बाइबल व्याख्या

यहोशू 1:1

बाइबल
यह वचन Faith And Grace Bible College द्वारा समर्पित है

पाठ

एक मृत्यु, और उसके बाद एक आवाज़। पूरी पुस्तक इसी सीध में खुलती है: "यहोवा के दास मूसा की मृत्यु के बाद यहोवा ने उसके सेवक यहोशू से जो नून का पुत्र था कहा,"। इतना ही। एक व्यक्ति चला गया जिसने चालीस साल तक लोगों को सँभाला था, और अब परमेश्वर उस दूसरे से बोलते हैं जो अब तक केवल पहले के पीछे-पीछे चलता रहा था। ध्यान दीजिए, वाक्य पूरा भी नहीं होता। "कहा," और फिर विराम। जो कहा गया वह अगले पद में आता है, पर इस पद में केवल यह दर्ज है कि परमेश्वर ने मौन नहीं चुना। मूसा की कब्र के ठीक बाद, परमेश्वर का मुँह खुलता है। यही इस आयत की पूरी कहानी है, और यह कम नहीं है।

मर्म

यहाँ जो सबसे गहरी बात कही जा रही है वह यह है कि परमेश्वर का वचन किसी मनुष्य की उम्र से बँधा नहीं है। मूसा मरणशील था; जिस परमेश्वर ने उससे बात की, वे नहीं। इस्राएल के लिए यह संकट का क्षण था, क्योंकि उनका पूरा विश्वास व्यावहारिक रूप से एक चेहरे पर टिका था, एक ऐसे आदमी पर जो पहाड़ पर चढ़ता और उतरकर बताता कि परमेश्वर क्या चाहते हैं। वह चेहरा अब नहीं है। और फिर भी आवाज़ है। यह अनुग्रह है, बिना किसी शर्त के: यहोशू ने माँगा नहीं, आवेदन नहीं किया, अपनी योग्यता सिद्ध नहीं की। परमेश्वर पहल करते हैं। वे ही बोलना शुरू करते हैं। हमारा धर्म इसी क्रम पर खड़ा है, पहले वे बोलते हैं, फिर हम सुनते हैं, न कि पहले हम खोजते हैं और तब वे मिलते हैं। यहाँ रुककर पूछने लायक है: जब मेरे जीवन का "मूसा" हट जाता है, तो क्या मैं उस आवाज़ को पहचान पाऊँगा जो कब्र के बाद भी बोलती है?

सूत्र

इस पद में एक नाम है जिसे बाइबल बार-बार लौटाकर लाएगी। "यहोशू" का अर्थ है "यहोवा उद्धार करते हैं", और वही नाम सदियों बाद ग्रीक रूप में यीशु बनकर मरियम के पुत्र पर रखा जाएगा। यह संयोग नहीं है, और इसे ज़बरदस्ती रूपक बनाने की ज़रूरत भी नहीं। बस इतना देखिए: मूसा, जो व्यवस्था लाया, लोगों को देश की सीमा तक ले आया पर भीतर नहीं ले जा सका। भीतर ले जाने का काम "यहोवा उद्धार करते हैं" नाम वाले को मिला। इसी अध्याय में वह शब्द भी आता है जो बाद में पूरे नए नियम में गूँजेगा, "विश्राम" (पद 13)। परमेश्वर का इतिहास एक कब्र पर रुकता नहीं; वह हर बार अगले व्यक्ति को बुलाकर आगे बढ़ता है, जब तक उस एक तक नहीं पहुँचता जिसकी कब्र भी उसे रोक न सकी।

दर्पण

यह आयत उन लोगों को छूती है जो किसी के बाद आए हैं। वह पिता जिसकी अंत्येष्टि पिछले साल हुई और जिसका फ़ोन आप अब भी अनजाने में खोजते हैं। वह शिक्षक, वह बुज़ुर्ग, वह पासबान, जिसके बिना आपकी मंडली अनाथ लगती है। या दफ़्तर का वह पद जो आपको उस व्यक्ति के जाने के बाद मिला जिसकी बराबरी आप कभी नहीं कर पाएँगे। भीतर एक डर बैठा रहता है: मैं दूसरा दर्जा हूँ, असली आदमी तो चला गया। यह पद उस डर का उत्तर तर्क से नहीं देता, आवाज़ से देता है। परमेश्वर ने यहोशू से सीधे बात की, मूसा के ज़रिए नहीं। आज कागज़ पर उस व्यक्ति का नाम लिखिए जिसकी जगह अब आप खड़े हैं, और उसके नीचे यह वाक्य लिखकर ज़ोर से पढ़िए: "परमेश्वर उससे बोले थे, और अब मुझसे बोल रहे हैं।"

