बाइबल व्याख्या

लूका 22

बाइबल
यह अध्याय JL Group के सहयोग से संभव हुआ है

पाठ

फसह के ठीक पहले यरूशलेम में दो योजनाएँ साथ-साथ चल रही हैं: प्रधान याजक सोच रहे हैं कि भीड़ के डर से बचते हुए यीशु को कैसे मार डालें, और यीशु सोच रहे हैं कि अपने चेलों के साथ अंतिम भोज कहाँ खाएँ। उसी मेज़ पर वे रोटी तोड़कर कहते हैं, "यह मेरी देह है, जो तुम्हारे लिये दी जाती है," और कटोरे को "मेरे उस लहू में जो तुम्हारे लिये बहाया जाता है नई वाचा" कहते हैं, जबकि पकड़वानेवाले का हाथ उसी मेज़ पर है। इसके बाद अध्याय तेज़ी से उतरता है: बड़ाई का झगड़ा, पतरस की चेतावनी, जैतून के पहाड़ की पीड़ा, चूमे से पकड़वाना, तीन बार इन्कार, और महासभा के सामने यीशु का यह उत्तर, "मैं हूँ।"

मर्म

यहाँ परमेश्वर का राज्य तलवार से नहीं, मेज़ से आता है। यीशु अपने ही लहू को "नई वाचा" कहते हैं, यानी वह बंधन जो परमेश्वर अपनी ओर से बाँधते हैं और अपनी ही कीमत पर निभाते हैं। ध्यान दीजिए कि यह कटोरा किसे दिया जाता है: उन्हीं बारहों को जिनमें से एक बेचनेवाला है, एक इन्कार करनेवाला है, और बाकी इस बात पर झगड़ रहे हैं कि "हम में से कौन बड़ा समझा जाता है?" अनुग्रह योग्यता का पुरस्कार नहीं, वह विफलता के बीचोंबीच रखा गया भोजन है। और राज्य भी वैसे ही दिया जाता है, कमाया नहीं जाता: "जैसे मेरे पिता ने मेरे लिये एक राज्य ठहराया है, वैसे ही मैं भी तुम्हारे लिये ठहराता हूँ।"

सूत्र

फसह इस्राएल की सबसे पुरानी स्मृति है: मेम्ने का लहू, और मृत्यु का घर के पास से गुज़र जाना। यीशु उसी भोजन के बीच में खड़े होकर उसका केंद्र बदल देते हैं, अपने ऊपर। निर्गमन 24:8 में मूसा ने बलि का लहू लोगों पर छिड़ककर कहा था कि यह वाचा का लहू है; वहाँ वाचा पशु की मृत्यु पर टिकी थी, यहाँ वाचा बाँधनेवाला स्वयं बलि बनता है। और यशायाह 53:12 का वाक्य, "वह अपराधी के साथ गिना गया," यीशु स्वयं अपने ऊपर लागू करते हैं। यह कोई दुर्घटना नहीं जो भक्त को आ पड़ी; यह वही मार्ग है जिस पर परमेश्वर आरम्भ से चल रहे थे, और जिसका अंत महासभा के सामने "सर्वशक्तिमान परमेश्वर की दाहिनी ओर" बैठने में है।

दर्पण

इस अध्याय में सबसे असहज बात यह है कि बड़ाई का झगड़ा उसी मेज़ पर होता है जहाँ देह तोड़ी गई है। कलीसिया की समिति में, घर में, दफ़्तर में, हम भी ठीक उन्हीं क्षणों में अपनी जगह गिनने लगते हैं जब कृपा हमें सबसे ज़्यादा मिली होती है। और पतरस का आत्मविश्वास हमारा अपना है: हम सचमुच मानते हैं कि हम मरने तक साथ देंगे, जब तक कि कोई दासी आग के उजाले में हमें पहचान न ले और कीमत बस थोड़ी-सी असुविधा न हो। गौर कीजिए, यीशु पतरस को गिरने से नहीं रोकते; वे उसकी लौटने की प्रार्थना करते हैं। आज यह कीजिए: एक काग़ज़ पर वह एक जगह लिखिए जहाँ इस हफ़्ते आप चुप रह गए, और उसके नीचे ये शब्द लिखकर ऊँची आवाज़ में पढ़िए, "मैंने तेरे लिये विनती की, कि तेरा विश्वास जाता न रहे।"

