लूका 24:42
पाठ
डरे हुए, हक्के-बक्के शिष्यों के बीच में जी उठा हुआ प्रभु खड़ा है, और वह कुछ ऐसा माँगते हैं जो किसी भूत-प्रेत के मुँह से कभी नहीं निकलता: "क्या यहाँ तुम्हारे पास कुछ भोजन है?" और शिष्य, जिनके पास उस शाम शायद कुछ ख़ास बचा भी नहीं था, वही देते हैं जो हाथ में है: "उन्होंने उसे भुनी मछली का टुकड़ा दिया।" टुकड़ा, पूरी मछली नहीं। बचा-खुचा, ठंडा, साधारण भोजन। और अगले ही वाक्य में लिखा है कि "उसने लेकर उनके सामने खाया।" पुनरुत्थान की सबसे बड़ी घटना का प्रमाण किसी चमकती हुई ज्योति से नहीं, बल्कि चबाए जाते हुए एक मछली के टुकड़े से दिया जाता है।
मूल बात
यहाँ परमेश्वर की देह-धारणा अपनी आख़िरी हद तक जाती है। क्रूस ने शरीर को तोड़ा, पर पुनरुत्थान ने उसे छोड़ा नहीं; मसीह कोई छाया बनकर नहीं लौटे, बल्कि हड्डी-माँस वाले उसी व्यक्ति के रूप में, जिसे छुआ जा सकता है और जो भूख महसूस कर सकता है। यह बात हमारी धार्मिक कल्पनाओं को चोट पहुँचाती है, क्योंकि हम उद्धार को अक्सर "आत्मा का शरीर से छूटना" समझते हैं। लूका इसके ठीक उलट कहता है: उद्धार शरीर समेत है। जो देह थकती है, बीमार पड़ती है, और कब्र में रखी जाती है, वही देह परमेश्वर की नई सृष्टि में जगह पाती है। और दूसरी बात उतनी ही गहरी है: पुनरुत्थान का प्रभु अपने डरे हुए लोगों से कुछ लेने में संकोच नहीं करते। वे माँगते हैं, और जो मिलता है, वही स्वीकार कर लेते हैं।
जोड़ने वाला सूत्र
लूका की पूरी पुस्तक में यीशु बार-बार मेज़ पर दिखाई देते हैं: पापियों के साथ खाते हुए, पाँच हज़ार को रोटी देते हुए, ऊपरी कमरे में रोटी तोड़ते हुए, और इम्माऊस के रास्ते पर उन्हीं दो शिष्यों के साथ, जिन्होंने उसे "रोटी तोड़ते समय" पहचाना। मछली का यह टुकड़ा उसी शृंखला की आख़िरी कड़ी है, और सबसे चौंकाने वाली, क्योंकि अब खाने वाला मृत्यु के उस पार से लौटा हुआ है। पुराने नियम में मन्ना से लेकर भविष्यद्वक्ताओं के उस भोज तक, जहाँ परमेश्वर अपने लोगों को पहाड़ पर बिठाकर खिलाते हैं, परमेश्वर का उद्धार हमेशा खाने-पीने की भाषा में बोला गया है। मसीह उस भाषा को तोड़ते नहीं, पूरा करते हैं। जो राज्य आने वाला है, वह धुएँ जैसा नहीं, भोजन जैसा ठोस है।
दर्पण
आप भी शायद उस कमरे में खड़े लोगों जैसे हैं: आनन्द है, पर विश्वास नहीं हो रहा। लूका लिखता है कि "आनन्द के मारे उनको विश्वास नहीं हो रहा था" और यह वाक्य बहुत ईमानदार है। हम अक्सर डर से नहीं, बल्कि इस डर से पीछे हटते हैं कि अच्छी ख़बर कहीं सच न निकले और फिर टूट जाए। इसलिए हम प्रभु को एक विचार, एक भावना, एक रविवार की अनुभूति बनाए रखते हैं; आत्मा जैसा कुछ, जो हमारी नौकरी, हमारे बैंक खाते, हमारे बीमार शरीर और हमारी रसोई से दूर रहे। पर वे भोजन माँगते हैं। वे आपके जीवन के उसी कोने में हाथ बढ़ाते हैं जिसे आपने "धार्मिक" मानने से इनकार किया है। और ध्यान दीजिए, शिष्यों ने कुछ बड़ा नहीं दिया, बचा हुआ टुकड़ा दिया, और वह ठुकराया नहीं गया। आपकी थकी हुई, आधी-अधूरी पेशकश भी उनके हाथ में जाने लायक़ है।