बारीकी

दो अलग शब्दों पर ध्यान दीजिए। मूसा "यहोवा का दास" है, पर यहोशू "उसका सेवक" है, यानी मूसा का सेवक। मूल इब्रानी में यहोशू के लिए जो शब्द है वह है मशारेत, जिसका अर्थ है सहायक, वह जो किसी और की सेवा में खड़ा रहता है। चालीस साल तक यहोशू की पहचान यही थी: मूसा के साथ रहने वाला जवान। और यही वह क्षण है जब यह पहचान टूटती है, क्योंकि जिसकी सेवा वह करता था वह अब नहीं रहा। परमेश्वर उसे उसकी पुरानी पहचान से ही पुकारते हैं, पर उसे नया काम देते हैं। कभी-कभी परमेश्वर हमें वहीं से उठाते हैं जहाँ हम अब तक केवल किसी के पीछे खड़े थे। क्या उस पल यहोशू को अपना नया नाम सुनाई दिया, या केवल पुराना?

मुख्य पात्र

इस आयत का असली पात्र वह नहीं जिसे बुलाया गया, बल्कि वे हैं जो बुलाते हैं। यहोवा यहाँ चुप रह सकते थे। शोक की एक अवधि दी जा सकती थी, कोई अंतराल, कोई ठहराव। पर वे बोलते हैं, और लगभग तुरंत। यह परमेश्वर का स्वभाव है: वे अपने लोगों को बिना आवाज़ के नहीं छोड़ते। साथ ही ध्यान दीजिए कि वे मूसा को "मेरा दास" कहकर सम्मान देते हैं (पद 2), उसे भुलाते नहीं, पर उसकी मृत्यु को छिपाते भी नहीं। परमेश्वर वास्तविकता से मुँह नहीं मोड़ते। वे मृत्यु को नाम देकर उसके पार बोलते हैं। यही उनकी विश्वसनीयता है, कि वे न झूठा दिलासा देते हैं, न मौन।

श्रोता

जिन्होंने यह पुस्तक पहली बार सुनी, वे संभवतः बहुत बाद की पीढ़ियाँ थीं, ऐसे लोग जो जानते थे कि नेता मरते हैं, राजा गिरते हैं, मंदिर जलाए जा सकते हैं। उनके कानों में "मूसा की मृत्यु के बाद" कोई प्राचीन तिथि नहीं थी, बल्कि उनका अपना अनुभव था: वह क्षण जब लगा कि सब कुछ ख़त्म हो गया। और तब वाक्य का दूसरा हिस्सा आता था, "यहोवा ने कहा", और सुनने वालों की साँस लौटती थी। उनके लिए यह पद इतिहास की सूचना नहीं, जीवन-रेखा थी। जिस परमेश्वर ने यरदन के किनारे मौन नहीं चुना, वे बेबीलोन के किनारे भी नहीं चुनेंगे।

चिंतन

आपके जीवन में वह कौन-सी कब्र है जिसके बाद आपने मान लिया कि अब परमेश्वर कुछ नहीं कहेंगे?

यदि परमेश्वर आज आपको आपकी पुरानी पहचान से पुकारें, पर किसी नए काम के लिए, तो क्या आप उसे सुनने के लिए पर्याप्त शांत हैं?

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Joshua: An Introduction and Commentary

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Joshua

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Explains what it meant then, and bridges it honestly to life now.

