अय्यूब 10
पाठ
अय्यूब राख के ढेर पर बैठा है और चुप रहने से इनकार कर देता है। वह परमेश्वर पर मुकदमा दायर करता है: मुझे बताइए कि आप मुझ पर किस आरोप में लड़ रहे हैं, क्योंकि आप तो जानते हैं कि मैं दुष्ट नहीं हूँ। फिर वह उसी हाथ की याद दिलाता है जिसने उसे गूँधा, दूध की तरह उँडेला, चमड़े और नसों से बुना, और अंत में बस एक ही माँग करता है: मुझसे मुँह फेर लीजिए, थोड़ी देर साँस लेने दीजिए, इससे पहले कि मैं उस देश में चला जाऊँ जहाँ से कोई नहीं लौटता।
मर्म
अय्यूब की भाषा अदालती है। प्राचीन पूर्व में न्याय नगर के फाटक पर होता था, खुले में, गवाहों और बुज़ुर्गों के सामने; वहाँ अभियुक्त को यह जानने का अधिकार था कि उस पर आरोप क्या है। अय्यूब ठीक यही माँगता है: "मुझे बता दे, कि तू किस कारण मुझसे मुकद्दमा लड़ता है?" उसका संकट यह नहीं कि परमेश्वर हैं या नहीं; उसका संकट यह है कि परमेश्वर चुप हैं और फिर भी हाथ नहीं रोकते। यहाँ एक ऐसी आस्था बोल रही है जो परमेश्वर को छोड़ने के बजाय उन्हें कटघरे में बुलाना पसंद करती है। यह विद्रोह नहीं, यह अत्यंत गहरी निर्भरता है: जिससे शिकायत की जाए, वही एकमात्र पता है।
सूत्र
ध्यान दीजिए कि अय्यूब अपना मुकदमा किस आधार पर खड़ा करता है: सृष्टि पर। "तूने अपने हाथों से मुझे ठीक रचा है और जोड़कर बनाया है।" कुम्हार की मिट्टी, दूध का दही की तरह जमना, हड्डियों और नसों की बुनाई; ये तीनों रोज़मर्रा के दृश्य थे, आँगन में घड़ा बनता हुआ, चमड़े की थैली में दूध मथा जाता हुआ, करघे पर धागे कसे जाते हुए। अय्यूब कह रहा है: आपने मुझमें श्रम लगाया है, अब आप अपने ही काम को तोड़ क्यों रहे हैं? यही तर्क बाइबल की पूरी कहानी को आगे खींचता है। परमेश्वर अपने हाथों के काम को रद्दी नहीं करते; वे उसे छुड़ाते हैं। और अंततः वे स्वयं उस मिट्टी में उतरते हैं, क्रूस पर उसी अँधेरे को भीतर से भोगते हैं, और एक निर्दोष के मुँह से वही शिकायत फिर सुनाई देती है जो यहाँ राख पर गूँज रही है।
दर्पण
हममें से अधिकतर लोगों को सिखाया गया है कि दुख में "सही" बात बोलनी चाहिए। अस्पताल के गलियारे में, नौकरी छूटने की शाम को, उस रिपोर्ट के बाद जिसे पढ़कर हाथ काँप गए, हम अपने शब्द छाँटते हैं ताकि परमेश्वर नाराज़ न हों। अय्यूब यह छँटाई नहीं करता: "मैं अपने मन की कड़वाहट के मारे बातें करूँगा।" और यह पुस्तक अंत में उसे ही सच्चा बोलनेवाला ठहराती है, उन दोस्तों को नहीं जिन्होंने परमेश्वर के पक्ष में सफाई दी। आपकी धर्मपरायणता शायद आपकी ईमानदारी को गला घोंट रही है। पद 12 भी उसी साँस में है: "तूने मुझे जीवन दिया, और मुझ पर करुणा की है।" कृतज्ञता और शिकायत एक ही प्रार्थना में रह सकती हैं। आज, अकेले में, ज़ोर से बोलकर परमेश्वर से अपनी एक सबसे कड़वी शिकायत कहिए, बिना उसे धार्मिक शब्दों में लपेटे, बिना अंत में "फिर भी" जोड़े।
अंतर्पाठ
भजन 139 में वही गर्भ और वही बुनाई है, पर वहाँ से आराधना फूटती है: जाननेवाला परमेश्वर सुरक्षा है। अय्यूब उसी चित्र को उलट देता है; जो हाथ बुनता है वही अब पकड़ता है, और जानना निगरानी जैसा लगने लगता है। दोनों भजन सच हैं, और विश्वास में ऐसे दिन आते हैं जब दूसरा वाला ही बोल पाता है। दूसरी गूँज यिर्मयाह 20 है, जहाँ नबी अपने जन्मदिन को कोसता है, ठीक अय्यूब के "तूने मुझे गर्भ से क्यों निकाला?" की तरह। यह संयोग नहीं कि दोनों परमेश्वर के सबसे वफ़ादार सेवक हैं। बाइबल ऐसी आवाज़ों को निकालती नहीं, बचा रखती है, मानो वह जानती हो कि किसी दिन हमें उनकी ज़रूरत पड़ेगी।
संदर्भ
