मरकुस 5
पाठ
गिरासेनियों के देश में, कब्रों के बीच रहनेवाला एक आदमी यीशु से मिलता है; उसमें इतनी अशुद्ध आत्माएँ हैं कि वह अपना नाम भूलकर कहता है, "मेरा नाम सेना है; क्योंकि हम बहुत हैं।" यीशु उन्हें निकालते हैं, सूअरों का झुण्ड झील में डूब मरता है, और जो आदमी कोई जंजीर वश में न कर सकी थी वह "कपड़े पहने और सचेत बैठे" मिलता है। नगर के लोग डरकर यीशु से विनती करते हैं कि "हमारी सीमा से चला जा।" फिर झील के इस पार दो कहानियाँ एक-दूसरे में गुँथ जाती हैं: याईर अपनी मरती बेटी के लिये यीशु के पाँवों पर गिरता है, और रास्ते में बारह वर्ष से लहू बहने के रोग से पीड़ित एक स्त्री चुपके से उनका वस्त्र छू लेती है। एक को शांति मिलती है, दूसरी को जीवन: "तलीता कूमी।"
मर्म
इस अध्याय में यीशु तीन बार उस सीमा को लाँघते हैं जिसे कोई धर्मी यहूदी नहीं लाँघता था: कब्रिस्तान, रक्तस्राव, और लाश। तीनों अशुद्धता के सबसे गहरे स्रोत थे, और नियम के अनुसार अशुद्धता छूने से फैलती है, पवित्रता नहीं। पर यहाँ प्रवाह उलट जाता है। स्त्री उन्हें छूती है और अशुद्ध वह नहीं होते, चंगी वह होती है। वे मरी हुई लड़की का हाथ पकड़ते हैं और मृत्यु उनसे चिपकती नहीं, जीवन उस तक पहुँच जाता है। यही मर्म है: परमेश्वर का राज्य कोई सुरक्षित घेरा नहीं जिसमें साफ लोग बचे रहें, बल्कि वह सामर्थ्य है जो गंदगी में उतरकर उसे भीतर से जीत लेती है। और ध्यान दीजिए, यीशु किसी से योग्यता नहीं माँगते; न पागल से, न उस स्त्री से जो "डरती और काँपती हुई" आई थी। अनुग्रह पहले पहुँचता है, समझ बाद में आती है।
मुक्ति की डोर
एक पूरी "सेना" को पानी में डुबोया जाना संयोग नहीं लगता। इस्राएल की स्मृति में एक ही ऐसा दृश्य है: फ़िरौन की सेना समुद्र में डूब गई और दास आज़ाद होकर किनारे पर खड़े रह गए। मरकुस उस चित्र को दोहराता है, पर अब बंधुआ एक अकेला आदमी है और छुड़ानेवाला एक गलीली बढ़ई। जो परमेश्वर मिस्र से निकालते थे, वही अब नाव से उतरते हैं। और डोर आगे जाती है: यीशु मृत्यु को छूकर अशुद्ध नहीं होते, पर एक दिन वे स्वयं कब्र में उतरेंगे, स्वयं सारी अशुद्धता अपने ऊपर लेंगे, और तीसरे दिन वही आवाज़ उन पर लागू होगी जो उन्होंने लड़की से कही थी। "तलीता कूमी" उस सुबह का पूर्वाभास है। जो आदमी कब्रों में रहता था, वह दिकापुलिस में पहला ग़ैर-यहूदी प्रचारक बन जाता है, अन्यजातियों तक पहुँचने वाले सुसमाचार का पहला बीज।
दर्पण
बारह साल। कल्पना कीजिए कि किसी बीमारी ने आपकी बचत खा ली, हर नया डॉक्टर नई उम्मीद और नया बिल लेकर आया, और अंत में आप "और भी रोगी" हो गए। या याईर को देखिए: आराधनालय का सरदार, जिसकी इज़्ज़त पर उसका पूरा जीवन टिका है, भीड़ के सामने घुटनों पर गिरता है, क्योंकि बच्ची की साँस उसकी प्रतिष्ठा से ज़्यादा भारी है। और फिर वह असहनीय देरी, जब यीशु किसी और के लिये रुक जाते हैं और घर से ख़बर आती है कि अब देर हो चुकी। हममें से बहुतों की प्रार्थना ठीक वहीं टूटती है। पर गिरासेनियों के नगर पर भी नज़र डालिए: उन्होंने चंगाई देखी और फिर भी कहा, "हमारी सीमा से चला जा," क्योंकि सूअर उनकी कमाई थे। परमेश्वर का आना सस्ता नहीं पड़ता।
आज ही अपने घर के किसी एक व्यक्ति से, एक वाक्य में, कहिए कि प्रभु ने आप पर दया करके क्या बड़ा काम किया है। यीशु ने उस आदमी को यही एक काम सौंपा था।
प्रसंग
