मरकुस 5:1
पाठ
नाव किनारे लगती है, और मरकुस एक ही वाक्य में पूरा दृश्य बदल देता है: "वे झील के पार गिरासेनियों के देश में पहुँचे।" तूफान पीछे छूट गया, चेले अब भी काँप रहे होंगे, और सामने वह तट है जिसे गलील का कोई यहूदी अपनी मर्जी से नहीं चुनता। यह वाक्य कोई भौगोलिक टिप्पणी भर नहीं है। यह एक सीमा-पार है। "पार" शब्द मरकुस के पहले पाँच अध्यायों में बार-बार लौटता है, और हर बार उसके साथ कुछ नया, कुछ जोखिम भरा शुरू होता है। यहाँ यीशु मसीह जानबूझकर उस मिट्टी पर पाँव रखते हैं जहाँ सूअर चरते हैं, जहाँ कब्रें बस्ती के पास हैं, जहाँ ग्रीक बोली जाती है और रोमी सिक्के चलते हैं। अगला ही वाक्य बताएगा कि उस तट पर उनका स्वागत करने कौन आया।
मूल बात
पहली सदी के गलीली कान के लिए "गिरासेनियों का देश" शुद्धता की सीमा के उस पार था। दिकापुलिस के ये दस यूनानी नगर सिकंदर के बाद बसे, रोम के अधीन फले-फूले, और यहूदी दृष्टि में मूर्तिपूजा, नंगी मूर्तियों, स्नानगृहों और सूअरपालन के इलाके थे। कब्रों की धूल, सूअरों की गंध, विदेशी देवताओं के मंदिर: तीनों अशुद्धता के प्रतीक, और तीनों इसी एक तट पर इकट्ठे। इसलिए यह छोटा-सा वाक्य कहता है कि परमेश्वर का राज्य सीमाओं का सम्मान नहीं करता, वह उन्हें लाँघता है। यीशु मसीह अशुद्धता से बचकर नहीं चलते; वे उसमें उतरते हैं, और अशुद्धता उन्हें दूषित नहीं करती, बल्कि वे उस भूमि को छूकर बदल देते हैं। कृपा वहाँ पहले पहुँचती है जहाँ धर्मनिष्ठ लोग जाना नहीं चाहते।
साझा सूत्र
बाइबल की बड़ी कहानी में यह पार जाना अचानक नहीं आता। अब्राहम को बुलाया गया था कि उसके द्वारा पृथ्वी के सारे कुल आशीष पाएँ, पर इस्राएल का इतिहास अधिकतर सीमा खींचने का इतिहास रहा: हम भीतर, वे बाहर। भविष्यद्वक्ता बार-बार वादा करते हैं कि एक दिन जातियाँ भी आएँगी, पर वह "एक दिन" हमेशा आगे खिसकता रहा। मरकुस 5:1 में वह दिन नाव से उतरता है। ध्यान दीजिए, यीशु मसीह जातियों के इंतजार में नहीं बैठते कि वे यरूशलेम आएँ; वे स्वयं उनके तट पर पहुँचते हैं। यही सुसमाचार की दिशा है, ऊपर से नीचे, भीतर से बाहर, शुद्ध से अशुद्ध की ओर। क्रूस पर भी वे नगर के बाहर, अशुद्ध जगह में मरेंगे, और वहीं से सारी दुनिया को भीतर बुलाएँगे।
दर्पण
हम सब के अपने "गिरासेनियों के देश" हैं। वह रिश्तेदार जिसका नंबर आपने चुपचाप ब्लॉक कर रखा है। दफ्तर का वह सहकर्मी जिसकी राजनीति और जीवनशैली आपको भीतर तक चुभती है। शहर का वह मोहल्ला जिससे आप गाड़ी घुमाकर निकल जाते हैं। कलीसिया में वह परिवार जिसका तलाक, जिसका कर्ज, जिसका बेटा हमें असहज करता है। हम इन सीमाओं को पवित्रता कहकर सजा लेते हैं, जबकि अक्सर वे केवल डर होती हैं: डर कि उनकी गंदगी हमें लग जाएगी। यह वचन उस डर पर उँगली रखता है। यीशु मसीह उस तट पर उतरे और अशुद्ध नहीं हुए; उन्होंने उस आदमी को छुआ और वह शुद्ध हुआ। आज एक काम कीजिए: उस एक व्यक्ति का नाम कागज पर लिखिए जिसके "देश" में आप जानबूझकर नहीं जाते, और अगले दस मिनट में उसे एक छोटा, सच्चा संदेश भेज दीजिए।
अंतर्पाठ
यशायाह 65 में परमेश्वर एक ऐसी प्रजा का वर्णन करते हैं जो "कब्रों के बीच बैठती" और "सूअर का मांस खाती" है, और ठीक उसी अध्याय में वे कहते हैं कि जिन्होंने उन्हें नहीं खोजा, उन्होंने उन्हें पा लिया। मरकुस मानो उस भविष्यद्वाणी का दृश्य फिल्मा रहा है: कब्रें, सूअर, और उनके बीच खड़े परमेश्वर के पुत्र। दूसरा सूत्र इसी अध्याय के भीतर है। जिस आदमी को यीशु मसीह छुड़ाते हैं, वह साथ चलना चाहता है, पर उसे कहा जाता है, "अपने घर जाकर अपने लोगों को बता," और "वह जाकर दिकापुलिस में इस बात का प्रचार करने लगा।" यानी पहला गैर-यहूदी प्रचारक इसी अशुद्ध तट पर खड़ा किया जाता है। पार जाना बेकार नहीं गया।
मुख्य पात्र
