जीवित संस्था का नाम नहीं था, बल्कि एक बंद अध्याय था, जैसे किसी मिट चुके गाँव का नाम। जब परमेश्वर उसी घराने की करुणा को "अटल" कहते हैं, तो यह उनके कानों में लगभग उपहास जैसा लग सकता था, या फिर साँस लौटाने वाली खबर। और ध्यान दें कि वाचा किसी विजयी राष्ट्र से नहीं बाँधी जा रही, बल्कि उन लोगों से जिनके पास "रुपया न हो।" निर्वासन ने उनसे सौदेबाज़ी की सारी ताकत छीन ली थी। ठीक उसी हालत में उन्हें वाचा का भागी बनाया जा रहा है।
यशायाह 55:3 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
यशायाह के इस हिस्से की हवा छठी शताब्दी ईसा पूर्व की है: निर्वासन का अंत, घर लौटने की पुकार। पद 1 की भाषा बाज़ार की है, जहाँ पानी बेचनेवाले चिल्लाकर ग्राहक बुलाते थे। परमेश्वर उसी आवाज़ में बोलते हैं, पर दाम मिटा देते हैं। और प्राचीन पूर्व में वाचा राजा बाँधता था, अपनी शर्तों पर, अपने अधीनस्थों के साथ; यहाँ राजा वाचा बाँधने आ रहे हैं उनके साथ जिनके पास देने को कुछ नहीं। यह सामाजिक व्यवस्था को उलट देता है। सुनना यहाँ विनम्रता का कार्य है, क्योंकि जो सुनता है वह मानता है कि जीवन उसके भीतर से नहीं, बाहर से आता है।
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Isaiah 55 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 9

यह वचन अकेला नहीं खड़ा है। इससे ठीक पहले परमेश्वर दुष्ट को बुलाता है कि वह लौट आए, क्योंकि वह "बहुत क्षमा करेगा।" और फिर कहता है, "जैसे आकाश पृथ्वी से ऊँचा है, वैसे ही मेरी गति तुम्हारी गति से और मेरे विचार तुम्हारे विचारों से ऊँचे हैं।" यानी उसकी ऊँचाई तुझे डराने के लिए नहीं, तेरी छोटी सी क्षमा की नाप को तोड़ने के लिए है। तू अपने आप को जितना माफ कर सकता है, वह उससे कहीं आगे जाता है।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 13

भटकटैया की सन्ती सनौबर, और बिच्छू पेड़ की सन्ती मेंहदी उगेगी।" काँटे तो शाप की निशानी थे, आदम की मिट्टी की कहानी। परमेश्वर उन्हें बस उखाड़ता नहीं, वही मिट्टी में सुगंध वाला पेड़ लगाता है। तेरे जीवन की जो जगह सबसे चुभती है, वही उसके नाम का सदा का चिन्ह बन सकती है।

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