अय्यूब 4
पाठ
सात दिन की चुप्पी के बाद पहला शब्द एलीपज का है। वह अय्यूब को याद दिलाता है कि उसने कितनों को सम्भाला था, और अब अपनी ही बारी में वह टूट रहा है। फिर वह अपना सिद्धांत रखता है: निर्दोष कभी नाश नहीं होता, जो दुःख बोता है वही काटता है; और इसके प्रमाण में वह रात के एक भयानक दर्शन का हवाला देता है, जिसमें एक स्वर ने कहा कि मिट्टी के घरों में रहने वाला मनुष्य अपने सृजनहार से अधिक धर्मी नहीं हो सकता।
संदर्भ
राख के ढेर पर बैठा आदमी, देह पर फोड़े, ठीकरे से खुजलाता हुआ। गाँव के बाहर, कूड़े और जली हड्डियों की गंध के बीच, क्योंकि ऐसी बीमारी वाले को बस्ती में नहीं रखा जाता था। कुछ हफ्ते पहले यही आदमी फाटक पर बैठकर मुकदमे निपटाता था, वह "बहुतों को शिक्षा" देने वाला बड़ा आदमी था। एलीपज तेमानी है, अदोम के उस इलाके से जो प्राचीन पूर्व में अपनी बुद्धि के लिए मशहूर था। वह मित्र है, दूर से चलकर आया है, कपड़े फाड़ चुका है, सात दिन चुप बैठा है। उसकी बात असभ्य नहीं, बल्कि सभ्यता की ऊँचाई है: नपे-तुले वाक्य, कविता का ढाँचा, दर्शन का प्रमाण। इस दुनिया में दुःख कोई रहस्य नहीं था, वह एक हिसाब था।
मर्म
एलीपज की धर्मविद्या में कोई झूठ नहीं है, और यही उसे खतरनाक बनाता है। परमेश्वर पवित्र हैं, मनुष्य मिट्टी है, पाप का फल भुगतना पड़ता है: ये सब बातें सच हैं। गड़बड़ी वहाँ होती है जहाँ वह सच्चाई को उलटा घुमा देता है। "जो पाप को जोतते और दुःख बोते हैं, वही उसको काटते हैं" से वह यह निष्कर्ष निकालता है कि जो काट रहा है उसने बोया भी होगा। यही वह कदम है जो अय्यूब की पीड़ा को अपराध का सबूत बना देता है। परमेश्वर एक ऐसी व्यवस्था में बदल जाते हैं जिसका गणित हमें आता है, और तब हमें उनसे पूछने की ज़रूरत ही नहीं रहती। यह पुस्तक हमें सिखाती है कि परमेश्वर के बारे में सही वाक्य भी गलत जगह बोले जाने पर घाव करते हैं।
सूत्र
बाइबल की बड़ी कहानी में अय्यूब एक काँटा है जो हिसाब-किताब वाले धर्म को टिकने नहीं देता। एलीपज की तर्ज पर चलें तो क्रूस समझ से बाहर हो जाता है, क्योंकि वहाँ सचमुच का निर्दोष सचमुच नाश हुआ। "क्या तुझे मालूम है कि कोई निर्दोष भी कभी नाश हुआ है?" यह प्रश्न गुलगुता की ओर देखते ही ढह जाता है। यीशु मसीह के शिष्यों ने भी यही पूछा था कि जन्म से अंधा आदमी किसके पाप का नतीजा है, और उन्होंने इस पूरे ढाँचे को तोड़ दिया। मसीह में दुःख सज़ा का पैमाना नहीं रहता; वह परमेश्वर की उपस्थिति की जगह बन जाता है। और एलीपज का दूसरा सच, कि मनुष्य सृजनहार से अधिक धर्मी नहीं हो सकता, ठीक वहाँ अपना उत्तर पाता है: धार्मिकता कमाई नहीं जाती, दी जाती है।
आईना
जब किसी का धंधा डूबता है, रिपोर्ट में कैंसर निकलता है, या बेटी घर छोड़ देती है, तो हमारे भीतर का एलीपज तुरंत जाग जाता है और कारण खोजने लगता है। यह खोज दया से नहीं, डर से जन्मती है: अगर इसका कोई कारण है, तो मैं उस कारण से बच सकता हूँ, और मेरी दुनिया सुरक्षित रहेगी। इसलिए हम बीमार के बिस्तर के पास बैठकर उपदेश देने लगते हैं, क्योंकि चुप रहना हमें असुरक्षित कर देता है। ध्यान दीजिए, एलीपज की सात दिन की चुप्पी उसकी सबसे अच्छी सेवा थी। आज ही उस एक व्यक्ति को फोन कीजिए जिसके दुःख पर आपने कभी सलाह दी थी, और इस बार केवल यह कहिए: "मुझे नहीं पता क्यों, पर मैं तुम्हारे साथ हूँ।" फिर सुनिए, कुछ मत जोड़िए।
