अय्यूब 1:20
पाठ
चार दूत एक के बाद एक आते हैं, हर एक का वाक्य उसी एक पंक्ति पर टूटता है: "मैं ही अकेला बचकर तुझे समाचार देने को आया हूँ।" आखिरी दूत के शब्द अभी हवा में काँप ही रहे हैं कि अय्यूब उठता है। बैठा हुआ आदमी खड़ा होता है। वह अपना बागा फाड़ता है, सिर मुँड़ाता है, और फिर भूमि पर गिर पड़ता है। पर गिरना यहाँ हार नहीं है; वह दण्डवत् है। जिस क्षण उसके पास खोने को कुछ नहीं बचा, उसी क्षण वह मिट्टी पर झुककर परमेश्वर की आराधना करता है। एक ही पद में तीन शोक-क्रियाएँ और एक उपासना-क्रिया साथ-साथ चलती हैं, बिना किसी विरोधाभास के, मानो दुःख और भक्ति एक ही साँस के दो हिस्से हों।
मूल बात
यह पद हमें वह दिखाता है जिसे हमारी धार्मिकता अक्सर अलग-अलग खानों में रखती है: खुला शोक और सच्ची आराधना एक ही शरीर में रह सकते हैं। अय्यूब अपने दुःख को दबाता नहीं; फटा हुआ बागा और मुँड़ा हुआ सिर उस समय की सबसे ऊँची आवाज़ वाली पीड़ा थी, एक सार्वजनिक घोषणा कि यह आदमी भीतर से टूट चुका है। और ठीक उसी हालत में वह झुकता है। इसका अर्थ यह नहीं कि उसने नुकसान को छोटा कर दिया, बल्कि यह कि उसने परमेश्वर को नुकसान से बड़ा माना। शैतान का दाँव यही था कि आशीष हटते ही भक्ति भी हट जाएगी, कि अय्यूब का परमेश्वर असल में उसकी सम्पत्ति है। यह पद उस दाँव का उत्तर है: परमेश्वर स्वयं अपने वरदानों के बिना भी आराधना के योग्य हैं। यही इस पूरी पुस्तक की नींव है।
जोड़ने वाला सूत्र
अय्यूब का झुकना इस्राएल की कहानी में बार-बार लौटता है: वह आदमी जो सब खो चुका है और फिर भी परमेश्वर के सामने मिट्टी पर गिरता है। पर यह सूत्र अपने सबसे गहरे बिंदु पर गतसमनी के बाग में पहुँचता है, जहाँ यीशु मसीह भी भूमि पर गिर पड़ते हैं, उनके सामने भी सब कुछ छिन जाने वाला है, और वे भी पिता की इच्छा के आगे झुकते हैं। अय्यूब नंगा आया और नंगा लौटने की बात करता है; मसीह सचमुच नंगे किए जाकर क्रूस पर लटकाए गए, सबसे पूरा नुकसान, सबसे गहरी आराधना। अय्यूब का यह क्षण भविष्यवाणी नहीं है, पर यह वही आकार है जो बाद में मसीह में पूरा भरा जाता है: दुःख जो परमेश्वर से दूर नहीं भगाता, बल्कि उनके चरणों तक ले आता है।
दर्पण
हम में से अधिकांश को यह भय सताता है कि यदि सचमुच सब छिन गया, तो हमारा विश्वास टिकेगा या नहीं। नौकरी जाने की खबर, डॉक्टर की रिपोर्ट, बैंक का फोन, बच्चे का वह निर्णय जिसने घर का माहौल बदल दिया। और हमारी पहली प्रतिक्रिया अक्सर दो में से एक होती है: या तो हम दुःख को आध्यात्मिक मुस्कान के नीचे छिपा देते हैं, या फिर आराधना को ही स्थगित कर देते हैं जब तक हालात सुधर न जाएँ। अय्यूब दोनों से इनकार करता है। वह रोता भी है और झुकता भी है, उसी मिनट में। इसका मतलब है कि आपको ठीक होने का इंतज़ार किए बिना परमेश्वर के सामने आने की अनुमति है। आज ही, जहाँ आप हैं वहीं घुटनों पर बैठिए, अपने सबसे ताज़े नुकसान का नाम ऊँची आवाज़ में बोलिए, और उसके तुरंत बाद कहिए: "यहोवा का नाम धन्य है।"
एक बारीकी
