लूका 8:28
पाठ
कब्रों में रहनेवाला वह आदमी यीशु को देखते ही चीख उठता है, उनके सामने गिर पड़ता है और चिल्लाकर कहता है: "हे परमप्रधान परमेश्वर के पुत्र यीशु! मुझे तुझ से क्या काम? मैं तुझ से विनती करता हूँ, मुझे पीड़ा न दे।" ध्यान दीजिए कि यह वाक्य किन दो हिस्सों से बना है। पहले हिस्से में सबसे ऊँचा स्वीकार है, वह नाम जो अभी तक लूका के सुसमाचार में भीड़ ने नहीं पुकारा; दूसरे हिस्से में सबसे ठंडी दूरी है, "मुझे तुझ से क्या काम"। घुटने झुके हुए हैं, आवाज़ ऊँची है, शब्द सही हैं, और फिर भी पूरी विनती यही है कि यीशु पास न आएँ, हाथ न लगाएँ, कुछ न बदलें।
मर्म
यहाँ वह बात खुलकर सामने आती है जिससे हम सब बचना चाहते हैं: सही धर्मशास्त्र अपने आप में उद्धार नहीं है। दुष्टात्माएँ यीशु की पहचान गलील के धर्मगुरुओं से ज़्यादा साफ़ जानती हैं। वे उनका नाम जानती हैं, उनका पद जानती हैं, उनके अधिकार को मानती हैं, और उनके सामने गिरती भी हैं। जो गायब है वह ज्ञान नहीं, समर्पण है। परमेश्वर के पुत्र के आने का अर्थ है कि अब कुछ भी पहले जैसा नहीं रह सकता, और यही बात अंधकार के लिए "पीड़ा" है। जहाँ राज्य आता है, वहाँ कब्ज़ा टूटता है। इसलिए यीशु की उपस्थिति तटस्थ कभी नहीं होती: वह या तो छुड़ाती है या बेचैन करती है, पर छूकर बिना बदले लौट नहीं जाती।
सूत्र
पूरे बाइबल की कहानी में परमेश्वर बार-बार वहाँ आते हैं जहाँ उनका स्वागत नहीं होता। अदन में मनुष्य पेड़ों के पीछे छिपता है, मिस्र में फ़िरौन कहता है कि यहोवा कौन है कि मैं उसकी सुनूँ, और यहाँ झील पार करके आया परमेश्वर का पुत्र सबसे पहले यही सुनता है: दूर रहो। लूका ने इस घटना को जान-बूझकर आँधी के तुरंत बाद रखा है। चेले पूछते हैं, "यह कौन है, जो आँधी और पानी को भी आज्ञा देता है"; और नाव से उतरते ही अंधकार उस प्रश्न का उत्तर चीखकर दे देता है। मसीह का राज्य ऐसे ही आगे बढ़ता है: किसी शांत धार्मिक सभा में नहीं, बल्कि उस सीमा पर जहाँ कब्रें, सूअर और जंजीरें हैं। क्रूस तक यही क्रम चलेगा, जहाँ अंधकार आख़िरी बार चिल्लाएगा और हार जाएगा।
दर्पण
आप शायद कभी कब्रों में नहीं रहे, पर वह आधा वाक्य आपका भी हो सकता है। "मुझे तुझ से क्या काम" वह प्रार्थना है जो हम बिना बोले करते हैं: प्रभु, रविवार आपका, पर मेरा बैंक खाता मेरा; आप मेरे दुःख में आइए, पर मेरे गुस्से में नहीं; मेरी बीमारी छू लीजिए, पर मेरे उस रिश्ते को नहीं जिसे मैं छिपाकर रखता हूँ। हम में से कई लोग यीशु से डरते नहीं, हम उनसे बदले जाने से डरते हैं। क्योंकि वह ज़ंजीर जिससे हम बँधे हैं, अब हमारी पहचान बन चुकी है, और उसका टूटना पहले पीड़ा जैसा ही लगता है। ध्यान दीजिए, यह आदमी झूठ नहीं बोल रहा। वह सच बोल रहा है, घुटनों पर है, और फिर भी छुटकारा नहीं माँग रहा।
आज, दस मिनट के भीतर: अकेले में बैठकर अपने जीवन के उस एक क्षेत्र का नाम ज़ोर से बोलिए जिसे आपने चुपचाप यीशु से बाहर रखा है, और उसी साँस में कहिए, "यह भी आपका है, इसे छू लीजिए।"
कठिन प्रश्न
पर क्या छुटकारा वाकई पीड़ा जैसा होता है? यह पद उस असहज सच्चाई को नहीं छिपाता। दुष्टात्मा जिसे "पीड़ा" कहती है, वही उस आदमी के लिए स्वस्थ मन और कपड़े पहनकर बैठना बन जाता है। यानी एक ही स्पर्श किसी के लिए मुक्ति है और किसी के लिए विनाश। और यह प्रश्न और तीखा हो जाता है जब हम देखते हैं कि गिरासेनियों के लोग भी अंत में यही कहते हैं, "हमारे यहाँ से चला जा।" वे बिना दुष्टात्मा के भी वही प्रार्थना करते हैं। हमारे पास इसका कोई साफ़-सुथरा जवाब नहीं कि मनुष्य अपने ही चंगाई देनेवाले को क्यों भगा देता है। बाइबल इस अंधेपन को समझाती नहीं, दिखाती है, और हमें अपने भीतर उसे पहचानने के लिए छोड़ देती है।
