मत्ती 7:6
पाठ
पहाड़ी उपदेश के बीच यीशु का स्वर अचानक बदल जाता है। अभी-अभी बात आँख के तिनके और लट्ठे की थी, अपने भाई पर दोष न लगाने की, और अगले ही साँस में वे कहते हैं: "पवित्र वस्तु कुत्तों को न दो, और अपने मोती सूअरों के आगे मत डालो।" इसके साथ एक चेतावनी जुड़ी है जो कानों में चुभती है: ऐसा न हो कि वे उन्हें पाँवों तले रौंदें और पलटकर तुम को फाड़ डालें। संक्षेप में: जो परमेश्वर का है और अनमोल है, उसे हर किसी के सामने बिखेर देना न भक्ति है, न उदारता। कभी-कभी वह मूर्खता है, और कभी-कभी उसका अंत घाव में होता है।
मर्म
यह वचन उस संतुलन पर खड़ा है जिसे हम अक्सर गिरा देते हैं। पद 1 कहता है, दोष मत लगाओ; पद 6 कहता है, पहचानो कि तुम किसके सामने खड़े हो। दोनों में विरोध नहीं है। न्याय करने की मनाही का अर्थ यह नहीं कि विश्वासी अंधा हो जाए और उसके पास विवेक न बचे। परमेश्वर का अनुग्रह मुफ़्त है, पर सस्ता नहीं। मोती फेंके नहीं जाते, वे सौंपे जाते हैं। और जब कोई मनुष्य बार-बार, जानबूझकर, पवित्र को कुचलता है, तो प्रेम उसे ज़बरदस्ती नहीं ठूँसता; प्रेम पीछे हट जाता है और प्रतीक्षा करता है। यहाँ मसीह अपने शिष्यों को एक कठोर सच्चाई सौंप रहे हैं: राज्य का संदेश हर हृदय में उसी क्षण जड़ नहीं पकड़ता, और यह जानना निराशा नहीं, परिपक्वता है।
सूत्र
पवित्र वस्तु का ख़याल मंदिर से आता है। वेदी पर चढ़ाए गए माँस का एक हिस्सा याजकों के लिए अलग रखा जाता था, और उसे गली के कुत्तों के आगे डाल देना केवल बर्बादी नहीं, अपवित्रता थी। यीशु इस मंदिर-भाषा को उठाकर अपने राज्य के संदेश पर रख देते हैं। सुसमाचार वेदी का भाग है, याचना करते हाथों में सौंपा जाने वाला पवित्र निवाला।
यही सूत्र प्रेरितों तक चलता है। पौलुस और बरनबास अन्ताकिया में महीनों तक समझाते हैं, और जब विरोध कड़वा हो जाता है तो वे कहते हैं कि अब वे अन्यजातियों की ओर मुड़ते हैं (प्रेरितों 13:46)। यह क्रोध नहीं था, आज्ञाकारिता थी। मसीह स्वयं वही करते हैं: हेरोदेस के सामने वे चुप रहते हैं। जो सत्य को खेल बना चुका है, उसके सामने सत्य अपना मुँह बंद कर लेता है।
आईना
आपने भी यह किया है। रिश्तेदारों की उस मेज़ पर, जहाँ हर साल एक ही व्यक्ति आपके विश्वास को मनोरंजन बना देता है, और आप फिर भी अपनी सबसे गहरी बात खोल देते हैं, इस उम्मीद में कि इस बार तर्क जीतेगा। या उस सहकर्मी के सामने, जिसने आपकी प्रार्थना की आदत का मज़ाक बनाया, और आपने अपना सबसे कोमल अनुभव सुनाकर उसे पाँवों तले रौंदा जाते देखा। घाव असली था। पद 6 आपको कायर नहीं कहता; वह आपको विवेक देता है। हर चुप्पी हार नहीं होती। कुछ मोती जेब में रह जाते हैं क्योंकि प्रेम प्रतीक्षा करना जानता है।
आज वह अधूरा संदेश, जो आप बहस जीतने के लिए टाइप कर रहे हैं, मिटा दीजिए और उसी जगह उस व्यक्ति का नाम लिखकर एक वाक्य की प्रार्थना कीजिए।
अंतर्पाठ
यीशु अपने चेलों को भेजते समय कहते हैं कि जो घर उन्हें ग्रहण न करे, वहाँ से निकलकर पैरों की धूल झाड़ दें (मत्ती 10:14)। वही भाव: सुसमाचार थोपा नहीं जाता, वह प्रस्तुत किया जाता है। और तब वह विचित्र दृश्य आता है जब कनानी स्त्री से यीशु स्वयं कुत्तों का शब्द बोलते हैं, और वह स्त्री उसे पकड़कर उलट देती है, मेज़ के नीचे गिरे टुकड़ों की माँग करते हुए (मत्ती 15:26)। यीशु उसे सबसे बड़ा विश्वास कहते हैं। यह दोनों वचनों को एक साथ पढ़ना सिखाता है: पद 6 किसी व्यक्ति पर स्थायी मुहर नहीं लगाता। "कुत्ता" एक स्थिति है, नियति नहीं। जो टुकड़े के लिए भी झुकता है, उसे पूरी रोटी मिलती है।
श्रोता
