बाइबल व्याख्या

अय्यूब 1:21

बाइबल

पाठ

अय्यूब ने अभी-अभी चार दूतों के मुँह से एक ही वाक्य चार बार सुना है: "मैं ही अकेला बचकर तुझे समाचार देने को आया हूँ।" पशु गए, सेवक गए, और अंत में दसों सन्तान एक ही आँधी में दब गईं। इसके बाद वह उठता है, बागा फाड़ता है, सिर मुँड़ाता है, और भूमि पर गिरकर दण्डवत् करता है। और वहीं, मिट्टी में औंधे मुँह पड़ा हुआ, वह कहता है कि वह अपनी माँ के पेट से नंगा आया था और नंगा ही लौट जाएगा; जो कुछ उसके पास था वह यहोवा का दिया हुआ था, और यहोवा ने ही वापस ले लिया है। फिर वह शिकायत नहीं, बल्कि आशीर्वाद उच्चारता है: "यहोवा का नाम धन्य है।"

मर्म

ध्यान दीजिए कि अय्यूब शैतान का, शेबा के लुटेरों का, कसदियों का या आँधी का नाम तक नहीं लेता। वह सीधे यहोवा तक जाता है, और यही इस वचन की चुभन है: वह परमेश्वर को उस हानि से अलग नहीं करता जो उस पर पड़ी है। यहाँ कोई सुविधाजनक धर्मशास्त्र नहीं है जो परमेश्वर को निर्दोष साबित करने के लिए उन्हें घटना से बाहर खड़ा कर दे। साथ ही अय्यूब यह भी नहीं कहता कि परमेश्वर ने उसका हक छीना है। जन्म की नग्नता उसका तर्क है: जिसके पास आते समय कुछ न था, उससे कुछ चुराया नहीं जा सकता। सब कुछ उधार था, वरदान था, अनुग्रह था। इसलिए विश्वास यहाँ लेन-देन नहीं रह जाता; वह उस परमेश्वर से लिपटा रहना है जिसने देना और लेना, दोनों अपने हाथ में रखा है।

सूत्र

अय्यूब की यह प्रार्थना बाइबल की एक लम्बी रेखा का हिस्सा है: वह रेखा जिसमें मनुष्य परमेश्वर के हाथ से दुःख लेता है और फिर भी उन्हीं का नाम पुकारता है। नग्न आना और नग्न लौटना केवल एक कड़वी समझदारी नहीं, यह सृष्टि की सच्चाई है। मिट्टी से बना मनुष्य मिट्टी में लौटता है, और बीच का सब कुछ उपहार है। इस रेखा का अन्तिम बिंदु क्रूस है, जहाँ एक निर्दोष व्यक्ति सचमुच नंगा किया गया, जिसके वस्त्र सैनिकों ने बाँट लिए, और जिसने अपनी आत्मा पिता के हाथों में सौंप दी। अय्यूब अनजाने में उस मुद्रा का पूर्वाभास देता है: हानि के बीच भी परमेश्वर को छोड़ना नहीं, बल्कि उन्हीं में गिर जाना। अन्तर यह है कि अय्यूब को अंत में सब लौटाया गया; मसीह ने लौटने का रास्ता हमारे लिए खोला।

दर्पण

हममें से अधिकांश "यहोवा ने दिया" बड़ी सरलता से कहते हैं। बेटे की नौकरी लगी, घर की किस्त चुक गई, जाँच रिपोर्ट साफ आई, तो यह वाक्य सहज निकलता है। कठिनाई दूसरे आधे में है। जब कम्पनी ने बिना कारण निकाल दिया, जब गर्भ ठहरा नहीं, जब माता-पिता की स्मृति धीरे-धीरे मिटने लगी, तब "यहोवा ही ने लिया" कहना गले में अटकता है, क्योंकि भीतर कहीं हमने मान लिया था कि ये चीज़ें हमारी सम्पत्ति हैं, उधार नहीं। अय्यूब का वाक्य हमारे मालिकाना हक पर चोट करता है, और साथ ही एक अजीब हल्कापन देता है: जो कभी मेरा था ही नहीं, उसे खोने पर मैं मिटता नहीं। आज एक काम कीजिए: कागज़ पर उस एक व्यक्ति का नाम लिखिए जिसे खोने से आप सबसे अधिक डरते हैं, उस नाम पर उँगली रखकर ऊँची आवाज़ में कहिए, "यहोवा ने दिया," और फिर वह कागज़ प्रार्थना में परमेश्वर के सामने रख दीजिए।

