बाइबल व्याख्या

मरकुस 16:15

बाइबल
यह वचन YGC PENTECOSTAL CHURCH OF GOD द्वारा समर्पित है

पाठ

भोजन की मेज़ पर, जहाँ ग्यारह चेले बैठे थे, जी उठे हुए प्रभु ने पहले उनके अविश्वास और मन की कठोरता पर उलाहना दिया, और फिर, उसी साँस में, उन्हें भेज दिया। आयत पंद्रह में वे कहते हैं: "तुम सारे जगत में जाकर सारी सृष्टि के लोगों को सुसमाचार प्रचार करो।" यह कोई सुझाव नहीं, आदेश है। जिन लोगों ने अभी-अभी गवाहों की बात मानने से इनकार किया था, वही अब गवाह बनाकर भेजे जा रहे हैं। मरकुस की पूरी पुस्तक जिस ओर बढ़ रही थी, वह यहाँ खुलती है: कब्र खाली है, और इसलिए दरवाज़ा खुला है, और चेलों को भीतर बैठे रहने की अनुमति नहीं है।

मर्म

ध्यान दीजिए कि आदेश किस क्रम में आता है। पहले उलाहना, फिर नियुक्ति। यदि सेवा की योग्यता विश्वास की मज़बूती से तय होती, तो ये ग्यारह कभी न भेजे जाते। परमेश्वर यहाँ अपने राज्य के काम को मनुष्य की आत्मिक उपलब्धि पर नहीं, बल्कि मसीह के जी उठने पर टिकाते हैं। सुसमाचार का अर्थ यही है: यह समाचार उन लोगों के द्वारा फैलता है जो स्वयं उसी अनुग्रह के मोहताज हैं जिसकी वे घोषणा करते हैं। और "प्रचार करो" का अर्थ कोई गहरी दार्शनिक चर्चा नहीं, बल्कि एक घटना की घोषणा है, जैसे कोई दूत राजा की जीत का समाचार गली-गली सुनाता है। समाचार पहले से सच है; सुनानेवाले उसे सच नहीं बनाते, केवल पहुँचाते हैं।

मुख्य सूत्र

मरकुस अपनी पुस्तक इन शब्दों से शुरू करता है कि यह "यीशु मसीह का सुसमाचार" है, और अब अंत में वही सुसमाचार चेलों के हाथ में सौंपा जा रहा है। बीच में क्या हुआ? वह गलील से निकलकर दिकापुलिस गए, एक सुरुफिनिकी स्त्री की बेटी को चंगा किया, और क्रूस के नीचे पहली स्पष्ट स्वीकारोक्ति एक रोमी सूबेदार के मुँह से निकली। यानी मसीह स्वयं पूरे जीवन में उस सीमा को लाँघते रहे जो इस्राएल और जगत के बीच खींची गई थी। अब्राहम से किया गया वादा, कि उसके द्वारा पृथ्वी के सब कुल आशीष पाएँगे, यहाँ एक आदेश का रूप ले लेता है। मुक्ति की योजना कभी एक जाति तक सीमित नहीं थी; क्रूस और पुनरुत्थान ने वह बाँध तोड़ दिया।

दर्पण

हममें से अधिकांश चुप इसलिए नहीं रहते कि हमारे पास शब्द नहीं, बल्कि इसलिए कि हमें डर है कि लोग क्या सोचेंगे। दफ्तर में वह सहकर्मी जो धर्म को पिछड़ापन मानता है, रिश्तेदारी में वह भाई जिससे पिछली बार बहस हो गई थी, वह बेटा जो अब चर्च नहीं आता। हम सोचते हैं कि जब तक हमारा अपना विश्वास पूरी तरह साफ नहीं हो जाता, तब तक हमें बोलने का अधिकार नहीं। यह आयत उस बहाने को छीन लेती है। जिन्हें उलाहना मिला था, वही भेजे गए। आपकी अधूरी समझ और डगमगाता भरोसा आपको अयोग्य नहीं ठहराता; मसीह ने उन्हीं को भेजा। आज ही किसी एक व्यक्ति को संदेश भेजिए और एक वाक्य में लिखिए कि मसीह का जी उठना आपके लिए क्या मायने रखता है।

