बाइबल व्याख्या

मरकुस 16

बाइबल
यह अध्याय JL Group के सहयोग से संभव हुआ है

पाठ

सब्त बीतते ही तीन स्त्रियाँ सुगन्धित मसाले लेकर कब्र की ओर चलती हैं, और रास्ते भर उनकी चिंता एक ही है: "हमारे लिये कब्र के द्वार पर से पत्थर कौन लुढ़काएगा?" पत्थर पहले से हटा हुआ है, कब्र खाली है, और श्वेत वस्त्र पहने एक जवान कहता है कि जो क्रूस पर चढ़ाया गया था वही जी उठा है, और चेलों तथा पतरस को गलील बुलाया जा रहा है। स्त्रियाँ काँपती हुई भाग जाती हैं और किसी से कुछ नहीं कहतीं। इसके बाद का हिस्सा संक्षेप में बताता है कि यीशु मरियम मगदलीनी को, फिर दो यात्रियों को, फिर ग्यारह को दिखाई दिए, उनके अविश्वास पर उलाहना दिया, सारे जगत में प्रचार का आदेश दिया, और स्वर्ग पर उठा लिए गए।

मर्म

स्वर्गदूत यह नहीं कहता कि "मसीह जीवित हैं" किसी अस्पष्ट आध्यात्मिक अर्थ में। वह पहचान बताता है: "तुम यीशु नासरी को, जो क्रूस पर चढ़ाया गया था, ढूँढ़ती हो। वह जी उठा है।" जो जी उठा, वही है जो मारा गया था, उसी नाम और उसी शरीर के साथ। पुनरुत्थान मृत्यु के इनकार का नाम नहीं, मृत्यु के पार जाने का नाम है। और ध्यान दीजिए कि परमेश्वर ने यह समाचार किसे सौंपा: उन स्त्रियों को जिनकी गवाही उस समय अदालत में मान्य नहीं थी, और जो डर के मारे भाग गईं। सुसमाचार की नींव मानवीय योग्यता पर नहीं रखी गई। अंतिम पद यही खोलता है: "प्रभु उनके साथ काम करता रहा।" कर्ता वही हैं।

जोड़ने वाला सूत्र

"सप्ताह के पहले दिन बड़े भोर, जब सूरज निकला ही था" इन शब्दों में सृष्टि की पहली सुबह की गूँज है। सब्त बीत चुका है, विश्राम का दिन पूरा हो चुका है, और एक नया पहला दिन शुरू होता है, इस बार कब्रिस्तान में। मरकुस की पुस्तक जिस "सुसमाचार" शब्द से आरम्भ हुई थी, वह यहाँ "सारी सृष्टि" तक फैल जाता है, यानी सिर्फ इस्राएल तक नहीं। और जब कहा जाता है कि यीशु "परमेश्वर की दाहिनी ओर बैठ गया", तो भजन संहिता 110 का वह राजगीत पूरा होता है जिसमें दाऊद का पुत्र परमेश्वर के दाहिने सिंहासन पर बैठाया जाता है। क्रूस से सिंहासन तक का यह रास्ता ही पूरे धर्मशास्त्र की रीढ़ है।

दर्पण

वे स्त्रियाँ एक शव की सेवा करने जा रही थीं। उनकी भक्ति सच्ची थी, पर उनकी कल्पना कब्र से आगे नहीं जा सकी। हम भी ऐसे ही जीते हैं: बीमारी की रिपोर्ट, टूटा रिश्ता, बेटे का दूर चले जाना, वह नौकरी जो लौटेगी नहीं। हम मसाले खरीदते हैं, यानी नुकसान को थोड़ा सहनीय बनाने का इंतजाम करते हैं, और रास्ते भर उस पत्थर की चिंता करते हैं जिसे हम हटा ही नहीं सकते। पाठ कहता है कि पत्थर पहले ही हटा हुआ था। पर सबसे तीखा शब्द पद 14 में है, जहाँ यीशु अपने ही चेलों की "मन की कठोरता" पर उलाहना देते हैं, फिर उन्हीं को भेज देते हैं।