झील के पूर्वी किनारे का दिकापुलिस यहूदी दुनिया का किनारा था: दस यूनानी नगरों का क्षेत्र, जहाँ सूअर पाले जाते थे और रोमी सिक्के चलते थे। "सेना" शब्द वहाँ रोज़मर्रा का था, रोमी सेना की एक लीजन में हज़ारों सैनिक होते थे, और क़ब्ज़े में जीने वाले लोगों के कानों में वह नाम डर की तरह बजता था। दो हज़ार सूअरों का डूबना एक छोटे नगर की अर्थव्यवस्था का डूबना था। झील के पश्चिमी किनारे पर माहौल बिल्कुल उलटा है: आराधनालय, नियम, शुद्धता की सीमाएँ। वहाँ लगातार रक्तस्राव वाली स्त्री धार्मिक रूप से अशुद्ध मानी जाती थी, इसलिये भीड़ में घुसकर किसी रब्बी को छूना उसके लिये सिर्फ़ साहस नहीं, नियम-भंग था। इसीलिये वह "डरती और काँपती हुई" सामने आती है।
मुख्य पात्र
इस अध्याय में यीशु अजीब तरह से अनजल्दबाज़ हैं। मरती हुई बच्ची की ओर जाते हुए वे रुकते हैं, मुड़ते हैं, और पूछते हैं, "मेरा वस्त्र किसने छुआ?" चेलों को यह मूर्खता लगती है, भीड़ तो उन पर गिरी पड़ रही है। पर यीशु भीड़ और स्पर्श में फ़र्क करते हैं। वे दुष्टात्मा से भी नाम पूछते हैं, जैसे अंधाधुंध ताक़त चलाना उनका तरीक़ा ही न हो। उनमें सामर्थ्य है, पर वह सामर्थ्य व्यक्तिगत है, कीमत चुकाती है, "मुझसे सामर्थ्य निकली है।" और अंत में, जब सब चकित खड़े हैं, वे सबसे साधारण बात कहते हैं: "इसे कुछ खाने को दो।" जो परमेश्वर मृतकों को जिलाते हैं, वही याद रखते हैं कि बच्ची भूखी होगी।
एक बारीकी
दो बार "बारह" आता है। स्त्री बारह वर्ष से बह रही है; लड़की बारह वर्ष की है। यानी जिस साल याईर के घर में खुशी जन्मी, उसी साल इस स्त्री का जीवन रिसना शुरू हुआ। मरकुस दोनों को एक ही धागे में बाँधता है और फिर वह करता है जो चौंकाता है: नामहीन, बहिष्कृत स्त्री को यीशु "पुत्री" कहकर पुकारते हैं, ठीक उसी क्षण जब एक पिता अपनी पुत्री के लिये तड़प रहा है। पूरे मरकुस में यीशु किसी और को इस नाम से नहीं बुलाते। बारह साल से जो औरत परिवार के बाहर थी, वह एक शब्द में परिवार के भीतर लौट आती है। चंगाई शरीर में हुई थी; अपनापन इस शब्द में मिला।
चिंतन के प्रश्न
आपके जीवन में वह कौन-सी जगह है जहाँ आप चाहते हैं कि यीशु चंगा करें, पर नहीं चाहते कि वे बहुत पास आएँ, क्योंकि उनके आने की कीमत आपके "सूअरों" को चुकानी पड़ेगी?
यीशु ने उस आदमी को साथ चलने नहीं दिया, बल्कि घर भेजा। आपके लिये "घर" कौन-सा है, और वहाँ आपने प्रभु के बड़े कामों के बारे में आख़िरी बार कब कुछ कहा था?
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Mark 5 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
वे झील के पार गिरासेनियों के देश में पहुँचे।" तूफान झेला, रात भर की नाव, और किनारे पर कौन खड़ा था? सिर्फ एक आदमी, जिसे सब ने कब्रों में छोड़ दिया था। यीशु ने पूरी झील इसलिए पार की कि एक टूटे हुए इंसान तक पहुँच सके। तुम्हें लगता है तुम्हारा कोना बहुत दूर है? वह वहाँ भी नाव मोड़ देता है।
सूअर चराने वालों ने भागकर पूरे इलाके में खबर फैला दी, "और लोग यह देखने आए कि क्या हुआ है।" भीड़ दौड़ी चली आई, पर देखने के बाद उन्होंने यीशु से चले जाने को कहा। सोचो, खबर फैलाना और उत्सुकता से दौड़ना काफी नहीं था। तुम भी यीशु के पास आए हो, पर किसलिए? बस कुछ देखने, या उसे अपने बीच रखने?
प्रभु, मेरे भीतर भी वही चुपचाप सी आशा है कि बस तेरे पास पहुँच जाऊँ, तेरा किनारा छू लूँ, और सब बदल जाए। भीड़ में खो जाने का डर है, फिर भी हाथ बढ़ा रही हूँ। मेरी टूटन को तू जानता है, और मैं जानता हूँ कि तेरा स्पर्श काफी है।
याईर आराधनालय का सरदार था, इज़्ज़तदार आदमी। पर बेटी की सांस टूटती देख वह भीड़ के बीच यीशु के पाँवों पर गिर पड़ा और गिड़गिड़ाकर कहा, "मेरी छोटी बेटी मरने पर है; तू आकर उस पर हाथ रख, कि वह चंगी होकर जीवित रहे।" पद नहीं, प्यार बोल रहा था। तेरी कौन सी चिंता है जिसे तू अब तक इज़्ज़त के डर से उसके सामने नहीं रख पाया?
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