अंतर्पाठ
याकूब अपनी पत्री में ठीक यही बात कहता है कि दुष्टात्माएँ भी विश्वास करती हैं और थरथराती हैं; विश्वास जो कर्मों में नहीं उतरता, वह उनसे ऊँचा नहीं। और इसी अध्याय में बीज का दृष्टान्त पहले ही चेतावनी दे चुका है: कुछ लोग "आनन्द से वचन को ग्रहण तो करते हैं, परन्तु जड़ न पकड़ने से वे थोड़ी देर तक विश्वास रखते हैं, और परीक्षा के समय बहक जाते हैं।" चट्टान पर गिरा बीज और कब्रों में चिल्लाती आवाज़ एक ही सच्चाई के दो चेहरे हैं: सही शब्द बिना समर्पण के मिट्टी नहीं बनते।
बारीकी
"परमप्रधान परमेश्वर" वह नाम है जो बाइबल में अक्सर उन लोगों के मुँह में मिलता है जो इस्राएल के बाहर से हैं, गैर-यहूदी जो इस परमेश्वर को दूर से पहचानते हैं पर अपना नहीं कहते। यह सम्मान का नाम है, पर संबंध का नहीं। ठीक यही इस पद की त्रासदी है: आदमी यीशु को सबसे ऊँचा पद देता है और सबसे ज़्यादा दूरी भी। और फिर देखिए यीशु उसे अंत में क्या भेजते हैं: "अपने घर में लौट जा और लोगों से कह दे, कि परमेश्वर ने तेरे लिये कैसे बड़े-बड़े काम किए हैं।" दूर का परमप्रधान अब "तेरे लिये" काम करनेवाला परमेश्वर बन गया। यही अंतर मसीह लाते हैं।
चिंतन
आपकी प्रार्थनाओं में कौन-सा विषय हमेशा गायब रहता है, और उसका गायब रहना क्या बताता है?
अगर यीशु आज आपकी एक ज़ंजीर तोड़ दें, तो आप किसे खोने से सबसे ज़्यादा डरेंगे?
Luke में और गहराई से जानें
चुनी हुई पुस्तकें जो इस बाइबल पुस्तक को और गहराई से समझाती हैं।
Warm, readable commentary on the Gospel for outsiders and doubters.
Follows Luke's careful account of the Savior for all nations.
Luke: An Introduction and Commentary
A trusted Tyndale commentary: compact, careful and clear on every passage.
Faith.network earns a small commission on Kobo purchases made through these links, at no extra cost to you. It helps keep the studies free.
Luke 8:28 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
लूका 8:28 का क्या अर्थ है?
लूका 8:28 किस विषय में है?
लूका 8:28 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
लूका 8:28 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
लूका 8:28 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Luke 8 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
प्रभु, तू उस किनारे पर भी उतरता है जहाँ लोग जाने से डरते हैं। मेरे भीतर की वे जगहें जिन्हें मैं छिपाकर रखता हूँ, जहाँ अकेलापन और शर्म बसी है, वहाँ तू आ। मुझे कब्रों के बीच से निकालकर अपने पास बिठा ले, और फिर से पूरा कर दे।
प्रभु, जब चारों ओर से लहरें उठती हैं और लगता है कि तू सो रहा है, तब भी मैं तुझे ही पुकारता हूँ। मेरे डर को शांत कर, जैसे तूने आँधी को शांत किया था। मुझे भरोसा दे कि तू मेरी नाव में है, और यही काफी है।
पिता, उस भीड़ की तरह मैं भी तेरी राह देखता हूँ। कभी लगता है तू देर कर रहा है, फिर भी मेरा मन तुझी पर टिका रहे। जब तू आए, मेरा हृदय खुले दरवाज़े जैसा हो, तुझे खुशी से अपनाने को तैयार। मेरी प्रतीक्षा को भरोसे में बदल दे।
इस अंश को किसी और स्तर पर देखें
शुरुआती, धर्मशास्त्री, या कोई अलग लंबाई? सेटिंग्स बदलें और अपना संस्करण बनाएँ।
अध्ययन टूल में खोलें