अय्यूब 19:27
पाठ
राख के ढेर पर बैठा वह आदमी अपनी ही आँखों की ओर इशारा करता है, उन्हीं आँखों की ओर जो घावों से सूजी हुई हैं, और कहता है: इन्हीं से, किसी और की आँखों से नहीं, मैं परमेश्वर को देखूँगा। अय्यूब घोषणा करता है कि यह दर्शन उधार का नहीं होगा, न कोई दूसरा उसके बदले देखेगा, न कोई रिपोर्ट लाकर सुनाएगा। वह स्वयं, अपने लिये, आमने-सामने। और फिर वह वाक्य जो इस उम्मीद को भावुकता से बचा लेता है: "यद्यपि मेरा हृदय अन्दर ही अन्दर चूर-चूर भी हो जाए।" यानी यह विश्वास किसी सुधरती हुई हालत पर टिका नहीं है। भीतर सब कुछ टूट रहा है, और उसी टूटन के बीच से यह वाक्य निकलता है।
मूल बात
ध्यान दीजिए अय्यूब क्या नहीं माँगता। वह स्वास्थ्य नहीं माँगता, न लौटी हुई संपत्ति, न मरे हुए बच्चों की वापसी, न मित्रों से माफी। वह परमेश्वर का चेहरा माँगता है। जिस परमेश्वर पर उसने अभी-अभी इल्ज़ाम लगाया कि "उसने चारों ओर से मुझे तोड़ दिया," उसी परमेश्वर को वह देखना चाहता है, और यही इस पुस्तक का सबसे चौंकाने वाला मोड़ है। दुख की सबसे गहरी प्यास मुआवज़े की नहीं, उपस्थिति की होती है। यहाँ मुक्ति का अर्थ पहले परिस्थिति का बदलना नहीं, बल्कि उस परमेश्वर का सामने आ खड़ा होना है जो अब तक छिपा रहा। और यह आशा शरीर को नकारती नहीं; अय्यूब "शरीर में होकर" देखने की बात करता है। परमेश्वर का उत्तर आत्मा को धुएँ की तरह उड़ा देने वाला नहीं, पूरे इंसान को उसकी आँखों समेत बहाल करने वाला है।
सामान्य सूत्र
अय्यूब की यह प्यास सदियों तक अनुत्तरित लटकी रहती है। पुराने नियम में परमेश्वर का चेहरा देखना खतरनाक भी है और सबसे बड़ी लालसा भी; मूसा को केवल पीठ दिखाई जाती है। अय्यूब उस दरवाज़े पर मुक्का मारता है जो अभी बंद है, और जिस शब्द पर वह टिका है, "मेरा छुड़ानेवाला," इब्रानी में गोएल, वह उस नज़दीकी रिश्तेदार को कहते थे जो कर्ज़ चुकाकर, ज़मीन छुड़ाकर, खून का बदला लेकर अपने आदमी को वापस लाता था। अय्यूब परमेश्वर से माँग रहा है कि वे उसके रिश्तेदार बनकर खड़े हों। देह में परमेश्वर को देखने की यह असंभव माँग तब पूरी होती है जब परमेश्वर स्वयं देह लेकर खड़े होते हैं, और थोमा को अपने घाव दिखाते हैं। यूहन्ना के पहले पत्र का वह वादा कि हम उन्हें वैसा ही देखेंगे जैसे वे हैं, अय्यूब के इसी वाक्य की देर से आई प्रतिध्वनि है।
दर्पण
हम आमतौर पर दूसरों की आँखों से परमेश्वर को देखकर काम चला लेते हैं। पास्टर का उपदेश, किसी की गवाही, कोई किताब, कोई पॉडकास्ट; सब उधार का दर्शन। यह चलता रहता है जब तक ज़िंदगी सीधी चलती है। फिर बायोप्सी की रिपोर्ट आती है, या बेटा फोन उठाना बंद कर देता है, या नौकरी अचानक चली जाती है, और अचानक दूसरों का परमेश्वर काफी नहीं रहता। अय्यूब का "अपनी आँखों से, अपने लिये" वहीं से निकलता है, दूसरों के धर्मशास्त्र के मलबे में से। और ध्यान दीजिए, उसका हृदय तब भी "चूर-चूर" हो रहा है। इस पाठ का दबाव यही है कि आप अपनी टूटन को ठीक होने का इंतज़ार किए बिना, आज ही, अपने नाम से परमेश्वर के सामने खड़े हों। आज किसी शांत कोने में जाकर ऊँची आवाज़ में, अपना नाम लेकर, यह वाक्य कहिए: "मैं, अपनी इन्हीं आँखों से, आपको देखना चाहता हूँ।" बस इतना, और चुप रह जाइए।
श्रोताओं का चित्र
