यूहन्ना 6:37
मूल पाठ
यीशु उस भीड़ से बात कर रहे हैं जो रोटी खाकर तृप्त हो चुकी थी और अब और चिन्ह माँग रही थी। ठीक इसी बिंदु पर वे कहते हैं: "जो कुछ पिता मुझे देता है वह सब मेरे पास आएगा, और जो कोई मेरे पास आएगा उसे मैं कभी न निकालूँगा।" दो हिस्से, एक ही साँस में। पहला हिस्सा आकाश की ओर देखता है: पिता देते हैं, और जो दिया गया है वह निश्चित रूप से आएगा। दूसरा हिस्सा आपकी ओर देखता है: जो आता है, उसे बाहर नहीं किया जाएगा। कभी नहीं। पिछली आयत में यीशु ने अभी-अभी शिकायत की थी कि लोग देखकर भी विश्वास नहीं करते; फिर भी वे हार नहीं मानते, बल्कि इस अटल वाक्य पर टिक जाते हैं।
केंद्रीय सत्य
यह आयत उद्धार की पूरी बनावट को दो पंक्तियों में दिखा देती है। शुरुआत परमेश्वर की ओर से होती है, आपकी ओर से नहीं। पिता देते हैं, पुत्र ग्रहण करते हैं, और इस लेन-देन के बीच में कहीं आप खड़े हैं, यह सोचते हुए कि आपने खुद निर्णय लिया। आपने लिया भी, पर वह निर्णय एक गहरी धारा के ऊपर तैरता हुआ छोटा-सा पत्ता था। इसीलिए यीशु आगे कहते हैं कि कोई उनके पास आ ही नहीं सकता जब तक पिता उसे खींच न लें। यह विचार पहले चुभता है, फिर राहत देता है: अगर मेरा आना परमेश्वर के देने पर टिका है, तो मेरा टिके रहना भी मेरी पकड़ पर नहीं, उनकी पकड़ पर टिका है। और दूसरा हिस्सा उतना ही ठोस है। यीशु यह नहीं कहते कि वे योग्य लोगों को स्वीकारेंगे। वे कहते हैं: जो आएगा, उसे मैं कभी न निकालूँगा। कोई शर्त, कोई परीक्षण, कोई प्रवेश-शुल्क नहीं। अनुग्रह यहाँ भावना नहीं, एक वचन है जिस पर मुकदमा लड़ा जा सकता है।
जोड़नेवाला धागा
यह वाक्य हवा में नहीं लटकता; यह पूरे अध्याय की मन्ना-कहानी के बीच खड़ा है। जंगल में परमेश्वर ने रोज़ रोटी दी, और लोग खाकर भी मर गए। यीशु उस पुराने नमूने को उठाकर उसका असली अर्थ खोलते हैं: पिता आज भी देते हैं, पर अब रोटी नहीं, बल्कि लोग, और वे उन्हें पुत्र के हाथ में देते हैं। यह वही परमेश्वर हैं जिन्होंने दासों के एक भीड़-समूह को चुनकर अपनी प्रजा बनाया, बिना उनकी योग्यता पूछे। वाचा हमेशा परमेश्वर की पहल से शुरू हुई है। और आगे आयत 39 में यीशु उस देने को अंतिम दिन तक खींच ले जाते हैं: "उसमें से मैं कुछ न खोऊँ परन्तु उसे अन्तिम दिन फिर जिला उठाऊँ।" देना, थामना, जिलाना; यही पूरी कहानी का धागा है, सृष्टि से पुनरुत्थान तक।
आईना
आप जानते हैं कि परमेश्वर सबको स्वीकारते हैं। जो आप नहीं मानते, वह यह है कि वे आपको स्वीकारते हैं, उस चीज़ के साथ जो आपने किसी को नहीं बताई। वही आदत जो बारह साल से लौट आती है। वह कड़वाहट जो अपने भाई के प्रति आपके भीतर बैठी है और प्रार्थना में भी नहीं पिघलती। वह रात जब आपको लगा कि परमेश्वर हैं ही नहीं। भीतर कहीं एक परखनेवाली मेज़ लगी रहती है जिस पर आप रोज़ अपने आप को तौलते हैं: पर्याप्त सेवा, पर्याप्त शांति, पर्याप्त विश्वास। और चूँकि तराजू कभी संतुलित नहीं होती, आप चुपचाप मान लेते हैं कि आप परिवीक्षा पर हैं। यीशु उस मेज़ को उलट देते हैं। वे यह नहीं कहते कि आने के बाद आपको सँभलकर रहना है ताकि निकाले न जाएँ। वे कहते हैं: निकालूँगा नहीं, कभी नहीं। दरवाज़े पर कोई चौकीदार नहीं खड़ा जो आपकी फाइल देख रहा हो।
आज यह कीजिए: एक कागज़ पर वह एक बात लिखिए जिसके कारण आपको लगता है कि परमेश्वर आपको बाहर कर सकते हैं, और उसके ठीक नीचे अपना नाम जोड़कर ज़ोर से बोलिए, "जो कोई मेरे पास आएगा उसे मैं कभी न निकालूँगा।" फिर कागज़ फाड़ दीजिए।
पृष्ठभूमि
