मरकुस 5:25
पाठ
भीड़ के बीच, याईर की बेटी की ओर बढ़ते यीशु के पीछे, मरकुस अचानक कैमरा घुमा देता है और एक स्त्री पर ठहर जाता है जिसका नाम वह नहीं बताता। बारह वर्षों से उसके शरीर से लहू बह रहा है, एक ऐसी बीमारी जो न उसे मरने देती है और न जीने। बस इतना ही कहा गया है: "और एक स्त्री, जिसको बारह वर्ष से लहू बहने का रोग था।" एक वाक्य, जिसमें बारह साल समा गए हैं। कोई पृष्ठभूमि नहीं, कोई परिवार नहीं, कोई शहर नहीं। केवल समय, शरीर, और एक रिसाव जो रुकता नहीं। यह वाक्य उतना ही अधूरा है जितना उसका जीवन रहा होगा, और शायद इसीलिए यह हमें रोक लेता है।
मूल मर्म
बारह वर्ष। इस संख्या को जल्दी पढ़ जाना आसान है, पर ठहरिए: बारह बार बसंत आया और गया, और कुछ नहीं बदला। परमेश्वर उस समय कहाँ थे जब वह खून बहता रहा और कोई चंगाई न आई? पाठ इसका उत्तर नहीं देता। वह केवल इतना करता है कि इस स्त्री को उस कथा के भीतर रख देता है जहाँ यीशु पहले से चल रहे हैं। यही इस वचन का धर्मशास्त्रीय हृदय है: लंबी, अनसुनी, अनाम पीड़ा परमेश्वर की दृष्टि से बाहर नहीं होती, भले ही वर्षों तक ऐसा लगे कि वह बाहर ही है। मरकुस उसे किसी पाप का परिणाम नहीं बताता, न कोई कारण गिनाता है। वह केवल उसकी उपस्थिति दर्ज करता है, और इस दर्ज होने में ही एक मौन घोषणा है: जो शरीर अशुद्ध ठहराया गया, वही शरीर अब मसीह की कहानी के केंद्र में खींचा जा रहा है।
सूत्र
व्यवस्था में लहू का बहना अशुद्धता लाता था, और अशुद्धता छूने से फैलती थी। इसीलिए यह स्त्री बारह साल से एक ऐसी दीवार के पीछे जी रही थी जो दिखती नहीं पर हर रिश्ते को काट देती है। बाइबल की बड़ी कहानी में लहू दो दिशाओं में बहता है: एक ओर वह जीवन का रिसना है, क्षय, मृत्यु की ओर खिंचाव; दूसरी ओर वह बलिदान है, वह लहू जो शुद्ध करता है। इस स्त्री का बहता लहू पहली दिशा का चिह्न है, और वह उसी के पास पहुँचती है जिसका बहाया हुआ लहू दूसरी दिशा खोलेगा। मरकुस यह कहीं नहीं कहता। पर कहानी की बुनावट में यह धागा पड़ा है, और जो धीरे पढ़ता है वह उसे महसूस करता है।
दर्पण
आपके जीवन में भी कोई संख्या है। कोई आठ साल, कोई चौदह, कोई तीन। वह विवाह जो ठंडा पड़ा है, वह बेटा जो फोन नहीं उठाता, वह दर्द जिसके लिए डॉक्टर कंधे उचका देते हैं, वह कर्ज़ जो हर महीने थोड़ा और गहरा होता है। हम इन चीज़ों के बारे में प्रार्थना करना छोड़ देते हैं, इसलिए नहीं कि हमने विश्वास छोड़ दिया, बल्कि इसलिए कि थकान विश्वास से ज़्यादा ज़ोर से बोलती है। यह वचन आपको समाधान नहीं देता। वह केवल यह दिखाता है कि एक थकी हुई, खर्च हो चुकी स्त्री भी सुसमाचार के पन्ने पर दर्ज की जाती है। आज एक कागज़ पर वह संख्या लिखिए, केवल अंक, और उसे देखते हुए ऊँची आवाज़ में परमेश्वर से कहिए: "इतने वर्ष हो गए हैं। आप जानते हैं।" इससे ज़्यादा कुछ कहने की ज़रूरत नहीं।
संदर्भ
यीशु अभी-अभी झील पार करके लौटे हैं, जहाँ गिरासेनियों के देश में उन्हें जाने को कह दिया गया था। अब भीड़ है, धक्कामुक्की है, और सबसे आगे आराधनालय का सरदार याईर है, जिसकी बेटी मर रही है। याईर के पास नाम है, पद है, और लोगों का ध्यान। उसके लिए यीशु चल पड़े हैं। ठीक इसी क्षण मरकुस भीड़ के किनारे से एक स्त्री को उठाता है जिसके पास इनमें से कुछ नहीं। समाज के नियमों के अनुसार उसे वहाँ होना ही नहीं चाहिए था; भीड़ में घुसना उसके लिए हर उस व्यक्ति को अशुद्ध करना था जिससे वह टकराती। वह जानती होगी। फिर भी वह आई। कहानी के इस मोड़ पर दो दुनियाएँ टकराती हैं: वह जिसके लिए दरवाज़े खुलते हैं, और वह जिसे दरवाज़ों से बाहर रखा गया है।