जिन लोगों ने यह पुस्तक पहली बार सुनी, उनके लिए मरने के बाद की स्पष्ट आशा लगभग नहीं थी। शिओल धुंधली जगह थी, जहाँ न स्तुति होती थी न स्मरण। इसलिए जीवन का हिसाब इसी जीवन में बराबर होना ज़रूरी था: धर्मी फूले-फले, दुष्ट गिरे। अय्यूब के मित्र इसी व्यवस्था के वकील हैं, और वे कोई राक्षस नहीं, वे उस समय की सबसे सम्मानित समझदारी बोल रहे हैं। श्रोता जानते थे कि एक ऐसे आदमी की बात सुन रहे हैं जिसका पूरा समाजशास्त्र गिर चुका है: दासियाँ तक उसे परदेशी गिनती हैं, पत्नी उसकी साँस से मुँह मोड़ती है। और वही आदमी कहता है कि खाल के नाश हो जाने के बाद भी वह देखेगा। यह उनके लिए सांत्वना नहीं, धमाका था, पुरानी व्यवस्था की दीवार में पड़ी दरार।
मुख्य पात्र
अय्यूब यहाँ न संत है न बागी, वह दोनों एक साथ है। उसी अध्याय में वह कहता है कि परमेश्वर ने उसे जाल में फँसाया, उसे शत्रुओं में गिना, उसकी आशा को वृक्ष की तरह उखाड़ डाला, और फिर उसी परमेश्वर को अपना छुड़ानेवाला पुकारता है। यह विरोधाभास उसकी कमज़ोरी नहीं, उसका विश्वास है। वह परमेश्वर से परमेश्वर के पास भागता है, क्योंकि उसके पास जाने की और कोई जगह नहीं। उसका भीतरी नक्शा ऐसा है: बाहर घाव, चारों ओर अजनबी चेहरे, ऊपर बंद आसमान, और उस सब के बीच एक ज़िद्दी आग जो बुझने से इनकार करती है। वह अपनी बात पत्थर पर खुदवाना चाहता है, क्योंकि उसे भरोसा है कि एक दिन कोई इसे पढ़ेगा और कहेगा: यह आदमी सही था।
संदर्भ
दृश्य शहर के बाहर का है, कूड़े और राख की जगह, जहाँ अशुद्ध और बीमार लोग फेंक दिए जाते थे। अय्यूब कभी इलाके का सबसे बड़ा आदमी था; उसका "मुकुट" उतार लिया गया है, यानी सार्वजनिक प्रतिष्ठा का वह ताज जिससे लोग फाटक पर उसकी बात मानते थे। अब वह ठीकरे से खुजलाता हुआ बैठा है। तीन मित्र आए थे शोक मनाने, पर बातचीत के तीसरे दौर में वे अभियोजक बन चुके हैं। यह अदालत का दृश्य है: आरोप, बचाव, गवाह, और एक अभियुक्त जो न्यायाधीश को ही अपना वकील बना लेना चाहता है। पद 27 उसी मुकदमे के बीच फूटा हुआ बयान है, बंद कमरे की दीवार में खुली एक खिड़की, जिसमें से अंत तक की रोशनी भीतर आती है।
चिंतन
आपका परमेश्वर का ज्ञान इस समय कितना उधार का है, और आखिरी बार आपने अपनी आँखों से क्या देखा?
अगर आपकी परिस्थिति कभी न बदले, तो क्या परमेश्वर की उपस्थिति अपने आप में आपके लिए पर्याप्त उत्तर होगी?
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Job 19:27 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
अय्यूब 19:27 का क्या अर्थ है?
अय्यूब 19:27 किस विषय में है?
अय्यूब 19:27 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
अय्यूब 19:27 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
अय्यूब 19:27 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Job 19 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
हे प्रभु, कुछ शब्द ऐसे होते हैं जो भीतर तक तोड़ देते हैं। जब अपने ही लोग मेरा दुख बढ़ाते हैं, तब मेरा मन थक जाता है। तू मेरी थकी हुई आत्मा को संभाल, और मुझे ऐसा दिल दे जो कड़वा न हो, बल्कि तुझ पर भरोसा रखे।
अय्यूब अपने मित्रों से कहता है, "तुम क्यों परमेश्वर के समान मुझे सताते हो? और मेरे माँस से क्यों तृप्त नहीं हुए?" घाव पहले से खुला है, और शब्द उसमें नमक भर रहे हैं। सोचो, कहीं तुम्हारी सही बात किसी टूटे हुए इंसान पर परमेश्वर का हाथ बनकर तो नहीं गिर रही? कभी-कभी दुखी व्यक्ति को उत्तर नहीं, बस साथ बैठा कोई चाहिए।
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