श्रोता

पहले सुनने वालों के लिए यह कहानी किसी सुदूर नायक की नहीं थी। वे ऐसे समाज में रहते थे जहाँ सन्तान, पशुधन और सेवक ही बीमा, पेंशन और प्रतिष्ठा थे; उनका छिन जाना केवल दुःख नहीं, सामाजिक मृत्यु थी। और उनके धर्मशास्त्र में एक गहरी मान्यता बैठी थी: धर्मी फलता-फूलता है, दुष्ट नष्ट होता है। अय्यूब की धार्मिकता पहले ही पद में दर्ज है, इसलिए उसकी तबाही उनके पूरे हिसाब-किताब को उलट देती है। वे यह भी जानते थे कि बागा फाड़ना और सिर मुँड़ाना शोक की सार्वजनिक भाषा है, एक सामूहिक चीख। पर उसी मुद्रा में दण्डवत् और आशीर्वाद, यह उन्होंने कहीं नहीं सुना था। श्रोता यहीं सन्न रह जाते हैं: शोक और आराधना एक ही साँस में।

मुख्य पात्र

अय्यूब यहाँ पत्थर का सन्त नहीं है। वह कपड़े फाड़ता है, सिर मुँड़ाता है, ज़मीन पर गिर पड़ता है; उसका शरीर पूरा शोक मनाता है। जो लोग सोचते हैं कि विश्वास का अर्थ संयत मुस्कान है, उन्हें यह दृश्य सुधारना चाहिए। साथ ही वह गिरता है तो आराधना में गिरता है। उसकी आत्मा का नक्शा दो दिशाओं में एक साथ खिंचा हुआ है: असह्य पीड़ा और अडिग भरोसा, बिना एक-दूसरे को रद्द किए। और यह स्थिर मूर्ति नहीं है। तीसरे अध्याय में यही आदमी अपने जन्मदिन को शाप देगा, परमेश्वर से बहस करेगा, जवाब माँगेगा। इसलिए पद इक्कीस को "सही प्रतिक्रिया का फार्मूला" बनाना गलत होगा; यह एक जीवित मनुष्य का पहला, ईमानदार कदम है।

अन्तर्पाठ

सभोपदेशक इसी सच्चाई को ठंडे स्वर में दोहराता है: मनुष्य माँ के पेट से नंगा आता है और अपनी मेहनत का कुछ भी हाथ में लेकर नहीं जाता। पौलुस तीमुथियुस को यही याद दिलाता है, और उसमें से सन्तोष का तर्क निकालता है। पर सबसे तीखी गूँज नाओमी के मुँह में है: वह कहती है कि वह भरी-पूरी निकली थी और यहोवा ने उसे खाली लौटाया, और इसलिए वह अपना नाम ही कड़वाहट रख लेती है। वही धर्मशास्त्र, वही परमेश्वर, पर दूसरा स्वर। बाइबल दोनों को जगह देती है; वह हमें आशीर्वाद और उलाहना के बीच चुनने को मजबूर नहीं करती। और रूत की पुस्तक दिखाती है कि नाओमी का खालीपन भी अंततः भरा गया, ठीक जैसे अय्यूब का।

मनन

आपके जीवन में वह कौन-सी चीज़ है जिसे आप भीतर से "मेरी" कहते हैं, "दी हुई" नहीं?

क्या आपकी प्रार्थना में शोक और आराधना एक साथ रह सकते हैं, या आप परमेश्वर के सामने आने से पहले अपना दुःख छिपा लेते हैं?

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Job 1:21 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

