बाइबल व्याख्या

लूका 13:23

बाइबल

पाठ

यीशु मसीह चलते-चलते सिखा रहे हैं, नगर से नगर, गाँव से गाँव, और उनके पैर यरूशलेम की ओर मुड़े हुए हैं। भीड़ के भीतर से कोई एक आवाज़ उठती है, नाम नहीं बताया गया, चेहरा नहीं दिखाया गया, बस एक प्रश्न: "हे प्रभु, क्या उद्धार पानेवाले थोड़े हैं?" वाक्य यहीं अटक जाता है, आधा खुला हुआ, क्योंकि लूका लिखता है, "उसने उनसे कहा" और फिर उत्तर एक व्यक्ति की ओर नहीं, पूरी भीड़ की ओर मुड़ जाता है। पूछा गया था "वे कितने हैं", और उत्तर आता है, "सकेत द्वार से प्रवेश करने का यत्न करो।" प्रश्न गिनती का था; उत्तर दरवाज़े का है।

मूल बात

इस एक छोटी-सी पंक्ति में मनुष्य का सबसे पुराना धार्मिक शौक पकड़ा जाता है: दूसरों की संख्या गिनना और खुद को गिनती से बाहर रखना। पूछनेवाला यह नहीं पूछता, "क्या मैं बचूँगा?" वह पूछता है, "क्या बचनेवाले थोड़े हैं?" यह सवाल सुरक्षित दूरी से पूछा गया सवाल है, जैसे कोई किसी और के मुक़दमे की सुनवाई देखने आया हो। और यीशु मसीह उसका आँकड़ा नहीं देते। वे उत्तर को घुमाकर श्रोता के सीने पर रख देते हैं। परमेश्वर का राज्य कोई ऐसी सूची नहीं जिसे दूर बैठकर पढ़ा जाए; वह एक खुला द्वार है जिसमें से होकर गुज़रना पड़ता है, और वह द्वार सदा खुला नहीं रहेगा। यह अनुग्रह है, पर जल्दी करनेवाला अनुग्रह।

जुड़ी हुई कड़ी

यह सवाल हवा में से नहीं आया। इस्राएल की लंबी कहानी में यह चिंता बार-बार लौटती है: बचा हुआ अंश कितना छोटा होगा? नबियों ने चेताया था कि पेड़ काटा जाएगा और ठूँठ ही बचेगा। पूछनेवाला उसी परंपरा में सोच रहा है, और वह अनुमान लगा रहा है कि जो थोड़े बचेंगे वे स्वाभाविक रूप से अब्राहम के वंशज होंगे। यीशु मसीह इस अनुमान को उलट देते हैं: "पूर्व और पश्चिम; उत्तर और दक्षिण से लोग आकर परमेश्वर के राज्य के भोज में भागी होंगे।" द्वार सँकरा है, पर मेज़ चौड़ी है। और वह द्वार वे स्वयं हैं, जो इस वक़्त यरूशलेम की ओर बढ़ रहे हैं, जहाँ बंद होते दरवाज़े की कीमत वे अपने शरीर से चुकाएँगे।

दर्पण

हम भी उसी सुरक्षित दूरी से सवाल पूछना जानते हैं। रविवार को घर लौटते हुए हम चर्चा करते हैं कि पड़ोसी परिवार की आत्मिक हालत क्या है, कि अपने भाई की दूसरी शादी का क्या होगा, कि दफ़्तर का वह नास्तिक सहकर्मी कहाँ जाएगा। ये सवाल गलत नहीं हैं, पर वे हमें अपने ही दरवाज़े से दूर रखते हैं। जब तक मैं दूसरों की गिनती कर रहा हूँ, मुझे अपने बारे में कुछ तय नहीं करना पड़ता। यीशु मसीह यह छूट नहीं देते। वे "यत्न करो" कहते हैं, एक ऐसा शब्द जिसमें पसीना है।

आज ही, दस मिनट के भीतर: उस व्यक्ति का नाम काग़ज़ पर लिखिए जिसके उद्धार पर आप संदेह करते रहे हैं, और उसी काग़ज़ पर अपना नाम उसके ऊपर लिखकर परमेश्वर से कहिए, "पहले मुझे परखिए।"