दृश्य की कल्पना कीजिए: बस्ती के बाहर वह जगह जहाँ कूड़ा जलाया जाता था, राख और दुर्गंध, और उस पर बैठा एक आदमी जो कुछ हफ़्ते पहले नगर के फाटक पर सबसे सम्मानित कुर्सी पर बैठता था। उस समाज में समृद्धि परमेश्वर की स्वीकृति का सार्वजनिक प्रमाण मानी जाती थी; इसलिए अय्यूब की फोड़ों से भरी देह हर राहगीर के लिए एक फ़ैसला थी। तीन मित्र आए हैं, और उनका धर्मशास्त्र साफ़ है: दुख पाप का हिसाब है। अय्यूब के पास पुनरुत्थान की स्पष्ट आशा नहीं थी; मृत्यु का अर्थ था "घोर अंधकार के देश", जहाँ "प्रकाश भी ऐसा है जैसा अंधकार।" यही उसके आक्रोश को समझाता है: उसके पास इसी जीवन में न्याय पाने के अलावा कोई विकल्प नहीं।
प्रश्न
पद 13 में अय्यूब एक भयानक बात कहता है: "तूने ऐसी बातों को अपने मन में छिपा रखा; मैं तो जान गया, कि तूने ऐसा ही करने को ठाना था।" यानी यह दुर्घटना नहीं, योजना है, और परमेश्वर ने उसे छिपाकर रखा। क्या वह गलत है? अध्याय 1 और 2 पढ़कर हम जानते हैं कि स्वर्ग में कुछ हुआ था जिसकी ख़बर अय्यूब को कभी नहीं दी गई, न तब, न पुस्तक के अंत में। परमेश्वर उत्तर में आते हैं, पर कारण नहीं बताते। यह असहज है और इसे चिकना करना बेईमानी होगी। बाइबल हमें यह नहीं सिखाती कि छिपा हुआ कुछ नहीं है; वह सिखाती है कि जो छिपा है वह उन्हीं हाथों में है जिन्होंने हमें गूँधा। यह उत्तर नहीं, पता है।
चिंतन
आपकी प्रार्थनाओं में कौन सी कड़वाहट अब तक शब्द नहीं बन पाई, और आप किससे डरते हैं कि उसे कहने पर क्या होगा?
जिन लोगों के दुख को आप चुपचाप "किसी कारण" से जोड़ देते हैं, क्या आप उनके साथ अय्यूब की तरह बिना उत्तर के बैठ सकते हैं?
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Job 10 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
अय्यूब 10 का क्या अर्थ है?
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अय्यूब 10 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
अय्यूब 10 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Job 10 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पिता, मेरे दिन गिनती के हैं और जल्दी बीत जाते हैं, पर तू हमेशा से है। जब मैं बेसब्र होकर पूछता हूँ कि कब तक, तब याद दिला कि तेरा समय मेरे समय जैसा नहीं। मेरी छोटी समझ को अपने धीरज में थाम ले, और इंतज़ार के बीच भी मुझे भरोसा रखना सिखा।
अय्यूब दर्द में चिल्लाते हुए भी यही याद करता है, "क्या तूने मुझे दूध के समान उण्डेलकर, पनीर के समान जमा नहीं दिया?" जिस शरीर से आज उसे इतनी पीड़ा है, उसी को उसने परमेश्वर के हाथों की कारीगरी कहा। तू भी शायद अपने जीवन से थक चुका है। पर जिसने तुझे इतनी कोमलता से गढ़ा, क्या वह अब तुझे भूल जाएगा?
अय्यूब परमेश्वर से बहस नहीं छोड़ता, वह उसी को याद दिलाता है: "स्मरण कर, कि तूने मुझे मिट्टी के समान बनाया, क्या तू मुझे फिर मिट्टी में मिला देगा?" वह अपनी अच्छाई नहीं, कुम्हार के हाथों की मेहनत सामने रखता है। तेरी दलील भी यही हो सकती है। जिसने तुझे गढ़ने में इतना समय लगाया, वह तुझे यूँ ही फेंक नहीं देगा।
अय्यूब की यह पुकार दिल चीर देती है, "फिर तू ने मुझे गर्भ से क्यों निकाला? भला होता कि मेरा प्राण निकल जाता, और कोई आँख मुझे कभी न देखती!" यह किसी नास्तिक की चीख नहीं, बल्कि एक विश्वासी की गहरी पीड़ा है जो सीधे परमेश्वर से बात कर रहा है।
कभी कभी हमारा दर्द भी इतना गहरा होता है कि हम सोचते हैं, काश मैं पैदा ही न होता। पर देखिए, अय्यूब इस दर्द को दबाता नहीं, छिपाता नहीं। वह इसे परमेश्वर के सामने रख देता है। शायद आज आपकी प्रार्थना भी ऐसी ही ईमानदार होनी चाहिए, बिना सजावट के।
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