संदर्भ

यह दृश्य यरूशलेम में, पुनरुत्थान के दिनों में घटता है, एक ऐसे कमरे में जहाँ डर हवा की तरह भरा हुआ था। चेले गलील के मछुआरे और मामूली लोग थे, जिनका नेता अभी-अभी रोमी राज्य द्वारा राजद्रोही की मौत मारा गया था। उस समाज में किसी क्रूस पर चढ़ाए गए व्यक्ति का अनुयायी होना सामाजिक आत्महत्या थी। और "सारा जगत" उनके लिए कोई नक्शा नहीं था, बल्कि रोमी साम्राज्य की सड़कें, बंदरगाह, बाज़ार और वे जातियाँ थीं जिन्हें वे बचपन से अशुद्ध मानते आए थे। मरकुस का पहला पाठक-वर्ग संभवतः रोम में सताव झेल रहे मसीही थे। उनके लिए यह आयत कोई मिशनरी नारा नहीं, बल्कि उस जोखिम का औचित्य थी जिसे वे पहले ही उठा चुके थे।

एक बारीकी

"सारी सृष्टि" पर रुकिए। यूनानी शब्द है क्तिसिस, जिसका अर्थ केवल "सब लोग" नहीं, बल्कि "समस्त रचना" है। यह उत्पत्ति की भाषा है, वह संसार जिसे परमेश्वर ने बनाया और जो मनुष्य के पाप के साथ टूट गया। प्रभु यह नहीं कहते कि जाकर कुछ चुने हुए लोगों को समझाओ; वे कहते हैं कि घोषणा उस पूरे दायरे तक पहुँचे जिस पर श्राप पड़ा था। पुनरुत्थान केवल आत्माओं का बीमा नहीं, वह नई सृष्टि का पहला दिन है, और इसीलिए मरकुस बार-बार "सप्ताह के पहले दिन" कहता है। सुसमाचार का दायरा उतना ही चौड़ा है जितना नुकसान का दायरा था। जहाँ-जहाँ टूटन पहुँची, वहाँ-वहाँ यह समाचार भेजा गया है।

श्रोताओं का चेहरा

कल्पना कीजिए कि रोम की किसी तंग गली में, दीपक की रोशनी में, एक छोटी मंडली यह पुस्तक सुन रही है। उनमें दास हैं, स्त्रियाँ हैं, कुछ यहूदी, कुछ गैर-यहूदी। उन्हें अभी-अभी यह सुनाया गया है कि स्त्रियाँ डर के मारे कब्र से भाग गईं और किसी से कुछ न कहा, और चेलों ने बार-बार विश्वास करने से इनकार किया। यह सुनकर उनके कंधे शायद थोड़े ढीले पड़े होंगे, क्योंकि उनका अपना डर भी असली था। और फिर यह आदेश आता है। उनके कानों में यह सज़ा नहीं, भरोसा था: प्रभु ने डरे हुए लोगों को ही चुना। वे जानते थे कि उनका बोलना उन्हें महँगा पड़ सकता है, पर अब वे यह भी जानते थे कि बोलनेवाले अकेले नहीं भेजे जाते।

चिंतन

जिन ग्यारह को उलाहना मिला, उन्हीं को भेजा गया; आपके भीतर का कौन-सा अविश्वास आपको यह मानने से रोकता है कि परमेश्वर आपको भी भेज सकते हैं?

यदि सुसमाचार "सारी सृष्टि" के लिए है, तो आपके जीवन का कौन-सा दायरा अब तक उस समाचार से अछूता रह गया है?

Mark में और गहराई से जानें

चुनी हुई पुस्तकें जो इस बाइबल पुस्तक को और गहराई से समझाती हैं।

King's Cross

Timothy Keller

Keller walks through Mark to show the life of Jesus as one great story.

Mark For Everyone

N.T. Wright

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The Message of Mark

Donald English

A clear companion to Mark's urgent good news.

