लूका 8:16
पाठ
दीया जलाने के बाद कोई उसे बर्तन से नहीं ढाँकता, न ही खाट के नीचे सरका देता है। जो जलाता है, वह उसे दीवट पर रखता है, ऊँचाई पर, जहाँ से रोशनी पूरे कमरे में फैले। और कारण भी यीशु साफ बताते हैं: "कि भीतर आनेवाले प्रकाश पाएँ।" यह दीये का उद्देश्य है, उसकी सजावट नहीं। बीज बोने के दृष्टान्त की व्याख्या खत्म करते ही प्रभु यह छोटी-सी घरेलू तस्वीर सामने रखते हैं, मानो कह रहे हों: जो वचन तुम्हारे भीतर बोया गया है, वह तुम्हारे भीतर दफ़्न रहने के लिए नहीं दिया गया। सुनना और छिपाना, ये दोनों एक साथ नहीं चल सकते। जिस घर में दीया जलता है, वहाँ आनेवाला हर व्यक्ति उसका असर महसूस करता है।
मूल बात
यहाँ बात मुख्यतः हमारे "गवाही देने" की नहीं, बल्कि परमेश्वर के स्वभाव की है। परमेश्वर का राज्य चोरी-छिपे नहीं आता। जिन "भेदों" की समझ चेलों को दी गई है (पद 10), वे गुप्त ज्ञान नहीं हैं जिन्हें कुछ चुने हुए लोग अपने सीने से लगाकर रखें; वे इसलिए दिए गए हैं कि वे प्रकट हों। इसीलिए अगला पद तुरंत कहता है: "कुछ छिपा नहीं, जो प्रगट न हो।" ईश्वरीय प्रकाशन का दबाव बाहर की ओर है, हमेशा। और ध्यान दीजिए, दीया अपनी रोशनी खुद नहीं बनाता; उसे जलाया जाता है। अनुग्रह पहले आता है, ज़िम्मेदारी उसके पीछे। जो शिष्य वचन को छिपाता है, वह विनम्र नहीं, बल्कि दीये के मालिक की मंशा के विरुद्ध खड़ा है। मुफ़्त मिली रोशनी निजी संपत्ति नहीं बनती।
सूत्र
बाइबल की कहानी रोशनी से शुरू होती है। उत्पत्ति के पहले अध्याय में परमेश्वर अंधकार के ऊपर बोलते हैं और उजियाला हो जाता है, और उसके बाद पूरा शास्त्र इसी छवि पर लौटता रहता है: निर्गमन में मरुभूमि की आग का खंभा, मंदिर में जलता हुआ दीवट जिसे कभी बुझने नहीं दिया जाता, यशायाह की भविष्यवाणी कि अंधकार में चलनेवाली प्रजा बड़ी ज्योति देखेगी। यह सारा सूत्र यीशु में सिमटता है, जो खुद को जगत की ज्योति कहते हैं। इसलिए यहाँ जो दीया जलाया गया है, वह अंततः वे स्वयं हैं। और शिष्य? शिष्य चाँद की तरह हैं, उधार की रोशनी से चमकते हुए। कलीसिया कोई दूसरा सूर्य नहीं है; वह दीवट है, वह ठिकाना जहाँ मसीह की ज्योति रखी जाती है ताकि भीतर आनेवाला उसे देख सके।
दर्पण
छिपाने के तरीके बहुत सभ्य होते हैं। दफ़्तर में आप अपने विश्वास का ज़िक्र इसलिए टाल देते हैं कि "यह निजी बात है", और यह सच भी लगता है। रिश्तेदारों के बीच आप चुप रह जाते हैं ताकि माहौल न बिगड़े। बच्चों के सामने आप प्रार्थना करते हैं, पर अपने संदेह, अपनी असफलता और परमेश्वर से मिली क्षमा के बारे में कभी नहीं बोलते, क्योंकि उससे आपकी छवि दरकती है। ध्यान दीजिए, यीशु ने दो जगहें गिनाईं: बर्तन और खाट के नीचे। बर्तन शर्म है, खाट आराम है। कुछ लोग डर से ढाँकते हैं, कुछ सुविधा से। दोनों में दीया बुझता नहीं, बस बेकार हो जाता है, और घर अंधेरा रहता है जबकि तेल जलता रहता है।
अन्तर्पाठ
मत्ती में यही वचन पहाड़ी उपदेश में आता है, जहाँ यीशु सीधे कहते हैं कि शिष्य ही जगत की ज्योति हैं और उनके भले कामों को देखकर लोग पिता की महिमा करें। लूका इसे सुनने के दृष्टान्त से जोड़ता है, यानी गवाही की जड़ वचन को सही ढंग से सुनने में है, न कि उत्साह में। पर तनाव भी है: इसी अध्याय के अंत में यीशु याईर के माता-पिता को चेतावनी देते हैं, "यह जो हुआ है, किसी से न कहना।" वहीं गिरासेनी व्यक्ति को वे भेजते हैं, "अपने घर में लौट जा और लोगों से कह दे।" एक को चुप्पी, दूसरे को प्रचार। इसका अर्थ यह है कि प्रकट होने का समय यीशु तय करते हैं, हम नहीं। दीया दीवट पर रखा जाता है, पर रखनेवाला मालिक है।