आज, अगले भोजन से पहले, अपनी थाली के सामने ज़ोर से, आवाज़ निकालकर कहिए: "प्रभु, जो मेरे पास है वह यही है, आइए और इसमें साझी होइए।" फिर चुपचाप बैठकर पहला कौर खाइए।
बारीकी
"टुकड़ा" शब्द को मत छोड़िए। मूल यूनानी में यह वही शब्द है जो बचे हुए हिस्से के लिए इस्तेमाल होता है, कोई परोसी गई थाली नहीं। यह शाम का बचा हुआ खाना है, शायद ठंडा, शायद उस शोक-भरे दिन में किसी ने जैसे-तैसे रख दिया हो। शिष्यों के पास देने को कुछ सजाया हुआ नहीं था, और पुनरुत्थान के प्रभु ने इंतज़ार भी नहीं किया कि वे कुछ बेहतर ले आएँ। जिसने भीड़ के लिए रोटियाँ बढ़ाई थीं, वही अब दूसरों के हाथ से बचा हुआ टुकड़ा लेकर खाते हैं। महिमा यहाँ भूख पहनकर आती है। और यही वह क्षण है जहाँ डर टूटता है: भूत माँगते नहीं, और परमेश्वर बचे हुए को तुच्छ नहीं समझते।
संदर्भ
यह रविवार की रात है, उसी दिन की शाम जिस दिन स्त्रियाँ भोर को कब्र पर गई थीं। यरूशलेम में शिष्यों का समूह बन्द कमरे में इकट्ठा है, डरा हुआ, क्योंकि जिन प्रधान याजकों और सरदारों ने उनके गुरु को क्रूस पर चढ़वाया, वे अब भी सत्ता में हैं। उस संस्कृति में भोजन साझा करना केवल पेट भरना नहीं था, वह रिश्ते का सार्वजनिक ऐलान था; जिसके साथ आप खाते थे, उसके साथ आप बँधे हुए माने जाते थे। और उस समय की लोककथाओं में भूत-प्रेत दिखाई तो देते थे, पर खाते नहीं थे। इसलिए यीशु का यह माँगना दोहरी बात कहता है: मैं सचमुच देह में जीवित हूँ, और तुम्हारे साथ मेरा रिश्ता तुम्हारे भाग जाने से टूटा नहीं।
मुख्य पात्र
इस दृश्य में यीशु का व्यवहार अद्भुत रूप से कोमल है। वे डाँटकर विश्वास नहीं मनवाते; वे हाथ-पाँव दिखाते हैं, छूने के लिए कहते हैं, और फिर खाने की माँग करके सबसे साधारण प्रमाण देते हैं। जो व्यक्ति मृत्यु को हराकर लौटा है, वह अपने लोगों के सन्देह पर नाराज़ नहीं होता, बल्कि उनके स्तर तक झुककर उनसे मछली माँगता है। यहाँ परमेश्वर का चरित्र खुलकर दिखता है: वे हमारे डर को तोड़ते नहीं, उसे धीरे-धीरे पिघलाते हैं। और वे लेना जानते हैं, न केवल देना। जो प्रभु आपसे कुछ माँगते हैं, वे आपको शर्मिन्दा नहीं कर रहे; वे आपको मेज़ पर बिठा रहे हैं।
चिंतन
आपके जीवन का कौन-सा "टुकड़ा" आप इसलिए नहीं देते क्योंकि वह आपको परमेश्वर के सामने रखने लायक़ नहीं लगता?
आप मसीह को आत्मा की तरह मानना पसंद करते हैं या शरीर समेत, और इस चुनाव का असर आपके शरीर, समय और पैसे पर कहाँ दिखता है?
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Luke 24:42 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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