बाइबल व्याख्या

यिर्मयाह 44

बाइबल
यह अध्याय JL Group के सहयोग से संभव हुआ है

पाठ

निर्वासित यहूदियों का एक समूह मिस्र के मिग्दोल, तहपन्हेस, नोप और पत्रोस में बसा हुआ है, और वहीं यिर्मयाह उन्हें परमेश्वर का वचन सुनाता है: यरूशलेम का उजाड़ तुम्हारी आँखों के सामने है, फिर भी तुम वही कर रहे हो जिसने उसे उजाड़ा। लोग खुली सभा में उत्तर देते हैं कि वे नहीं सुनेंगे, क्योंकि जब तक वे "स्वर्ग की रानी" को धूप जलाते रहे, उनका पेट भरा रहा। यिर्मयाह इसका उत्तर एक शपथ से देता है: मिस्र में बसे यहूदियों पर तलवार और अकाल आएगा, और अन्त में यह प्रश्न सुलझेगा कि "किसका वचन पूरा हुआ, मेरा या उनका।"

मर्म

यह अध्याय दिखाता है कि मनुष्य इतिहास से भी वही अर्थ निकालता है जो उसका मन पहले से चाहता है। लोगों के पास वही तथ्य हैं जो यिर्मयाह के पास हैं: शहर जला, लोग मरे, देश सूना पड़ा। पर उनकी व्याख्या उलटी है। परमेश्वर कहते हैं, तुमने मूर्तिपूजा की इसलिए विपत्ति आई; वे कहते हैं, हमने मूर्तिपूजा छोड़ी इसलिए विपत्ति आई। यही धर्म का सबसे खतरनाक रूप है: वह जो आँकड़ों से चलता है, जो पूछता है कि किस देवता से पेट भरता है। यहाँ परमेश्वर स्वयं पर शपथ खाते हैं (पद 26), क्योंकि अब प्रश्न पापियों का नहीं, परमेश्वर के नाम की सच्चाई का है।

मुख्य सूत्र

मिस्र लौटना केवल भूगोल नहीं, यह उद्धार-इतिहास का उलटा चलना है। व्यवस्थाविवरण 28:68 में शाप की चरम सीमा यही थी कि परमेश्वर लोगों को फिर मिस्र लौटा देंगे, उसी घर में जहाँ से उन्हें बलवन्त हाथ से निकाला गया था। निर्गमन की कहानी यहाँ पीछे की ओर चलती है, और जो बचा हुआ अंश (इब्रानी में शेएरीत) लौटने की आशा था, वह स्वयं को मिटा रहा है। पर ध्यान दीजिए पद 28: "थोड़े ही होंगे।" न्याय के भीतर भी एक छोटा-सा दरवाज़ा खुला रहता है। यही वह पतला धागा है जो अन्ततः उस एक सच्चे बचे हुए तक पहुँचता है, जो मिस्र से बुलाया गया और जिसने अपने लोगों के लिए शाप अपने ऊपर लिया।

दर्पण

पद 17 की तर्कशैली हमारे भीतर भी बैठी है। हम भी हिसाब लगाते हैं: उन वर्षों में जब मैंने ईमानदारी के बारे में इतना नहीं सोचा, कारोबार अच्छा चला; जब से मैं गंभीरता से चलने लगा, बीमारी, तनाव, आर्थिक तंगी। यह होशे 2 की उस पत्नी की भाषा है जो कहती थी कि रोटी और ऊन उसके प्रेमियों से मिलते हैं, जबकि वे परमेश्वर के हाथ से आते थे। हम आराधना को परिणामों से नापते हैं, और जब परिणाम बिगड़ें, तो पुराने "काम करने वाले" तरीकों की ओर लौट जाते हैं: जोड़-तोड़, चापलूसी, छोटा-सा झूठ, वह रिश्ता जो सुरक्षा देता है। आज दस मिनट निकालिए और एक कागज़ पर वह एक चीज़ लिखिए जिसके बिना आप सोचते हैं कि आपका जीवन नहीं चलेगा, और उसी कागज़ पर ऊपर लिखिए: "प्रभु यहोवा के जीवन की सौगन्ध।"

