बाइबल व्याख्या

गिनती 6

बाइबल
यह अध्याय JL Group के सहयोग से संभव हुआ है

पाठ

यहोवा मूसा से कहते हैं: यदि कोई पुरुष या स्त्री अपने को यहोवा के लिये अलग करने की विशेष मन्नत माने, तो तीन बातें उस पर लागू होंगी। दाखलता से जो कुछ उत्पन्न होता है, "बीज से लेकर छिलके तक", उसमें से कुछ न खाए; सिर पर छुरा न फिराए; और किसी लोथ के पास न जाए, चाहे वह अपने माता-पिता की ही हो। यदि अचानक कोई मर जाए और अशुद्धता आ जाए, तो बलिदान चढ़ाकर सब कुछ फिर से आरम्भ करना होगा, क्योंकि बीते दिन "व्यर्थ गिने जाएँ"। दिन पूरे होने पर बलि, बालों का मेलबलि की आग में डाला जाना, और फिर सामान्य जीवन में लौटना। और अध्याय का अन्त उस आशीर्वाद पर होता है जो हारून को इस्राएल पर रखना था।

मर्म

ध्यान दीजिए कि यह मन्नत किसी को सौंपी नहीं गई, यह चुनी जाती है। लेवियों का अलगाव जन्म से था, याजकों का वंश से; पर यहाँ कोई भी, "पुरुष या स्त्री", अपने भीतर उठी प्यास के कारण परमेश्वर के लिये अलग हो सकता है। और आश्चर्य यह है कि यह अलगाव किसी अतिरिक्त धार्मिक काम से नहीं, बल्कि रुकने से बनता है। दाख नहीं, कैंची नहीं, शोक-घर नहीं। पवित्रता यहाँ कुछ जोड़ना नहीं, कुछ थाम लेना है। और यह पूरा अध्याय मनुष्य के समर्पण से शुरू होकर परमेश्वर के मुख पर समाप्त होता है। अन्त में जो बोला जाता है वह मन्नत नहीं, आशीष है। जैसे परमेश्वर कहना चाहते हैं: तेरा समर्पण सुन्दर है, पर अन्तिम शब्द मेरा है।

मुख्य सूत्र

नाज़ीर का चिन्ह उसके सिर पर था, बाहर से दिखने वाला। लूका 1:15 में स्वर्गदूत यूहन्ना बपतिस्मा देनेवाले के विषय में लगभग यही शब्द दोहराता है, कि वह दाखमधु न पीएगा; यानी यह पुरानी मन्नत नये नियम के द्वार पर फिर खड़ी होती है। परन्तु यीशु स्वयं नाज़ीर नहीं थे। उन्होंने दाखरस पिया, लोथ को छुआ, कुष्ठियों पर हाथ रखा। और वहीं सूत्र मुड़ता है: नाज़ीर लोथ के स्पर्श से अशुद्ध हो जाता था, मसीह के स्पर्श से लोथ जीवित हो जाती थी। जो पवित्रता नियम से बचाई जाती थी, वह उनमें ऐसी शक्ति बनकर आई जो अशुद्धता को अपनी ओर खींचकर शुद्ध कर देती है। और पद 25 का वह "मुख का प्रकाश", पौलुस कहता है, हमें मसीह के चेहरे में दिखाई देता है।

दर्पण

पद 7 खटकता है। अपनी माँ के जनाज़े पर भी न जाना? हमारी भक्ति आमतौर पर वहीं तक चलती है जहाँ वह परिवार, नौकरी और सुविधा से न टकराए। यह अध्याय पूछता है: क्या तुम्हारे जीवन में कोई एक चीज़ है जिसे तुमने स्वेच्छा से छोड़ा है, जिसका कोई आदेश नहीं था, केवल प्रेम था? और दूसरी ओर पद 12 का काँटा: बीते दिन "व्यर्थ गिने जाएँ"। हमें यह अन्याय लगता है, क्योंकि हम भीतर से मानते हैं कि हमारे दिन गिने जा रहे हैं और जोड़े जा रहे हैं। परन्तु अध्याय का अन्त बताता है कि गिनती परमेश्वर की आशीष पर टिकती है, हमारे रिकॉर्ड पर नहीं।

आज सोने से पहले किसी एक व्यक्ति के सामने, उसका नाम लेकर, पद 24 से 26 का आशीर्वाद ज़ोर से बोलिए।

संदर्भ

यह सीनै के नीचे का पड़ाव है। गिनती की पुस्तक के पहले अध्याय छावनी को व्यवस्थित कर रहे हैं: गोत्र गिने गए, लेवी अलग किए गए, तम्बू के चारों ओर क्रम तय हुआ। सब कुछ पद, वंश और नियुक्ति से चलता है। ठीक इसी बीच यह अध्याय एक खिड़की खोलता है: कोई भी सामान्य इस्राएली, स्त्री भी, अपनी इच्छा से पवित्रता के घेरे में कदम रख सकता है। उस समाज में जहाँ स्त्री की धार्मिक पहचान लगभग पूरी तरह पिता या पति से जुड़ी थी, यह छोटी बात नहीं। साथ ही यह सस्ता भी नहीं था: मेढ़ा, भेड़ के बच्चे, रोटियाँ, अर्घ। पद 21 ईमानदारी से कहता है, "जो चढ़ावा वह अपनी पूँजी के अनुसार चढ़ा सके"।