ध्यान दीजिए कि पद की पहली क्रिया है "अय्यूब उठा।" गिरने से पहले वह खड़ा होता है। यह छोटी-सी बात आसानी से छूट जाती है, पर यह सब कुछ बदल देती है। अय्यूब टूटकर ढह नहीं जाता; वह जानबूझकर उठता है, जैसे कोई अदालत में खड़ा होता है, और फिर अपनी मर्ज़ी से भूमि पर गिरता है। उसका गिरना दुर्घटना नहीं, निर्णय है। इब्रानी में जिस शब्द का अनुवाद "दण्डवत्" हुआ है, वह दरबार में राजा के आगे माथा टेकने के लिए इस्तेमाल होता था, पूरा शरीर ज़मीन पर, पूरा समर्पण। यानी अय्यूब पीड़ा के नीचे नहीं दबा; वह परमेश्वर के सामने झुका। वही शरीर जो शोक में फटे कपड़े पहने है, वही शरीर उपासना की मुद्रा में है।
शास्त्र-संवाद
एज्रा अध्याय 9 में एज्रा भी अपना वस्त्र फाड़ता है और बाल नोचता है, पर वहाँ कारण पाप है, राष्ट्र का अपराध। अय्यूब के पास कबूल करने को कोई पाप नहीं, और यही इस दृश्य की चुभन है: वही शोक-चिह्न, पर बिना किसी अपराधबोध के। दूसरी ओर पतरस की वह बात याद आती है कि परमेश्वर के बलवन्त हाथ के नीचे अपने आप को नम्र करो, क्योंकि समय पर वही ऊँचा उठाएँगे। अय्यूब उस वचन का जीवित रूप है, और यह महत्वपूर्ण है कि उसे ऊँचा उठाए जाने का कोई आश्वासन अभी नहीं मिला है। वह अंधेरे में झुकता है, वादे की रसीद हाथ में लिए बिना। ऐसी ही नम्रता की परीक्षा होती है।
मुख्य पात्र
अय्यूब इस दृश्य में न तो पत्थर है और न ही काँच। पत्थर होता तो न फाड़ता, न मुँड़ाता; काँच होता तो केवल बिखरता और झुकने की ताकत न बचती। वह एक ऐसा आदमी है जिसका भीतर सचमुच चिथड़े हुआ है और जिसकी नींव फिर भी हिली नहीं। उसके पास कोई व्याख्या नहीं है, कोई धर्मशास्त्र नहीं जो चार दूतों की खबरों को समझा सके, स्वर्ग की उस बातचीत का उसे ज़रा भी पता नहीं जो अध्याय के शुरू में हुई थी। उसके पास केवल परमेश्वर हैं, और वह उन्हीं से चिपक जाता है। यह अंधा आज्ञापालन नहीं, बल्कि वर्षों की जानी-पहचानी निकटता का फल है। जो आदमी अच्छे दिनों में भोर को उठकर अपने बच्चों के लिए बलि चढ़ाता था, वही बुरे दिन में भी उठकर झुकना जानता है।
चिंतन के प्रश्न
आपके जीवन में कौन-सा नुकसान ऐसा है जिसे आपने अब तक परमेश्वर के सामने खुलकर रोया नहीं, केवल सहा है?
यदि आज आपकी सारी आशीषें हटा ली जाएँ, तो आपकी आराधना में क्या बचेगा, और वह क्या बताता है कि आप असल में किसकी उपासना करते रहे हैं?
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Job 1:20 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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वह अब तक कह ही रहा था, कि" यही वाक्य चौथी बार दोहराया जाता है। दुख ने अय्यूब को साँस लेने का एक पल भी नहीं दिया। कभी तेरे साथ भी ऐसा हुआ है, कि एक बोझ उठाया नहीं और दूसरा आ गिरा? ध्यान दे, आखिरी खबर उन बच्चों के बारे में थी जो साथ बैठे खा-पी रहे थे। खुशी के बीच ही तूफान आया। फिर भी अय्यूब झुककर दंडवत करता है।
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