Mark: An Introduction and Commentary

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Mark 16:15 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

मरकुस 16:15 का क्या अर्थ है?
भोजन की मेज़ पर, जहाँ ग्यारह चेले बैठे थे, जी उठे हुए प्रभु ने पहले उनके अविश्वास और मन की कठोरता पर उलाहना दिया, और फिर, उसी साँस में, उन्हें भेज दिया। आयत पंद्रह में वे कहते हैं: "तुम सारे जगत में जाकर सारी सृष्टि के लोगों को सुसमाचार प्रचार करो।" यह कोई सुझाव नहीं, आदेश है। जिन लोगों ने अभी-अभी गवाहों की बात मानने से इनकार किया था, वही अब गवाह बनाकर भेजे जा रहे हैं। मरकुस की पूरी पुस्तक जिस ओर बढ़ रही थी, वह यहाँ खुलती है: कब्र खाली है, और इसलिए दरवाज़ा खुला है, और चेलों को भीतर बैठे रहने की अनुमति नहीं है।
मरकुस 16:15 किस विषय में है?
मरकुस अपनी पुस्तक इन शब्दों से शुरू करता है कि यह "यीशु मसीह का सुसमाचार" है, और अब अंत में वही सुसमाचार चेलों के हाथ में सौंपा जा रहा है। बीच में क्या हुआ? वह गलील से निकलकर दिकापुलिस गए, एक सुरुफिनिकी स्त्री की बेटी को चंगा किया, और क्रूस के नीचे पहली स्पष्ट स्वीकारोक्ति एक रोमी सूबेदार के मुँह से निकली। यानी मसीह स्वयं पूरे जीवन में उस सीमा को लाँघते रहे जो इस्राएल और जगत के बीच खींची गई थी। अब्राहम से किया गया वादा, कि उसके द्वारा पृथ्वी के सब कुल आशीष पाएँगे, यहाँ एक आदेश का रूप ले लेता है। मुक्ति की योजना कभी एक जाति तक सीमित नहीं थी; क्रूस और पुनरुत्थान ने वह बाँध तोड़ दिया।
मरकुस 16:15 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
यह दृश्य यरूशलेम में, पुनरुत्थान के दिनों में घटता है, एक ऐसे कमरे में जहाँ डर हवा की तरह भरा हुआ था। चेले गलील के मछुआरे और मामूली लोग थे, जिनका नेता अभी-अभी रोमी राज्य द्वारा राजद्रोही की मौत मारा गया था। उस समाज में किसी क्रूस पर चढ़ाए गए व्यक्ति का अनुयायी होना सामाजिक आत्महत्या थी। और "सारा जगत" उनके लिए कोई नक्शा नहीं था, बल्कि रोमी साम्राज्य की सड़कें, बंदरगाह, बाज़ार और वे जातियाँ थीं जिन्हें वे बचपन से अशुद्ध मानते आए थे। मरकुस का पहला पाठक-वर्ग संभवतः रोम में सताव झेल रहे मसीही थे। उनके लिए यह आयत कोई मिशनरी नारा नहीं, बल्कि उस जोखिम का औचित्य थी जिसे वे पहले ही उठा चुके थे।
मरकुस 16:15 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
कल्पना कीजिए कि रोम की किसी तंग गली में, दीपक की रोशनी में, एक छोटी मंडली यह पुस्तक सुन रही है। उनमें दास हैं, स्त्रियाँ हैं, कुछ यहूदी, कुछ गैर-यहूदी। उन्हें अभी-अभी यह सुनाया गया है कि स्त्रियाँ डर के मारे कब्र से भाग गईं और किसी से कुछ न कहा, और चेलों ने बार-बार विश्वास करने से इनकार किया। यह सुनकर उनके कंधे शायद थोड़े ढीले पड़े होंगे, क्योंकि उनका अपना डर भी असली था। और फिर यह आदेश आता है। उनके कानों में यह सज़ा नहीं, भरोसा था: प्रभु ने डरे हुए लोगों को ही चुना। वे जानते थे कि उनका बोलना उन्हें महँगा पड़ सकता है, पर अब वे यह भी जानते थे कि बोलनेवाले अकेले नहीं भेजे जाते।
मरकुस 16:15 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
यदि सुसमाचार "सारी सृष्टि" के लिए है, तो आपके जीवन का कौन-सा दायरा अब तक उस समाचार से अछूता रह गया है?
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Mark 16 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

धन्यवाद संपादकीय पर पद 7

पिता, धन्यवाद कि स्वर्गदूत ने कहा, "उसके चेलों और पतरस से कहो।" जिसने तीन बार इनकार किया, उसका नाम आपने अलग से लिया। यही आपका प्रेम है जो गिरे हुओं को छोड़ता नहीं, बुलाकर फिर अपने पास ले आता है। मेरी असफलताओं के बाद भी आप मुझे नाम लेकर पुकारते हैं, इसके लिए मेरा हृदय आभारी है।

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