अय्यूब 1:21 का क्या अर्थ है?
अय्यूब ने अभी-अभी चार दूतों के मुँह से एक ही वाक्य चार बार सुना है: "मैं ही अकेला बचकर तुझे समाचार देने को आया हूँ।" पशु गए, सेवक गए, और अंत में दसों सन्तान एक ही आँधी में दब गईं। इसके बाद वह उठता है, बागा फाड़ता है, सिर मुँड़ाता है, और भूमि पर गिरकर दण्डवत् करता है। और वहीं, मिट्टी में औंधे मुँह पड़ा हुआ, वह कहता है कि वह अपनी माँ के पेट से नंगा आया था और नंगा ही लौट जाएगा; जो कुछ उसके पास था वह यहोवा का दिया हुआ था, और यहोवा ने ही वापस ले लिया है। फिर वह शिकायत नहीं, बल्कि आशीर्वाद उच्चारता है: "यहोवा का नाम धन्य है।"
अय्यूब 1:21 किस विषय में है?
अय्यूब की यह प्रार्थना बाइबल की एक लम्बी रेखा का हिस्सा है: वह रेखा जिसमें मनुष्य परमेश्वर के हाथ से दुःख लेता है और फिर भी उन्हीं का नाम पुकारता है। नग्न आना और नग्न लौटना केवल एक कड़वी समझदारी नहीं, यह सृष्टि की सच्चाई है। मिट्टी से बना मनुष्य मिट्टी में लौटता है, और बीच का सब कुछ उपहार है। इस रेखा का अन्तिम बिंदु क्रूस है, जहाँ एक निर्दोष व्यक्ति सचमुच नंगा किया गया, जिसके वस्त्र सैनिकों ने बाँट लिए, और जिसने अपनी आत्मा पिता के हाथों में सौंप दी। अय्यूब अनजाने में उस मुद्रा का पूर्वाभास देता है: हानि के बीच भी परमेश्वर को छोड़ना नहीं, बल्कि उन्हीं में गिर जाना। अन्तर यह है कि अय्यूब को अंत में सब लौटाया गया; मसीह ने लौटने का रास्ता हमारे लिए खोला।
अय्यूब 1:21 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
पहले सुनने वालों के लिए यह कहानी किसी सुदूर नायक की नहीं थी। वे ऐसे समाज में रहते थे जहाँ सन्तान, पशुधन और सेवक ही बीमा, पेंशन और प्रतिष्ठा थे; उनका छिन जाना केवल दुःख नहीं, सामाजिक मृत्यु थी। और उनके धर्मशास्त्र में एक गहरी मान्यता बैठी थी: धर्मी फलता-फूलता है, दुष्ट नष्ट होता है। अय्यूब की धार्मिकता पहले ही पद में दर्ज है, इसलिए उसकी तबाही उनके पूरे हिसाब-किताब को उलट देती है। वे यह भी जानते थे कि बागा फाड़ना और सिर मुँड़ाना शोक की सार्वजनिक भाषा है, एक सामूहिक चीख। पर उसी मुद्रा में दण्डवत् और आशीर्वाद, यह उन्होंने कहीं नहीं सुना था। श्रोता यहीं सन्न रह जाते हैं: शोक और आराधना एक ही साँस में।
अय्यूब 1:21 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
सभोपदेशक इसी सच्चाई को ठंडे स्वर में दोहराता है: मनुष्य माँ के पेट से नंगा आता है और अपनी मेहनत का कुछ भी हाथ में लेकर नहीं जाता। पौलुस तीमुथियुस को यही याद दिलाता है, और उसमें से सन्तोष का तर्क निकालता है। पर सबसे तीखी गूँज नाओमी के मुँह में है: वह कहती है कि वह भरी-पूरी निकली थी और यहोवा ने उसे खाली लौटाया, और इसलिए वह अपना नाम ही कड़वाहट रख लेती है। वही धर्मशास्त्र, वही परमेश्वर, पर दूसरा स्वर। बाइबल दोनों को जगह देती है; वह हमें आशीर्वाद और उलाहना के बीच चुनने को मजबूर नहीं करती। और रूत की पुस्तक दिखाती है कि नाओमी का खालीपन भी अंततः भरा गया, ठीक जैसे अय्यूब का।
अय्यूब 1:21 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
क्या आपकी प्रार्थना में शोक और आराधना एक साथ रह सकते हैं, या आप परमेश्वर के सामने आने से पहले अपना दुःख छिपा लेते हैं?
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Job 1 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 18

वह अब तक कह ही रहा था, कि" यही वाक्य चौथी बार दोहराया जाता है। दुख ने अय्यूब को साँस लेने का एक पल भी नहीं दिया। कभी तेरे साथ भी ऐसा हुआ है, कि एक बोझ उठाया नहीं और दूसरा आ गिरा? ध्यान दे, आखिरी खबर उन बच्चों के बारे में थी जो साथ बैठे खा-पी रहे थे। खुशी के बीच ही तूफान आया। फिर भी अय्यूब झुककर दंडवत करता है।

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