प्रश्न
तो क्या हर चुप्पी अवज्ञा है? यह सवाल असली है, खासकर उनके लिए जो ऐसे परिवार या देश में रहते हैं जहाँ खुलकर बोलना नौकरी, रिश्ते या सुरक्षा की कीमत माँगता है। पाठ इसका आसान जवाब नहीं देता। वह यह नहीं कहता कि हर मौके पर सब कुछ कह दो; वह कहता है कि दीये को ढाँकना उसके स्वभाव के खिलाफ़ है। बुद्धिमानी और कायरता में फ़र्क होता है, और यह फ़र्क अक्सर हमें ही नहीं दिखता, क्योंकि हम अपनी कायरता को हमेशा समझदारी का नाम देते हैं। शायद ईमानदार जवाब यही है: पूछिए मत कि मैं कितना बोलूँ, पूछिए कि क्या मेरे घर में आनेवाला कोई भी व्यक्ति यह जान पाता है कि यहाँ रोशनी जलती है।
बारीकी
"भीतर आनेवाले" पर रुकिए। मत्ती में रोशनी घर के सब लोगों को मिलती है, यानी परिवार को। लूका उसे बदल देता है: जो भीतर आते हैं, वे बाहर से आते हैं। यह अनजान मेहमान है, वह जो अभी दरवाज़े पर है, अभी अपना नहीं हुआ। लूका की पूरी पुस्तक इसी दिशा में झुकी हुई है, गैर-यहूदियों की ओर, चुंगी लेनेवालों की ओर, गिरासेनी कब्रों में रहनेवाले की ओर। दीया अपने लोगों के लिए नहीं जलाया गया, बल्कि उसके लिए जो अभी ठोकर खाता हुआ अंधेरे से भीतर आ रहा है। आपकी कलीसिया, आपकी मेज़, आपका घर, इनकी परीक्षा यही है: जो पहली बार भीतर आता है, क्या उसे दिखाई देता है?
चिंतन
आपके जीवन में वह "बर्तन" क्या है जिससे आप रोशनी ढाँकते हैं, शर्म या आराम?
पिछली बार कोई अनजान व्यक्ति आपके घर या समूह में "भीतर आया" था, तब उसने क्या देखा?
Luke में और गहराई से जानें
चुनी हुई पुस्तकें जो इस बाइबल पुस्तक को और गहराई से समझाती हैं।
Warm, readable commentary on the Gospel for outsiders and doubters.
Follows Luke's careful account of the Savior for all nations.
Luke: An Introduction and Commentary
A trusted Tyndale commentary: compact, careful and clear on every passage.
Faith.network earns a small commission on Kobo purchases made through these links, at no extra cost to you. It helps keep the studies free.
Luke 8:16 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
लूका 8:16 का क्या अर्थ है?
लूका 8:16 किस विषय में है?
लूका 8:16 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
लूका 8:16 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
लूका 8:16 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Luke 8 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
प्रभु, तू उस किनारे पर भी उतरता है जहाँ लोग जाने से डरते हैं। मेरे भीतर की वे जगहें जिन्हें मैं छिपाकर रखता हूँ, जहाँ अकेलापन और शर्म बसी है, वहाँ तू आ। मुझे कब्रों के बीच से निकालकर अपने पास बिठा ले, और फिर से पूरा कर दे।
प्रभु, जब चारों ओर से लहरें उठती हैं और लगता है कि तू सो रहा है, तब भी मैं तुझे ही पुकारता हूँ। मेरे डर को शांत कर, जैसे तूने आँधी को शांत किया था। मुझे भरोसा दे कि तू मेरी नाव में है, और यही काफी है।
पिता, उस भीड़ की तरह मैं भी तेरी राह देखता हूँ। कभी लगता है तू देर कर रहा है, फिर भी मेरा मन तुझी पर टिका रहे। जब तू आए, मेरा हृदय खुले दरवाज़े जैसा हो, तुझे खुशी से अपनाने को तैयार। मेरी प्रतीक्षा को भरोसे में बदल दे।
इस अंश को किसी और स्तर पर देखें
शुरुआती, धर्मशास्त्री, या कोई अलग लंबाई? सेटिंग्स बदलें और अपना संस्करण बनाएँ।
अध्ययन टूल में खोलें