प्रसंग

यह यात्रा का बीच का हिस्सा है। लूका 9 से यीशु मसीह का चेहरा यरूशलेम की ओर स्थिर है, और अध्याय 13 में यह याद फिर दिलाई जाती है: "वह नगर-नगर, और गाँव-गाँव होकर उपदेश देता हुआ यरूशलेम की ओर जा रहा था।" रास्ता धूल भरा है, भीड़ साथ चलती है, कोई गुरु के पीछे-पीछे चलकर बहस का विषय उठा देता है, जैसे रब्बियों के साथ होता था। कुछ ही पंक्तियाँ पहले पिलातुस के हाथों मारे गए गलीलियों की खबर आई थी और शीलोह का गुम्मट गिरने की। मौत हवा में तैर रही थी। और अगले ही मोड़ पर हेरोदेस की धमकी आनेवाली है। यह प्रश्न किसी शांत कक्षा में नहीं, बल्कि खतरे से भरे रास्ते पर पूछा गया है।

मुख्य पात्र

यीशु मसीह के उत्तर देने के ढंग पर ध्यान दें। वे उस आदमी को झिड़कते नहीं, पर उसकी जिज्ञासा को खिलाते भी नहीं। वे कभी अटकल का व्यापार नहीं करते। जहाँ हम सिद्धांत चाहते हैं, वे आज्ञा देते हैं; जहाँ हम आँकड़े चाहते हैं, वे दरवाज़ा दिखाते हैं। यही वह व्यक्ति है जो थोड़ी देर पहले अठारह साल से कुबड़ी स्त्री को "अब्राहम की बेटी" कहकर सीधा कर चुका है, और जो थोड़ी देर बाद मुर्गी की तरह अपने पंख फैलाकर रोएगा: "कितनी ही बार मैंने यह चाहा।" कठोरता और कोमलता एक ही मुँह से निकलती है। सँकरे द्वार की चेतावनी देनेवाला वही है जो द्वार पर खड़ा होकर बुला रहा है।

कठिन प्रश्न

फिर भी सवाल पूरी तरह टलता नहीं। यीशु मसीह कहते हैं, "बहुत से प्रवेश करना चाहेंगे, और न कर सकेंगे।" चाहना और न कर पाना, यह वाक्य कँपा देता है। तो क्या इच्छा भी काफ़ी नहीं? पाठ यह मानने से इनकार करता है कि आख़िरी क्षण की घबराहट भरी दस्तक वही चीज़ है जो आज की निष्ठा है। जो लोग बाहर खड़े हैं वे कहते हैं, "हमने तेरे सामने खाया-पीया", यानी परिचय था, पहचान नहीं। कितने बचेंगे, यह यीशु मसीह हमें नहीं बताते, और मुझे इसे न जानने के साथ जीना सीखना पड़ा है। पर वे यह बताते हैं कि द्वार अभी खुला है और मेरे पास आज है। यह राहत नहीं, बुलावा है।

चिंतन

जब आप उद्धार के बारे में सोचते हैं, तो आपका प्रश्न किसके बारे में होता है, दूसरों के बारे में या अपने बारे में, और यह आदत आपकी आत्मा के साथ क्या कर रही है?

"यत्न करो" का आपके इस हफ़्ते में क्या अर्थ बनेगा, ठीक-ठीक किस काम में?

Luke में और गहराई से जानें

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Luke For Everyone

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Warm, readable commentary on the Gospel for outsiders and doubters.