एक बारीकी
"बारह वर्ष।" यह संख्या इस अध्याय में दो बार आती है। याईर की बेटी के बारे में अंत में लिखा है: "क्योंकि वह बारह वर्ष की थी।" जिस वर्ष वह लड़की पैदा हुई, उसी वर्ष इस स्त्री का जीवन रिसना शुरू हुआ। एक के लिए बारह साल बढ़ना था, दूसरी के लिए घुलना। मरकुस यह संयोग बताता नहीं, बस रख देता है, जैसे कोई दो तस्वीरें अगल-बगल टाँग दे। और यह चुप्पी ही सवाल पैदा करती है: परमेश्वर का समय एक ही अवधि में दो इतनी अलग कहानियाँ कैसे लिखता है? हमारे पास इसका उत्तर नहीं है। पर इतना दिखता है कि दोनों कहानियाँ एक ही व्यक्ति के पास आकर मिलती हैं, और वहीं दोनों के बारह साल पलट जाते हैं।
श्रोता
मरकुस के पहले पाठक रोम के सताए हुए विश्वासी थे, लोग जो लंबी प्रतीक्षा जानते थे। उनके कानों में "बारह वर्ष" कोई भावुक ब्योरा नहीं था, बल्कि अपनी ही हालत का आईना। उनमें से कई यहूदी नहीं थे और शुद्धता के नियम नहीं जानते थे, पर बहिष्कार का अनुभव सब जानते थे: दास, स्त्रियाँ, गरीब, बीमार, वे जिन्हें सभा से, काम से, परिवार से निकाल दिया गया था। जब उन्होंने सुना कि एक अनाम स्त्री की बीमारी का हिसाब सुसमाचार में दर्ज हुआ, तो यह उनके लिए एक वादा था कि उनकी गुमनामी भी दर्ज हो रही है। वे यह भी जानते थे जो हम भूल जाते हैं: कहानी में आना ही अपने आप में कृपा है।
आपके जीवन की वह "बारह वर्ष" वाली बात क्या है, और आपने आखिरी बार उसके बारे में परमेश्वर से कब खुलकर बात की थी?
जब परमेश्वर किसी और की ज़रूरत के लिए "चल पड़े" दिखते हैं और आप किनारे पर खड़े रह जाते हैं, तब आपके भीतर क्या जागता है, और क्या आप उसे प्रार्थना में कह पाते हैं?
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Mark 5:25 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
मरकुस 5:25 का क्या अर्थ है?
मरकुस 5:25 किस विषय में है?
मरकुस 5:25 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
मरकुस 5:25 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
मरकुस 5:25 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Mark 5 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
वे झील के पार गिरासेनियों के देश में पहुँचे।" तूफान झेला, रात भर की नाव, और किनारे पर कौन खड़ा था? सिर्फ एक आदमी, जिसे सब ने कब्रों में छोड़ दिया था। यीशु ने पूरी झील इसलिए पार की कि एक टूटे हुए इंसान तक पहुँच सके। तुम्हें लगता है तुम्हारा कोना बहुत दूर है? वह वहाँ भी नाव मोड़ देता है।
सूअर चराने वालों ने भागकर पूरे इलाके में खबर फैला दी, "और लोग यह देखने आए कि क्या हुआ है।" भीड़ दौड़ी चली आई, पर देखने के बाद उन्होंने यीशु से चले जाने को कहा। सोचो, खबर फैलाना और उत्सुकता से दौड़ना काफी नहीं था। तुम भी यीशु के पास आए हो, पर किसलिए? बस कुछ देखने, या उसे अपने बीच रखने?
प्रभु, मेरे भीतर भी वही चुपचाप सी आशा है कि बस तेरे पास पहुँच जाऊँ, तेरा किनारा छू लूँ, और सब बदल जाए। भीड़ में खो जाने का डर है, फिर भी हाथ बढ़ा रही हूँ। मेरी टूटन को तू जानता है, और मैं जानता हूँ कि तेरा स्पर्श काफी है।
याईर आराधनालय का सरदार था, इज़्ज़तदार आदमी। पर बेटी की सांस टूटती देख वह भीड़ के बीच यीशु के पाँवों पर गिर पड़ा और गिड़गिड़ाकर कहा, "मेरी छोटी बेटी मरने पर है; तू आकर उस पर हाथ रख, कि वह चंगी होकर जीवित रहे।" पद नहीं, प्यार बोल रहा था। तेरी कौन सी चिंता है जिसे तू अब तक इज़्ज़त के डर से उसके सामने नहीं रख पाया?
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