पहाड़ पर बैठे गलील के लोग कुत्ते को पालतू साथी नहीं, कचरे के ढेर पर मँडराते झुंड के रूप में जानते थे, जो रात में गुर्राते और काटते थे। सूअर उनके लिए अशुद्धता का जीवित प्रतीक था; दिकापुलिस की पहाड़ियों पर यूनानी बस्तियों के झुंड चरते थे, और कोई यहूदी किसान अपनी बेटी का हार उस कीचड़ में नहीं फेंकता। इसलिए यीशु का चित्र उनके लिए धर्मशास्त्रीय पहेली नहीं, रोज़मर्रा का दृश्य था। उन्होंने यह सुना: वेदी का भाग गली में मत फेंको। और कुछ ने असहज होकर यह भी सुना होगा कि रब्बी लोग अन्यजातियों को किस नाम से बुलाते थे, और सोचा होगा कि यह शिक्षक किधर इशारा कर रहा है।
संदर्भ
दृश्य की कल्पना कीजिए। गलील झील के ऊपर की ढलान, घास पर बैठी भीड़, मछली की गंध हवा में, और एक बढ़ई का बेटा बोल रहा है जैसे उसे अधिकार प्राप्त हो। शास्त्री हमेशा किसी और के नाम पर बोलते थे; यह व्यक्ति अपने नाम पर बोलता है, और भीड़ इसी से चकित होती है (पद 29)। उपदेश अपने अंतिम मोड़ पर है। पद 6 के तुरंत बाद वे कहते हैं, "माँगो, तो तुम्हें दिया जाएगा", और यह क्रम संयोग नहीं है। पवित्र वस्तु उसे मिलती है जो माँगता है, ढूँढ़ता है, खटखटाता है। जो द्वार तोड़ना नहीं चाहता, उसके लिए द्वार खोला नहीं जाता, और यही पूरे उपदेश का संकरा फाटक है।
चिंतन
किस बातचीत में आप वर्षों से वही मोती दोहरा रहे हैं, और क्या यह प्रेम है या अपनी सही साबित करने की ज़रूरत?
आपके जीवन में कौन आज टुकड़ा माँग रहा है, जिसे आपने कभी पूरी रोटी के लायक़ नहीं समझा?
Matthew में और गहराई से जानें
चुनी हुई पुस्तकें जो इस बाइबल पुस्तक को और गहराई से समझाती हैं।
Short, fresh readings that make Matthew feel newly written.
The King and his kingdom, traced through the whole Gospel.
Matthew: An Introduction and Commentary
A trusted Tyndale commentary: compact, careful and clear on every passage.
The Message of the Sermon on the Mount
Stott's classic on Matthew 5-7, the charter of the kingdom.
Faith.network earns a small commission on Kobo purchases made through these links, at no extra cost to you. It helps keep the studies free.
Matthew 7:6 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
मत्ती 7:6 का क्या अर्थ है?
मत्ती 7:6 किस विषय में है?
मत्ती 7:6 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
मत्ती 7:6 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
मत्ती 7:6 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Matthew 7 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
यीशु ने प्रार्थना सिखाते हुए हमें "बुरे" कहा, और उसी साँस में याद दिलाया कि बुरे होकर भी तुम अपने बच्चे को पत्थर नहीं, रोटी देते हो। "तो तुम्हारा स्वर्गीय पिता अपने माँगनेवालों को अच्छी वस्तुएँ क्यों न देगा?" सोच, तेरा अधूरा, थका हुआ प्रेम भी बच्चे को भूखा नहीं रहने देता। फिर पिता का प्रेम तुझे कैसे भूल सकता है? आज माँगने से मत डर।
या तू अपने भाई से कैसे कह सकता है कि ला मैं तेरी आँख से तिनका निकाल दूँ और देख तेरी ही आँख में लट्ठा है?" ज़रा सोच, आँख में लट्ठा लिए कोई दूसरे की आँख के पास जाए तो वह मदद नहीं, चोट पहुँचाएगा। जिसे तू सुधारना चाहता है, कहीं तू उसे घायल तो नहीं कर रहा? पहले अपनी आँख साफ़ कर, फिर तेरा हाथ कोमल हो जाएगा।
पिता, धन्यवाद कि आप मुझे मेरी अपनी आँख का लट्ठा दिखाते हैं, न कि केवल भाई की आँख का तिनका। आपकी यह खरी बात मुझे शर्मिंदा नहीं, स्वतंत्र करती है। धन्यवाद कि आप मुझे दूसरों को आँकने से हटाकर अपनी दया के सामने झुकना सिखाते हैं।
इस अंश को किसी और स्तर पर देखें
शुरुआती, धर्मशास्त्री, या कोई अलग लंबाई? सेटिंग्स बदलें और अपना संस्करण बनाएँ।
अध्ययन टूल में खोलें