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Luke 13:23 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

लूका 13:23 का क्या अर्थ है?
यीशु मसीह चलते-चलते सिखा रहे हैं, नगर से नगर, गाँव से गाँव, और उनके पैर यरूशलेम की ओर मुड़े हुए हैं। भीड़ के भीतर से कोई एक आवाज़ उठती है, नाम नहीं बताया गया, चेहरा नहीं दिखाया गया, बस एक प्रश्न: "हे प्रभु, क्या उद्धार पानेवाले थोड़े हैं?" वाक्य यहीं अटक जाता है, आधा खुला हुआ, क्योंकि लूका लिखता है, "उसने उनसे कहा" और फिर उत्तर एक व्यक्ति की ओर नहीं, पूरी भीड़ की ओर मुड़ जाता है। पूछा गया था "वे कितने हैं", और उत्तर आता है, "सकेत द्वार से प्रवेश करने का यत्न करो।" प्रश्न गिनती का था; उत्तर दरवाज़े का है।
लूका 13:23 किस विषय में है?
यह सवाल हवा में से नहीं आया। इस्राएल की लंबी कहानी में यह चिंता बार-बार लौटती है: बचा हुआ अंश कितना छोटा होगा? नबियों ने चेताया था कि पेड़ काटा जाएगा और ठूँठ ही बचेगा। पूछनेवाला उसी परंपरा में सोच रहा है, और वह अनुमान लगा रहा है कि जो थोड़े बचेंगे वे स्वाभाविक रूप से अब्राहम के वंशज होंगे। यीशु मसीह इस अनुमान को उलट देते हैं: "पूर्व और पश्चिम; उत्तर और दक्षिण से लोग आकर परमेश्वर के राज्य के भोज में भागी होंगे।" द्वार सँकरा है, पर मेज़ चौड़ी है। और वह द्वार वे स्वयं हैं, जो इस वक़्त यरूशलेम की ओर बढ़ रहे हैं, जहाँ बंद होते दरवाज़े की कीमत वे अपने शरीर से चुकाएँगे।
लूका 13:23 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
आज ही, दस मिनट के भीतर: उस व्यक्ति का नाम काग़ज़ पर लिखिए जिसके उद्धार पर आप संदेह करते रहे हैं, और उसी काग़ज़ पर अपना नाम उसके ऊपर लिखकर परमेश्वर से कहिए, "पहले मुझे परखिए।"
लूका 13:23 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
यीशु मसीह के उत्तर देने के ढंग पर ध्यान दें। वे उस आदमी को झिड़कते नहीं, पर उसकी जिज्ञासा को खिलाते भी नहीं। वे कभी अटकल का व्यापार नहीं करते। जहाँ हम सिद्धांत चाहते हैं, वे आज्ञा देते हैं; जहाँ हम आँकड़े चाहते हैं, वे दरवाज़ा दिखाते हैं। यही वह व्यक्ति है जो थोड़ी देर पहले अठारह साल से कुबड़ी स्त्री को "अब्राहम की बेटी" कहकर सीधा कर चुका है, और जो थोड़ी देर बाद मुर्गी की तरह अपने पंख फैलाकर रोएगा: "कितनी ही बार मैंने यह चाहा।" कठोरता और कोमलता एक ही मुँह से निकलती है। सँकरे द्वार की चेतावनी देनेवाला वही है जो द्वार पर खड़ा होकर बुला रहा है।
लूका 13:23 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
जब आप उद्धार के बारे में सोचते हैं, तो आपका प्रश्न किसके बारे में होता है, दूसरों के बारे में या अपने बारे में, और यह आदत आपकी आत्मा के साथ क्या कर रही है?
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Luke 13 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 17

अठारह साल से झुकी हुई वह स्त्री सीधी खड़ी हो गई, और उसी दृश्य को देखकर दो तरह के दिल सामने आए: "उसके सब विरोधी लज्जित हुए, और सारी भीड़ उन महिमा के कामों से जो वह करता था, आनन्दित हुई।" एक ही चमत्कार, पर किसी ने नियम टूटता देखा और किसी ने परमेश्वर की महिमा। जब तेरे सामने कोई सीधा खड़ा होता है, तेरे भीतर पहले क्या जागता है, आपत्ति या आनन्द?

प्रार्थना संपादकीय पर पद 23

प्रभु, मेरे मन में भी वही सवाल उठते हैं कि कौन बचेगा, कितने बचेंगे। पर तू मुझे गिनती से हटाकर अपने पास बुलाता है। मुझे सिखा कि मैं दूसरों को तौलना छोड़कर उस सँकरे द्वार से भीतर आने की पूरी कोशिश करूँ, जहाँ तू खड़ा होकर मेरी राह देख रहा है।

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