श्रोताओं का परिचय

ये लोग शरणार्थी थे, हारे हुए और अपमानित। उन्होंने अपने राजा की आँखें फूटते देखी थीं, मन्दिर जलते देखा था। मिस्र में वे किसी की दया पर जी रहे थे। ऐसे लोगों से यह कहना कि तुम्हारी विपत्ति तुम्हारा अपना काम है, क्रूर लगता है, और वे इसे क्रूर ही सुनते हैं। उनके कानों में पद 15 की बात महत्वपूर्ण थी: यह पूरी सभा का उत्तर है, पति-पत्नी मिलकर, पद 19 में स्त्रियाँ स्पष्ट करती हैं कि उनके पतियों की अनुमति से ही यह होता था। यह छिपा हुआ पाप नहीं, सार्वजनिक, पारिवारिक, सुव्यवस्थित धर्म था, जिसमें चन्द्राकार रोटियाँ पकती थीं और पूरा घर शामिल था।

पृष्ठभूमि

यह 586 ईसा पूर्व के कुछ वर्ष बाद का दृश्य है। गदल्याह की हत्या के बाद बचे हुए लोग बेबीलोन के प्रतिशोध के डर से मिस्र भाग आए और यिर्मयाह को अपने साथ घसीट लाए। मिग्दोल से लेकर दक्षिणी पत्रोस तक फैले ये यहूदी अब एक बिखरा हुआ प्रवासी समाज हैं। "स्वर्ग की रानी" संभवतः वह देवी थी जिसकी पूजा यरूशलेम में भी घर-घर होती थी; यिर्मयाह 7:18 में पूरा परिवार मिलकर उसके लिए रोटियाँ पकाता है, बच्चे लकड़ी बीनते हैं। अध्याय के अन्त में फ़िरौन होप्रा का नाम आता है, और यही चिन्ह है: जिस शक्ति की छाया में वे छिपे हैं, वह स्वयं गिरने वाली है।

मुख्य पात्र

केन्द्र में परमेश्वर हैं, और उनका चित्र यहाँ सहज नहीं। पद 4 में वे "बड़े यत्न से" भविष्यद्वक्ता भेजते रहे, यह एक थके हुए पर हार न मानने वाले प्रेम की भाषा है। पद 27 में वही परमेश्वर कहते हैं, "अब मैं उनकी भलाई नहीं, हानि ही की चिन्ता करूँगा।" यह विरोधाभास नहीं, यह लंबे धैर्य का अन्तिम पड़ाव है। पद 25 में एक कड़वी विडंबना है: "अब तुम अपनी-अपनी मन्नतों को मानकर पूरी करो!" परमेश्वर उन्हें उनकी अपनी चुनी हुई चीज़ के हवाले कर देते हैं। और अन्त में सब कुछ इस पर टिकता है कि किसका वचन खड़ा रहेगा, जो व्यवस्थाविवरण में सच्चे नबी की एकमात्र कसौटी थी। इतिहास ही निर्णायक गवाह बनेगा।

मनन के प्रश्न

आप अपने जीवन के किन वर्षों को "भले चंगे" कहते हैं, और उस आकलन में आपने किन चीज़ों को जान-बूझकर गिनती से बाहर रखा है?

यदि परमेश्वर आज आपसे कहें, "अपनी-अपनी मन्नतों को मानकर पूरी करो," तो आपके भीतर कौन-सी मन्नत काँप उठेगी?

Jeremiah में और गहराई से जानें

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The Message of Jeremiah

Christopher Wright

Walks with the weeping prophet and the God whose word will not fail.

Jeremiah and Lamentations: An Introduction and Commentary

Hetty Lalleman

A trusted Tyndale commentary: compact, careful and clear on every passage.

