यिर्मयाह 11:16
पाठ
एक ही वाक्य में दो दुनियाँ हैं। पहले हिस्से में परमेश्वर अपनी प्रजा को नाम देते हैं: "हरा, मनोहर, सुन्दर फलवाला जैतून", यानी वह पेड़ जो सदाबहार है, जिसकी छाया में बैठा जा सकता है, जिसका फल तेल देता है। दूसरे हिस्से में वही परमेश्वर एक बड़े शोरगुल के बीच उसी पेड़ में आग लगा देते हैं और उसकी डालियाँ तोड़ दी जाती हैं। नाम देनेवाला और जलानेवाला एक ही है। यही इस आयत की चुभन है, और इसे कम करके पढ़ना बेईमानी होगी।
मर्म
ध्यान दीजिए कि परमेश्वर पहले नाम बताते हैं, फिर न्याय। यहूदा जैतून का पेड़ इसलिए नहीं था कि उसने खुद को उगाया, बल्कि इसलिए कि "सेनाओं का यहोवा, जिसने तुझे लगाया" (व. 17)। पहचान अनुग्रह से मिली थी, कमाई हुई नहीं थी। पर अनुग्रह से मिली पहचान अनुग्रह का बीमा नहीं है। जो पेड़ फल देने के लिए लगाया गया था और उसकी जगह बाल की वेदियाँ उगाता है, वह सिर्फ बेकार नहीं होता, वह झूठ बोलने लगता है। यहाँ परमेश्वर की जलन किसी चिड़चिड़े देवता का गुस्सा नहीं, बल्कि उस माली का दुःख है जिसने खुद यह पेड़ लगाया था। न्याय परमेश्वर का अपना नुकसान है।
जीवन-सूत्र
तोड़ी हुई डालियों की यह तस्वीर बाइबल में मरती नहीं। पौलुस रोमियों 11 में ठीक इसी छवि को उठाते हैं: कुछ डालियाँ तोड़ी गईं, और जंगली जैतून की डालियाँ, यानी अन्यजाति, उसी जड़ में लगाई गईं। यानी यिर्मयाह की आग अंतिम शब्द नहीं थी; परमेश्वर ने पेड़ को उखाड़ा नहीं, छाँटा। और इसी अध्याय में एक और सूत्र चमकता है। यिर्मयाह कहते हैं, "मैं तो वध होनेवाले भेड़ के बच्चे के समान अनजान था" (व. 19), और उसके शत्रु कहते हैं, "आओ, हम फल समेत इस वृक्ष को उखाड़ दें"। जो शाप वाचा तोड़नेवालों पर था (व. 3), वह अंत में उस निर्दोष पर गिरा जो लकड़ी पर टाँगा गया। गलातियों 3:13 यही कहता है: मसीह हमारे लिए शापित बने। जैतून का पेड़ जलाया गया, ताकि जड़ जीवित रहे।
दर्पण
यह आयत उस भरोसे पर हाथ रखती है जो हम अपनी धार्मिक पहचान में जमा करते हैं। आप कलीसिया में सेवा करते हैं, आपका नाम अच्छा है, लोग कहते हैं कि आपका परिवार "विश्वासी परिवार" है। यहूदा के पास मन्दिर था, वाचा थी, और परमेश्वर का दिया हुआ सुन्दर नाम था। फिर भी हर सड़क पर एक और वेदी थी। हमारी वेदियाँ भी गली-गली फैली हैं: बचत खाते में सुरक्षा, बच्चों की सफलता में अपनी कीमत, काम की व्यस्तता में अपनी अहमियत। हम उन्हें त्यागते नहीं, बस यहोवा के साथ जोड़ लेते हैं। आयत 15 इसे सीधे कहती है: "जब तू बुराई करती है, तब प्रसन्न होती है।" सबसे खतरनाक पाप वह है जिससे हमें अब भी मज़ा आता है।
पृष्ठभूमि