श्रोता

लूका जिनके लिये लिख रहे हैं, वे अधिकतर अन्यजाति मसीही हैं जो रोमी दुनिया में रहते हैं, जहाँ बड़े लोग सचमुच "उपकारक" कहलाते थे; यह कोई मुहावरा नहीं, शिलालेखों पर खुदा हुआ सम्मानसूचक पद था। उनके कानों में यीशु का वाक्य "तुम ऐसे न होना" सीधा उनकी सामाजिक सीढ़ी पर वार करता था। और वे ऐसे समुदाय थे जो हर सप्ताह रोटी तोड़ते थे, और जिनमें कुछ लोग दबाव में डगमगा चुके थे। उनके लिये पतरस की कहानी केवल इतिहास नहीं थी, यह आशा थी: जो गिरा वही बाद में भाइयों को स्थिर करनेवाला बना। इन्कार अंतिम शब्द नहीं था।

संदर्भ

यह फसह का सप्ताह है, जब यरूशलेम तीर्थयात्रियों से भर जाता था और रोमी सैनिक सतर्क रहते थे। अधिकारियों की समस्या धर्म से ज़्यादा भीड़ थी, इसलिए वे "बिना उपद्रव के" पकड़ना चाहते थे, और यहूदा ने उन्हें यही दिया: रात का एकांत स्थान। घड़ा उठाए हुए मनुष्य का संकेत भी इसी सावधानी का हिस्सा लगता है, क्योंकि पानी ढोना सामान्यतः स्त्रियों का काम था, यानी वह आदमी आसानी से पहचाना जाता, पर जगह पहले से किसी को बताई नहीं गई। गिरफ़्तारी रात में होती है, तलवारों और लाठियों के साथ, और यीशु इसे नाम देते हैं: "यह तुम्हारी घड़ी है, और अंधकार का अधिकार है।"

एक बारीकी

पद 31 में एक छोटा-सा व्याकरण का मोड़ है जो पूरी बात खोल देता है। यीशु कहते हैं, "शैतान ने तुम लोगों को माँग लिया है कि गेहूँ के समान फटके," और यह "तुम लोगों" बहुवचन है, पूरे समूह के लिये। पर अगला वाक्य एकवचन है: "मैंने तेरे लिये विनती की।" शैतान सबको माँगता है, और यीशु एक-एक के लिये नाम लेकर प्रार्थना करते हैं। फटकने का अर्थ नष्ट करना नहीं, हिलाना है, जब तक भूसा अलग न हो जाए। पतरस उस रात सचमुच हिलाया जाता है, पर टूटता नहीं, क्योंकि उसका विश्वास उसकी पकड़ पर नहीं, यीशु की विनती पर टिका है। यही अंतर आपके और निराशा के बीच खड़ा है।

मनन के प्रश्न

जिस मेज़ पर आपको अनुग्रह मिला है, वहीं आप किस तरह अपनी जगह और अपनी बड़ाई गिनने लगते हैं?

यदि आपका टिकाव आपकी वफ़ादारी पर नहीं, बल्कि यीशु की आपके लिये की गई विनती पर है, तो आज की आपकी किस चिंता का रंग बदल जाता है?

Luke में और गहराई से जानें

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Luke For Everyone

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Warm, readable commentary on the Gospel for outsiders and doubters.

The Message of Luke

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Luke 22 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