घटना फसह के पर्व के ठीक पहले की है, गलील की झील के पार। एक दिन पहले यीशु ने पाँच हज़ार पुरुषों को खिलाया था, और भीड़ ने तुरंत उन्हें राजा बनाने की कोशिश की। यह भावुकता नहीं थी, राजनीति थी: रोमी कब्ज़े के नीचे जीते किसान-मज़दूरों के लिए मुफ़्त रोटी देनेवाला नेता ठीक वही मुक्तिदाता था जिसकी उन्हें ज़रूरत थी। यीशु भाग गए, पहाड़ पर अकेले। भीड़ नावें लेकर कफरनहूम तक उनका पीछा करती है, और आराधनालय में यह पूरी बातचीत होती है। माहौल तनावपूर्ण है: वे चिन्ह माँग रहे हैं, मूसा का हवाला दे रहे हैं, और यीशु उनकी भूख को उसकी जड़ तक खोदकर दिखा रहे हैं। आयत 37 इस टकराव के बीच से निकला हुआ वाक्य है, ठंडे कमरे का उपदेश नहीं।
पहले सुननेवाले
यूहन्ना का सुसमाचार जिन लोगों के लिए लिखा गया, उनमें बहुत से ऐसे यहूदी थे जिन्हें मसीह पर विश्वास करने के कारण आराधनालय से सचमुच बाहर निकाल दिया गया था। यूनानी क्रिया यहाँ है ἐκβάλλω ἔξω, "बाहर फेंक देना"; वही शब्द जो उस जन्मांध व्यक्ति के लिए इस्तेमाल होता है जिसे नौवें अध्याय में समाज से निकाल बाहर किया जाता है। यह मुहावरा उनके लिए केवल धार्मिक नहीं था। इसका मतलब था रिश्तेदारों का मुँह फेर लेना, व्यापार का टूटना, बच्चों की शादी का सवाल। और ठीक ऐसे लोगों के कानों में यीशु का यह वाक्य पड़ता है: तुम्हें उन्होंने बाहर किया, मैं कभी नहीं करूँगा। जिनके पास अब कोई समुदाय नहीं बचा था, उनके लिए यह घर की चाबी थी।
मुख्य पात्र
ध्यान दीजिए कि यीशु इस अस्वीकार के बीच कैसे व्यवहार करते हैं। अभी-अभी उन्होंने कहा है कि लोग देखकर भी विश्वास नहीं करते, और अगले ही साँस में वे न तो गिड़गिड़ाते हैं, न धमकाते हैं, न शर्तें नरम करते हैं। वे पिता की ओर मुड़ जाते हैं। उनकी सुरक्षा भीड़ की प्रतिक्रिया में नहीं, अपने भेजनेवाले की इच्छा में है; इसीलिए वे आगे कहते हैं कि वे अपनी इच्छा नहीं, भेजनेवाले की इच्छा पूरी करने आए हैं। यह वह आत्मविश्वास है जो अकड़ नहीं, आज्ञाकारिता है। और इसी कारण उनका "कभी न निकालूँगा" खोखला आश्वासन नहीं: जो व्यक्ति अपनी लोकप्रियता की परवाह किए बिना सच बोलता है, उसके वचन पर भरोसा किया जा सकता है। इसी अध्याय के अंत में बहुत से चेले छोड़कर चले जाते हैं, और वे उन्हें रोकने के लिए अपनी शिक्षा नहीं बदलते।
चिंतन के प्रश्न
आप अपने भीतर किस बात को "अभी भी परीक्षा-काल में" मानकर जी रहे हैं, और यीशु का "कभी न निकालूँगा" उस जगह पर क्या बदल देता है?
यदि आपका आना पिता के देने पर टिका है, तो जिन लोगों के विश्वास के लिए आप थक चुके हैं, उनके बारे में आपकी प्रार्थना का स्वर कैसे बदलेगा?
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John 6:37 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
यूहन्ना 6:37 का क्या अर्थ है?
यूहन्ना 6:37 किस विषय में है?
यूहन्ना 6:37 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
यूहन्ना 6:37 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
यूहन्ना 6:37 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
John 6 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
भीड़ ने यीशु को अपनी आँखों से देखा था, रोटी भी उन्हीं के हाथों से खाई थी, फिर भी पूछ रहे थे, "तू कौन सा चिन्ह दिखाता है?" देखना और देखना, दो अलग बातें हैं।
यीशु कहते हैं, "मेरे पिता की इच्छा यह है कि जो कोई पुत्र को देखे और उस पर विश्वास करे, वह अनन्त जीवन पाए।"
पिता की इच्छा तुझ पर कोई बोझ नहीं, बस इतनी सी है कि तू उसके बेटे को सचमुच पहचान ले। आज तू उसे किन आँखों से देख रहा है?
पिता, मेरी अपनी कोशिशें अक्सर खाली रह जाती हैं। तेरा आत्मा ही मुझमें जीवन भरता है, यह मैं भूल जाता हूँ। तेरे वचनों को सिर्फ सुनने नहीं, बल्कि उनसे जीने की भूख मुझमें जगा दे। जहाँ मैं सूख गया हूँ, वहाँ तू फिर से सांस भर दे।
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