आज यह कीजिए: किसी एक ऐसे व्यक्ति का नाम सोचिए जो अपनी असफलता या शर्म के कारण मंडली या विश्वास से कट गया है, और आज ही उसे एक छोटा संदेश भेजिए जिसमें उसका नाम हो और यह बात हो कि परमेश्वर ने उसे नहीं भुलाया।

एक बारीकी

"उसके चेलों और पतरस से कहो।" पतरस चेलों में ही तो था, फिर अलग से नाम क्यों? क्योंकि पतरस को यकीन था कि वह अब उस सूची में नहीं रहा। कुछ ही घंटे पहले उसने आँगन में तीन बार कसम खाकर कहा था कि वह इस आदमी को जानता तक नहीं। मरकुस ने वह दृश्य निर्ममता से लिखा है, और अब वही मरकुस यह छोटा सा "और पतरस से" दर्ज करता है। यह क्षमा की घोषणा नहीं, उससे भी पहले की चीज़ है: नाम लेकर बुलावा। पुनरुत्थान का पहला व्यावहारिक असर यह है कि जिसने इनकार किया, उसका नाम फिर से पुकारा जाता है।

शास्त्र में गूँज

गलील का वह वादा नया नहीं है। अन्तिम भोज के बाद, जैतून पहाड़ पर जाते हुए यीशु ने यही कहा था कि जी उठने के बाद वे उनसे पहले गलील जाएँगे (मरकुस 14:28), और स्वर्गदूत उसी वाक्य को दोहराता है: "जैसा उसने तुम से कहा था।" पुनरुत्थान अचानक हुआ चमत्कार नहीं, पूरा हुआ वचन है। एक तनाव भी खुला रहता है: पद 8 में स्त्रियाँ "किसी से कुछ न कहा", और पद 15 में आदेश है "सारे जगत में जाकर… प्रचार करो"। मरकुस पाठक को इसी खाई पर छोड़ता है, मानो पूछ रहा हो कि अब चुप्पी तोड़ने की बारी किसकी है। और पद 18 के साँप को कल्पना समझने से पहले प्रेरितों के काम 28 पढ़िए, जहाँ मलिता द्वीप पर पौलुस के हाथ से साँप लिपट जाता है और उसे कुछ नहीं होता। ये चिन्ह सुरक्षा की गारंटी नहीं, मिशन के रास्ते में परमेश्वर की संगति के प्रमाण हैं।

मुख्य पात्र

इस अध्याय का सबसे अजीब पहलू यह है कि मुख्य पात्र अधिकांश समय अनुपस्थित है। यीशु पहले सुने जाते हैं, फिर देखे जाते हैं। वे "तुम से पहले" चलते हैं, यानी जहाँ चेले पहुँचेंगे वहाँ वे पहले से मौजूद होंगे। वे अपने डरपोक अनुयायियों की कठोरता पर नाराज़ होते हैं, यह छिपाया नहीं गया; पर उस नाराज़गी के तुरंत बाद आदेश आता है, दंड नहीं। जो उलाहना देते हैं, वही भेजते हैं, और फिर स्वर्ग से हाथ नहीं खींचते: "प्रभु उनके साथ काम करता रहा।" यही मरकुस के यीशु का चरित्र है, दाहिनी ओर बैठे हुए भी अपने लोगों के साथ ज़मीन पर काम करते हुए।

चिंतन

आपके जीवन का वह "पत्थर" कौन सा है जिसके बारे में आप रास्ते भर चिंता करते हैं, और क्या आपने कभी सोचा कि परमेश्वर उसे आपके पहुँचने से पहले हटा चुके हों?

अगर आज कोई स्वर्गदूत कहता, "चेलों और … से कहो", तो उस खाली जगह में आपका नाम किस कारण से लिखा जाना आपको सबसे ज़्यादा चौंकाता?

Mark में और गहराई से जानें

चुनी हुई पुस्तकें जो इस बाइबल पुस्तक को और गहराई से समझाती हैं।

King's Cross

Timothy Keller

Keller walks through Mark to show the life of Jesus as one great story.

Mark For Everyone

N.T. Wright

Wright's punchy guide through the fastest moving Gospel.

The Message of Mark

Donald English

A clear companion to Mark's urgent good news.