लूका 22 का क्या अर्थ है?
फसह के ठीक पहले यरूशलेम में दो योजनाएँ साथ-साथ चल रही हैं: प्रधान याजक सोच रहे हैं कि भीड़ के डर से बचते हुए यीशु को कैसे मार डालें, और यीशु सोच रहे हैं कि अपने चेलों के साथ अंतिम भोज कहाँ खाएँ। उसी मेज़ पर वे रोटी तोड़कर कहते हैं, "यह मेरी देह है, जो तुम्हारे लिये दी जाती है," और कटोरे को "मेरे उस लहू में जो तुम्हारे लिये बहाया जाता है नई वाचा" कहते हैं, जबकि पकड़वानेवाले का हाथ उसी मेज़ पर है। इसके बाद अध्याय तेज़ी से उतरता है: बड़ाई का झगड़ा, पतरस की चेतावनी, जैतून के पहाड़ की पीड़ा, चूमे से पकड़वाना, तीन बार इन्कार, और महासभा के सामने यीशु का यह उत्तर, "मैं हूँ।"
लूका 22 किस विषय में है?
फसह इस्राएल की सबसे पुरानी स्मृति है: मेम्ने का लहू, और मृत्यु का घर के पास से गुज़र जाना। यीशु उसी भोजन के बीच में खड़े होकर उसका केंद्र बदल देते हैं, अपने ऊपर। निर्गमन 24:8 में मूसा ने बलि का लहू लोगों पर छिड़ककर कहा था कि यह वाचा का लहू है; वहाँ वाचा पशु की मृत्यु पर टिकी थी, यहाँ वाचा बाँधनेवाला स्वयं बलि बनता है। और यशायाह 53:12 का वाक्य, "वह अपराधी के साथ गिना गया," यीशु स्वयं अपने ऊपर लागू करते हैं। यह कोई दुर्घटना नहीं जो भक्त को आ पड़ी; यह वही मार्ग है जिस पर परमेश्वर आरम्भ से चल रहे थे, और जिसका अंत महासभा के सामने "सर्वशक्तिमान परमेश्वर की दाहिनी ओर" बैठने में है।
लूका 22 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
लूका जिनके लिये लिख रहे हैं, वे अधिकतर अन्यजाति मसीही हैं जो रोमी दुनिया में रहते हैं, जहाँ बड़े लोग सचमुच "उपकारक" कहलाते थे; यह कोई मुहावरा नहीं, शिलालेखों पर खुदा हुआ सम्मानसूचक पद था। उनके कानों में यीशु का वाक्य "तुम ऐसे न होना" सीधा उनकी सामाजिक सीढ़ी पर वार करता था। और वे ऐसे समुदाय थे जो हर सप्ताह रोटी तोड़ते थे, और जिनमें कुछ लोग दबाव में डगमगा चुके थे। उनके लिये पतरस की कहानी केवल इतिहास नहीं थी, यह आशा थी: जो गिरा वही बाद में भाइयों को स्थिर करनेवाला बना। इन्कार अंतिम शब्द नहीं था।
लूका 22 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
पद 31 में एक छोटा-सा व्याकरण का मोड़ है जो पूरी बात खोल देता है। यीशु कहते हैं, "शैतान ने तुम लोगों को माँग लिया है कि गेहूँ के समान फटके," और यह "तुम लोगों" बहुवचन है, पूरे समूह के लिये। पर अगला वाक्य एकवचन है: "मैंने तेरे लिये विनती की।" शैतान सबको माँगता है, और यीशु एक-एक के लिये नाम लेकर प्रार्थना करते हैं। फटकने का अर्थ नष्ट करना नहीं, हिलाना है, जब तक भूसा अलग न हो जाए। पतरस उस रात सचमुच हिलाया जाता है, पर टूटता नहीं, क्योंकि उसका विश्वास उसकी पकड़ पर नहीं, यीशु की विनती पर टिका है। यही अंतर आपके और निराशा के बीच खड़ा है।
लूका 22 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
यदि आपका टिकाव आपकी वफ़ादारी पर नहीं, बल्कि यीशु की आपके लिये की गई विनती पर है, तो आज की आपकी किस चिंता का रंग बदल जाता है?
हमारे साझेदारों के सहयोग से संभव

Luke 22 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

धन्यवाद संपादकीय पर पद 24

पिता, धन्यवाद कि जब चेलों में यह वाद-विवाद हुआ कि "हम में से कौन बड़ा समझा जाता है?", तब यीशु ने उन्हें छोड़ा नहीं, बल्कि सहते हुए सिखाया। धन्यवाद कि मेरे मन की होड़ और बड़ा बनने की चाह को जानकर भी आप मुझे अपनी मेज़ पर बैठाते हैं।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 60

वह कह ही रहा था कि तुरन्त मुर्गे ने बाँग दी।" पतरस का वाक्य पूरा भी नहीं हुआ था। इनकार शब्दों के बीच में ही पकड़ा गया। कितनी बार हम भी अपनी सफाई गढ़ते रह जाते हैं और भीतर कुछ बाँग देकर सच बोल देता है। वह आवाज़ सज़ा नहीं थी, बुलाहट थी। तुम्हारे जीवन में आज कौन सी बाँग सुनाई दे रही है, जिसे तुम अनसुना कर रहे हो?

प्रार्थना संपादकीय पर पद 32

पिता, यह जानकर मन को चैन मिलता है कि जब मैं डगमगाता हूँ, तब भी कोई मेरे लिए प्रार्थना कर रहा है। मेरा विश्वास टूटने न देना। और जब मैं लौटूँ, तो मुझे ऐसा बना कि मैं अपने साथ चलने वालों को थाम सकूँ।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 25

अंतिम भोज की मेज़ पर, जब यीशु अपनी मृत्यु की बात कर रहे थे, चेले इस पर झगड़ रहे थे कि बड़ा कौन है। तब यीशु ने कहा, "अन्यजातियों के राजा उन पर प्रभुता करते हैं; और जो उन पर अधिकार रखते हैं, वे उपकारक कहलाते हैं।" ध्यान दे, वे दबाते हैं, फिर भी "उपकारक" कहलाते हैं। सेवा का नाम, और भीतर अपना बड़प्पन। तेरे घर में, कलीसिया में, तेरी सेवा किसका नाम बड़ा कर रही है?

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