इस एक वाक्य में मुख्य पात्र वह है जो नाव से उतरने का निर्णय लेता है। तूफान अभी-अभी थमा है, चेले थके और डरे हुए हैं, और सामने कोई भीड़ स्वागत के लिए खड़ी नहीं। कोई आराधनालय नहीं, कोई निमंत्रण नहीं, कोई सम्मान नहीं। फिर भी यीशु मसीह उतरते हैं, और अगली सुबह तक वहाँ से निकाल दिए जाएँगे, क्योंकि लोग कहेंगे, "हमारी सीमा से चला जा।" वे यह जानते हुए भी जाते हैं। यही उनका स्वभाव है: वे उस एक आदमी के लिए पूरी झील पार करते हैं जिसका नाम तक कोई नहीं जानता, जो जंजीरों में जकड़ा और पत्थरों से लहूलुहान है। परमेश्वर की खोज कभी बहुमत की गिनती से नहीं चलती।
संदर्भ
गलील की झील पश्चिम में यहूदी बस्तियों से घिरी थी, पूरब में दिकापुलिस के यूनानी नगरों से। पूरबी किनारे पर पहाड़ी ढलानें सीधे पानी तक गिरती हैं, और वहाँ चट्टानों में काटी गई कब्रों की गुफाएँ आज भी दिखती हैं। सूअर वहाँ की सामान्य अर्थव्यवस्था थे, रोमी सैनिकों और यूनानी नगरवासियों के लिए मांस का स्रोत; यहूदी के लिए घृणा का प्रतीक। और "सेना" शब्द, जो थोड़ी देर बाद आएगा, रोमी सैन्य इकाई का नाम है, लगभग छह हजार सैनिक, जिनके ध्वज पर कहीं-कहीं जंगली सूअर का चिह्न भी था। यानी यह तट केवल धार्मिक रूप से अशुद्ध नहीं, राजनीतिक रूप से कब्जा किया हुआ इलाका था। उसी कब्जे वाली जमीन पर एक और राज्य पाँव रखता है।
चिंतन
आपके जीवन में वह "पार" कौन-सा है जिसे आपने पवित्रता का नाम देकर वास्तव में डर के कारण बंद कर रखा है?
यदि यीशु मसीह उस तट पर उतरे जहाँ से उन्हें अंततः निकाल दिया गया, तो क्या आप बिना परिणाम की गारंटी के किसी के पास जाने को तैयार हैं?
Mark में और गहराई से जानें
चुनी हुई पुस्तकें जो इस बाइबल पुस्तक को और गहराई से समझाती हैं।
Keller walks through Mark to show the life of Jesus as one great story.
Wright's punchy guide through the fastest moving Gospel.
Mark: An Introduction and Commentary
A trusted Tyndale commentary: compact, careful and clear on every passage.
Faith.network earns a small commission on Kobo purchases made through these links, at no extra cost to you. It helps keep the studies free.
Mark 5:1 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
मरकुस 5:1 का क्या अर्थ है?
मरकुस 5:1 किस विषय में है?
मरकुस 5:1 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
मरकुस 5:1 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
मरकुस 5:1 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Mark 5 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
वे झील के पार गिरासेनियों के देश में पहुँचे।" तूफान झेला, रात भर की नाव, और किनारे पर कौन खड़ा था? सिर्फ एक आदमी, जिसे सब ने कब्रों में छोड़ दिया था। यीशु ने पूरी झील इसलिए पार की कि एक टूटे हुए इंसान तक पहुँच सके। तुम्हें लगता है तुम्हारा कोना बहुत दूर है? वह वहाँ भी नाव मोड़ देता है।
सूअर चराने वालों ने भागकर पूरे इलाके में खबर फैला दी, "और लोग यह देखने आए कि क्या हुआ है।" भीड़ दौड़ी चली आई, पर देखने के बाद उन्होंने यीशु से चले जाने को कहा। सोचो, खबर फैलाना और उत्सुकता से दौड़ना काफी नहीं था। तुम भी यीशु के पास आए हो, पर किसलिए? बस कुछ देखने, या उसे अपने बीच रखने?
प्रभु, मेरे भीतर भी वही चुपचाप सी आशा है कि बस तेरे पास पहुँच जाऊँ, तेरा किनारा छू लूँ, और सब बदल जाए। भीड़ में खो जाने का डर है, फिर भी हाथ बढ़ा रही हूँ। मेरी टूटन को तू जानता है, और मैं जानता हूँ कि तेरा स्पर्श काफी है।
याईर आराधनालय का सरदार था, इज़्ज़तदार आदमी। पर बेटी की सांस टूटती देख वह भीड़ के बीच यीशु के पाँवों पर गिर पड़ा और गिड़गिड़ाकर कहा, "मेरी छोटी बेटी मरने पर है; तू आकर उस पर हाथ रख, कि वह चंगी होकर जीवित रहे।" पद नहीं, प्यार बोल रहा था। तेरी कौन सी चिंता है जिसे तू अब तक इज़्ज़त के डर से उसके सामने नहीं रख पाया?
इस अंश को किसी और स्तर पर देखें
शुरुआती, धर्मशास्त्री, या कोई अलग लंबाई? सेटिंग्स बदलें और अपना संस्करण बनाएँ।
अध्ययन टूल में खोलें