अंतर्पाठ
अय्यूब 42 में परमेश्वर स्वयं इन तीनों मित्रों से कहते हैं कि उन्होंने उनके विषय में ठीक बात नहीं कही, और उन्हें अय्यूब की प्रार्थना की ज़रूरत पड़ती है। यह अंत पढ़े बिना अध्याय 4 को सही ढंग से समझा नहीं जा सकता: यह भाषण सुंदर है, पर परमेश्वर ने इसे नामंज़ूर किया। दूसरी ओर, पद 19 की तस्वीर, "जो मिट्टी के घरों में रहते हैं," पौलुस के उस वाक्य से गूँजती है जहाँ वह हमारी देह को मिटने वाला तम्बू कहता है। फर्क नीयत का है: एलीपज इस नश्वरता से मनुष्य को चुप कराता है, पौलुस इसी से आशा निकालता है, क्योंकि वह जानता है कि तम्बू के पीछे एक स्थायी घर बनाने वाला परमेश्वर खड़ा है।
बारीकी
पद 12 के शब्द गौर से पढ़िए: "एक बात चुपके से मेरे पास पहुँचाई गई, और उसकी कुछ भनक मेरे कान में पड़ी।" भनक। एलीपज खुद मानता है कि उसने पूरा संदेश नहीं सुना, बस एक टुकड़ा। और आकृति? "मैं उसकी आकृति को पहचान न सका।" जो आत्मा उसके सामने से गुज़री, उसका चेहरा तक उसे नहीं दिखा। फिर भी इसी अधूरी, धुँधली, रोंगटे खड़े कर देने वाली रात के बल पर वह एक टूटे आदमी को यह बताने बैठ जाता है कि उसके साथ क्या हुआ और क्यों। यहीं झूठे दिलासे का असली मर्ज़ छिपा है: थोड़ा-सा रहस्योद्घाटन, बहुत-सा आत्मविश्वास। जिसने सचमुच परमेश्वर को सुना है, वह अक्सर कम बोलता है, न कि ज़्यादा।
चिंतन
आपके भीतर वह कौन-सा हिसाब है जिससे आप दूसरों के दुःख को समझाकर अपने आप को सुरक्षित महसूस करते हैं?
जब परमेश्वर के बारे में आपकी जानकारी अधूरी हो, तो आप चुप रहना चुनते हैं या बोलना, और क्यों?
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Job 4 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
गिरते हुए को तेरी बातों से सम्भाला गया, और लड़खड़ाते हुए घुटनों को तूने बलवन्त किया।" यह सच था। अय्यूब ने कितनों को थामा था। पर जब वह खुद गिरा, तो यही सच उसके मुँह पर ताना बनकर आया। सोचो, तुम भी शायद औरों को सँभालते आए हो। आज जब तुम्हारे घुटने काँप रहे हैं, तुम्हें कौन थामता है? परमेश्वर से माँगने में शर्म मत करो।
एलीपज रात के एक दर्शन का हवाला देकर कहता है, "देख, वह अपने सेवकों पर भरोसा नहीं रखता, और अपने स्वर्गदूतों में दोष पाता है।" सुनने में गहरा लगता है, पर वह इसे अय्यूब को कुचलने के लिए इस्तेमाल करता है। कभी-कभी हमारी सच्ची बातें भी गलत समय पर, टूटे हुए इंसान के सामने, पत्थर बन जाती हैं। आज किसी के दुख में बोलने से पहले रुककर पूछ: मैं सही बोल रहा हूँ, या प्रेम से बोल रहा हूँ?
पिता, मैं खुद को सही ठहराने की कोशिश में थक गया हूँ। सच तो यह है कि मेरी धार्मिकता तेरे सामने कुछ भी नहीं। मुझे अपनी पवित्रता के सामने झुकना सिखा, और अपनी दया से मुझे साफ कर। जो मैं अपने बल से नहीं कर सकता, वह तू मुझमें कर।
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