यह बात सातवीं शताब्दी ईसा पूर्व के अंत की है, यरूशलेम के अंतिम दशकों की। अश्शूर ढह रहा है, बाबेल उठ रहा है, और यहूदा के राजा मिस्र और बाबेल के बीच झूलते हुए राजनीति खेल रहे हैं। योशिय्याह के सुधार के बाद भी लोगों के घरों और गलियों में बाल की उपासना लौट आई थी। "बड़े हुल्लड़ के शब्द" का चित्र संभवतः घेराबंदी का शोर है: सेना की चीख, शहर पर हमला। यिर्मयाह खुद याजकों के गाँव अनातोत से थे, और उनके अपने गाँववाले उनकी जान के प्यासे हो गए (व. 21)। यानी जो पेड़ जलाया जा रहा था, उसकी एक डाली स्वयं भविष्यद्वक्ता का घर था।
शास्त्र-संवाद
यही जैतून का पेड़ आगे यीशु की कहानी में लौटता है। वे जैतून पहाड़ पर से यरूशलेम को देखकर रोए, और गतसमनी, जिसका अर्थ ही "तेल का कोल्हू" है, उस बाग में उन्होंने वह प्याला स्वीकार किया जो यहूदा के लिए बना था। यह रूपक-खेल नहीं, बल्कि परमेश्वर के काम करने का ढंग है: जहाँ कुचला जाता है, वहीं तेल निकलता है। दूसरी ओर गलातियों 3:13 का दावा इस अध्याय की पहली आयतों के बिना खोखला है। "श्रापित है वह मनुष्य, जो इस वाचा के वचन न माने" (व. 3) पढ़े बिना क्रूस केवल एक दुखद घटना है। इसे पढ़ने के बाद क्रूस अदला-बदली है।
श्रोता
यिर्मयाह के सुननेवाले मन्दिर के आँगन में खड़े लोग थे, जिन्हें पक्का यकीन था कि परमेश्वर अपने ही घर को नहीं छोड़ेंगे। उनके कानों में "जैतून" शब्द अपमान नहीं, गर्व था: जैतून का तेल दीपक जलाता था, याजकों और राजाओं का अभिषेक करता था, घावों पर लगता था। और फिर वही वक्ता कहता है कि यह पेड़ आग की लपटों में है। इससे भी कठोर आयत 14 है: भविष्यद्वक्ता को प्रार्थना करने से मना कर दिया गया। उन्होंने वह सुना जो हम आसानी से चूक जाते हैं, कि परमेश्वर का धीरज असीम नहीं, अनंत नहीं खिंचता। पर यह भी सच है कि जड़ जलकर राख नहीं हुई, और वहीं से मसीह में हमारी टहनी जुड़ी है।
चिंतन
आपके जीवन की कौन सी "सड़क" है जहाँ आपने यहोवा की उपासना के साथ-साथ चुपचाप एक और वेदी बना रखी है, और आप उसे छोड़ना क्यों नहीं चाहते?
यदि तोड़ी गई डालियों में आप स्वयं को नहीं, बल्कि मसीह को देखते हैं जिसने शाप अपने ऊपर लिया, तो यह आपकी आज की आज्ञाकारिता को डर से नहीं बल्कि कृतज्ञता से कैसे बदलता है?
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Jeremiah 11:16 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
यिर्मयाह 11:16 का क्या अर्थ है?
यिर्मयाह 11:16 किस विषय में है?
यिर्मयाह 11:16 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
यिर्मयाह 11:16 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
यिर्मयाह 11:16 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Jeremiah 11 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
उस समय से लेकर आज के दिन तक मैं उनको चिताता आया हूँ, वरन् बड़े यत्न से यह कहता आया हूँ कि मेरे वचन को मानो।" सदियों बीत गए, पर परमेश्वर थका नहीं। वह आज भी तुझसे वही बात दोहरा रहा है जो तूने पिछले साल अनसुनी कर दी थी। सोच, कितनी बार उसने तुझे चेताया है, और तू हर बार कहता रहा, बाद में।
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