Mark: An Introduction and Commentary

R. Alan Cole

A trusted Tyndale commentary: compact, careful and clear on every passage.

Mark

David Garland

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Mark 16 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

मरकुस 16 का क्या अर्थ है?
सब्त बीतते ही तीन स्त्रियाँ सुगन्धित मसाले लेकर कब्र की ओर चलती हैं, और रास्ते भर उनकी चिंता एक ही है: "हमारे लिये कब्र के द्वार पर से पत्थर कौन लुढ़काएगा?" पत्थर पहले से हटा हुआ है, कब्र खाली है, और श्वेत वस्त्र पहने एक जवान कहता है कि जो क्रूस पर चढ़ाया गया था वही जी उठा है, और चेलों तथा पतरस को गलील बुलाया जा रहा है। स्त्रियाँ काँपती हुई भाग जाती हैं और किसी से कुछ नहीं कहतीं। इसके बाद का हिस्सा संक्षेप में बताता है कि यीशु मरियम मगदलीनी को, फिर दो यात्रियों को, फिर ग्यारह को दिखाई दिए, उनके अविश्वास पर उलाहना दिया, सारे जगत में प्रचार का आदेश दिया, और स्वर्ग पर उठा लिए गए।
मरकुस 16 किस विषय में है?
"सप्ताह के पहले दिन बड़े भोर, जब सूरज निकला ही था" इन शब्दों में सृष्टि की पहली सुबह की गूँज है। सब्त बीत चुका है, विश्राम का दिन पूरा हो चुका है, और एक नया पहला दिन शुरू होता है, इस बार कब्रिस्तान में। मरकुस की पुस्तक जिस "सुसमाचार" शब्द से आरम्भ हुई थी, वह यहाँ "सारी सृष्टि" तक फैल जाता है, यानी सिर्फ इस्राएल तक नहीं। और जब कहा जाता है कि यीशु "परमेश्वर की दाहिनी ओर बैठ गया", तो भजन संहिता 110 का वह राजगीत पूरा होता है जिसमें दाऊद का पुत्र परमेश्वर के दाहिने सिंहासन पर बैठाया जाता है। क्रूस से सिंहासन तक का यह रास्ता ही पूरे धर्मशास्त्र की रीढ़ है।
मरकुस 16 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
आज यह कीजिए: किसी एक ऐसे व्यक्ति का नाम सोचिए जो अपनी असफलता या शर्म के कारण मंडली या विश्वास से कट गया है, और आज ही उसे एक छोटा संदेश भेजिए जिसमें उसका नाम हो और यह बात हो कि परमेश्वर ने उसे नहीं भुलाया।
मरकुस 16 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
गलील का वह वादा नया नहीं है। अन्तिम भोज के बाद, जैतून पहाड़ पर जाते हुए यीशु ने यही कहा था कि जी उठने के बाद वे उनसे पहले गलील जाएँगे (मरकुस 14:28), और स्वर्गदूत उसी वाक्य को दोहराता है: "जैसा उसने तुम से कहा था।" पुनरुत्थान अचानक हुआ चमत्कार नहीं, पूरा हुआ वचन है। एक तनाव भी खुला रहता है: पद 8 में स्त्रियाँ "किसी से कुछ न कहा", और पद 15 में आदेश है "सारे जगत में जाकर.
मरकुस 16 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
आपके जीवन का वह "पत्थर" कौन सा है जिसके बारे में आप रास्ते भर चिंता करते हैं, और क्या आपने कभी सोचा कि परमेश्वर उसे आपके पहुँचने से पहले हटा चुके हों?
हमारे साझेदारों के सहयोग से संभव

Mark 16 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

धन्यवाद संपादकीय पर पद 7

पिता, धन्यवाद कि स्वर्गदूत ने कहा, "उसके चेलों और पतरस से कहो।" जिसने तीन बार इनकार किया, उसका नाम आपने अलग से लिया। यही आपका प्रेम है जो गिरे हुओं को छोड़ता नहीं, बुलाकर फिर अपने पास ले आता है। मेरी असफलताओं के बाद भी आप मुझे नाम लेकर पुकारते हैं, इसके लिए मेरा हृदय आभारी है।

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