Joshua and the Flow of Biblical History

Francis Schaeffer

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Joshua 1:1 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

यहोशू 1:1 का क्या अर्थ है?
एक मृत्यु, और उसके बाद एक आवाज़। पूरी पुस्तक इसी सीध में खुलती है: "यहोवा के दास मूसा की मृत्यु के बाद यहोवा ने उसके सेवक यहोशू से जो नून का पुत्र था कहा,"। इतना ही। एक व्यक्ति चला गया जिसने चालीस साल तक लोगों को सँभाला था, और अब परमेश्वर उस दूसरे से बोलते हैं जो अब तक केवल पहले के पीछे-पीछे चलता रहा था। ध्यान दीजिए, वाक्य पूरा भी नहीं होता। "कहा," और फिर विराम। जो कहा गया वह अगले पद में आता है, पर इस पद में केवल यह दर्ज है कि परमेश्वर ने मौन नहीं चुना। मूसा की कब्र के ठीक बाद, परमेश्वर का मुँह खुलता है। यही इस आयत की पूरी कहानी है, और यह कम नहीं है।
यहोशू 1:1 किस विषय में है?
इस पद में एक नाम है जिसे बाइबल बार-बार लौटाकर लाएगी। "यहोशू" का अर्थ है "यहोवा उद्धार करते हैं", और वही नाम सदियों बाद ग्रीक रूप में यीशु बनकर मरियम के पुत्र पर रखा जाएगा। यह संयोग नहीं है, और इसे ज़बरदस्ती रूपक बनाने की ज़रूरत भी नहीं। बस इतना देखिए: मूसा, जो व्यवस्था लाया, लोगों को देश की सीमा तक ले आया पर भीतर नहीं ले जा सका। भीतर ले जाने का काम "यहोवा उद्धार करते हैं" नाम वाले को मिला। इसी अध्याय में वह शब्द भी आता है जो बाद में पूरे नए नियम में गूँजेगा, "विश्राम" (पद 13)। परमेश्वर का इतिहास एक कब्र पर रुकता नहीं; वह हर बार अगले व्यक्ति को बुलाकर आगे बढ़ता है, जब तक उस एक तक नहीं पहुँचता जिसकी कब्र भी उसे रोक न सकी।
यहोशू 1:1 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
दो अलग शब्दों पर ध्यान दीजिए। मूसा "यहोवा का दास" है, पर यहोशू "उसका सेवक" है, यानी मूसा का सेवक। मूल इब्रानी में यहोशू के लिए जो शब्द है वह है मशारेत, जिसका अर्थ है सहायक, वह जो किसी और की सेवा में खड़ा रहता है। चालीस साल तक यहोशू की पहचान यही थी: मूसा के साथ रहने वाला जवान। और यही वह क्षण है जब यह पहचान टूटती है, क्योंकि जिसकी सेवा वह करता था वह अब नहीं रहा। परमेश्वर उसे उसकी पुरानी पहचान से ही
यहोशू 1:1 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
जिन्होंने यह पुस्तक पहली बार सुनी, वे संभवतः बहुत बाद की पीढ़ियाँ थीं, ऐसे लोग जो जानते थे कि नेता मरते हैं, राजा गिरते हैं, मंदिर जलाए जा सकते हैं। उनके कानों में "मूसा की मृत्यु के बाद" कोई प्राचीन तिथि नहीं थी, बल्कि उनका अपना अनुभव था: वह क्षण जब लगा कि सब कुछ ख़त्म हो गया। और तब वाक्य का दूसरा हिस्सा आता था, "यहोवा ने कहा", और सुनने वालों की साँस लौटती थी। उनके लिए यह पद इतिहास की सूचना नहीं, जीवन-रेखा थी। जिस परमेश्वर ने यरदन के किनारे मौन नहीं चुना, वे बेबीलोन के किनारे भी नहीं चुनेंगे।
यहोशू 1:1 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
यदि परमेश्वर आज आपको आपकी पुरानी पहचान से पुकारें, पर किसी नए काम के लिए, तो क्या आप उसे सुनने के लिए पर्याप्त शांत हैं?
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Joshua 1 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

धन्यवाद संपादकीय पर पद 6

धन्यवाद कि आपने यहोशू से कहा, "हियाव बाँध और दृढ़ हो जा," और यही शब्द आज मेरे डरते हुए मन तक पहुँचे हैं। धन्यवाद कि जो शपथ आपने पूर्वजों से खाई, उसे आपने निभाया। आपकी सच्चाई पर भरोसा करके मैं आगे कदम बढ़ा सकता हूँ।

प्रार्थना संपादकीय पर पद 7

पिता, मुझे हियाव दे कि डर के सामने भी तेरी राह पर टिका रहूँ। मन बहुत बार दाहिने बाएँ भटकता है, पर तू मुझे थामे रख। तेरे वचन को मानना मेरे लिए बोझ नहीं, सहारा बने। जहाँ भी जाऊँ, तेरी उपस्थिति मेरे साथ चले।

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