Jeremiah, Lamentations

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Jeremiah 44 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

यिर्मयाह 44 का क्या अर्थ है?
निर्वासित यहूदियों का एक समूह मिस्र के मिग्दोल, तहपन्हेस, नोप और पत्रोस में बसा हुआ है, और वहीं यिर्मयाह उन्हें परमेश्वर का वचन सुनाता है: यरूशलेम का उजाड़ तुम्हारी आँखों के सामने है, फिर भी तुम वही कर रहे हो जिसने उसे उजाड़ा। लोग खुली सभा में उत्तर देते हैं कि वे नहीं सुनेंगे, क्योंकि जब तक वे "स्वर्ग की रानी" को धूप जलाते रहे, उनका पेट भरा रहा। यिर्मयाह इसका उत्तर एक शपथ से देता है: मिस्र में बसे यहूदियों पर तलवार और अकाल आएगा, और अन्त में यह प्रश्न सुलझेगा कि "किसका वचन पूरा हुआ, मेरा या उनका।"
यिर्मयाह 44 किस विषय में है?
मिस्र लौटना केवल भूगोल नहीं, यह उद्धार-इतिहास का उलटा चलना है। व्यवस्थाविवरण 28:68 में शाप की चरम सीमा यही थी कि परमेश्वर लोगों को फिर मिस्र लौटा देंगे, उसी घर में जहाँ से उन्हें बलवन्त हाथ से निकाला गया था। निर्गमन की कहानी यहाँ पीछे की ओर चलती है, और जो बचा हुआ अंश (इब्रानी में शेएरीत) लौटने की आशा था, वह स्वयं को मिटा रहा है। पर ध्यान दीजिए पद 28: "थोड़े ही होंगे।" न्याय के भीतर भी एक छोटा-सा दरवाज़ा खुला रहता है। यही वह पतला धागा है जो अन्ततः उस एक सच्चे बचे हुए तक पहुँचता है, जो मिस्र से बुलाया गया और जिसने अपने लोगों के लिए शाप अपने ऊपर लिया।
यिर्मयाह 44 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
ये लोग शरणार्थी थे, हारे हुए और अपमानित। उन्होंने अपने राजा की आँखें फूटते देखी थीं, मन्दिर जलते देखा था। मिस्र में वे किसी की दया पर जी रहे थे। ऐसे लोगों से यह कहना कि तुम्हारी विपत्ति तुम्हारा अपना काम है, क्रूर लगता है, और वे इसे क्रूर ही सुनते हैं। उनके कानों में पद 15 की बात महत्वपूर्ण थी: यह पूरी सभा का उत्तर है, पति-पत्नी मिलकर, पद 19 में स्त्रियाँ स्पष्ट करती हैं कि उनके पतियों की अनुमति से ही यह होता था। यह छिपा हुआ पाप नहीं, सार्वजनिक, पारिवारिक, सुव्यवस्थित धर्म था, जिसमें चन्द्राकार रोटियाँ पकती थीं और पूरा घर शामिल था।
यिर्मयाह 44 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
केन्द्र में परमेश्वर हैं, और उनका चित्र यहाँ सहज नहीं। पद 4 में वे "बड़े यत्न से" भविष्यद्वक्ता भेजते रहे, यह एक थके हुए पर हार न मानने वाले प्रेम की भाषा है। पद 27 में वही परमेश्वर कहते हैं, "अब मैं उनकी भलाई नहीं, हानि ही की चिन्ता करूँगा।" यह विरोधाभास नहीं, यह लंबे धैर्य का अन्तिम पड़ाव है। पद 25 में एक कड़वी विडंबना है: "अब तुम अपनी-अपनी मन्नतों को मानकर पूरी करो!
यिर्मयाह 44 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
यदि परमेश्वर आज आपसे कहें, "अपनी-अपनी मन्नतों को मानकर पूरी करो," तो आपके भीतर कौन-सी मन्नत काँप उठेगी?

Jeremiah 44 में आपको क्या स्पर्श करता है?

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