मुख्य पात्र

केन्द्र में परमेश्वर हैं, और उनका स्वर सुनने लायक है। वे मन्नत की माँग नहीं करते, पर जब कोई मानता है तो उसे गम्भीरता से लेते हैं। वे दुर्घटना के लिये रास्ता रखते हैं, पंडुक और कबूतरी, गरीब का बलिदान। वे अन्त में मन्नत तोड़ने की सज़ा नहीं, बल्कि अपना नाम देते हैं: "मेरे नाम को इस्राएलियों पर रखें, और मैं उन्हें आशीष दिया करूँगा।" तीन बार यहोवा का नाम, हर बार और निकट आता हुआ: पहले रक्षा, फिर अनुग्रह, फिर मुख का पूरा मुड़ जाना और शान्ति। यह उस परमेश्वर का चित्र है जो दूर से देखते नहीं, चेहरा घुमाते हैं। शोक-घर से दूर रहने वाले नाज़ीर के ऊपर वही चेहरा झुका है।

अन्य वचनों की गूँज

शिमशोन की कहानी (न्यायियों 13) इस अध्याय का उलटा दर्पण है: वह जन्म से नाज़ीर था, बिना अपनी मन्नत के, और उसने एक-एक शर्त तोड़ी, दाख, लोथ, और अन्त में बाल भी। जो अलगाव चुना नहीं जाता, वह भीतर से खोखला रह सकता है। दूसरी ओर, इस पाठ के हाशिये पर प्रेरितों के काम 21:23 का संकेत है, जहाँ पौलुस मन्नत मानने वालों के साथ सिर मुँड़ाता है, सदियों बाद, यीशु के बाद भी। इससे पता चलता है कि यह अध्याय इस्राएल की स्मृति में जीवित रहा। और शायद सबसे गहरी गूँज यह है कि नाज़ीर के बाल मेलबलि की आग में जलाए जाते हैं। समर्पण का चिन्ह अन्त में धुआँ बनकर उठ जाता है, और जो रह जाता है वह आशीष है।

चिंतन

आपके जीवन में कोई ऐसी बात है जो आपने किसी आज्ञा के कारण नहीं, केवल परमेश्वर के प्रेम के कारण छोड़ी है? यदि नहीं, तो क्यों नहीं?

"यहोवा अपना मुख तेरी ओर करे": आप मानते हैं कि परमेश्वर का चेहरा इस समय आपकी ओर है, या आपको लगता है कि वे कहीं और देख रहे हैं? उस भावना के साथ कुछ मिनट चुप बैठिए।

Numbers में और गहराई से जानें

चुनी हुई पुस्तकें जो इस बाइबल पुस्तक को और गहराई से समझाती हैं।

The Message of Numbers

Raymond Brown

Follows Israel through the wilderness and draws out lessons for the journey of faith.

Numbers: An Introduction and Commentary

Gordon Wenham

A trusted Tyndale commentary: compact, careful and clear on every passage.

Numbers: God's Presence in the Wilderness

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Preaching the wilderness years with Christ always in view.

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Numbers 6 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

गिनती 6 का क्या अर्थ है?
यहोवा मूसा से कहते हैं: यदि कोई पुरुष या स्त्री अपने को यहोवा के लिये अलग करने की विशेष मन्नत माने, तो तीन बातें उस पर लागू होंगी। दाखलता से जो कुछ उत्पन्न होता है, "बीज से लेकर छिलके तक", उसमें से कुछ न खाए; सिर पर छुरा न फिराए; और किसी लोथ के पास न जाए, चाहे वह अपने माता-पिता की ही हो। यदि अचानक कोई मर जाए और अशुद्धता आ जाए, तो बलिदान चढ़ाकर सब कुछ फिर से आरम्भ करना होगा, क्योंकि बीते दिन "व्यर्थ गिने जाएँ"। दिन पूरे होने पर बलि, बालों का मेलबलि की आग में डाला जाना, और फिर सामान्य जीवन में लौटना। और अध्याय का अन्त उस आशीर्वाद पर होता है जो हारून को इस्राएल पर रखना था।
गिनती 6 किस विषय में है?
नाज़ीर का चिन्ह उसके सिर पर था, बाहर से दिखने वाला। लूका 1:15 में स्वर्गदूत यूहन्ना बपतिस्मा देनेवाले के विषय में लगभग यही शब्द दोहराता है, कि वह दाखमधु न पीएगा; यानी यह पुरानी मन्नत नये नियम के द्वार पर फिर खड़ी होती है। परन्तु यीशु स्वयं नाज़ीर नहीं थे। उन्होंने दाखरस पिया, लोथ को छुआ, कुष्ठियों पर हाथ रखा। और वहीं सूत्र मुड़ता है: नाज़ीर लोथ के स्पर्श से अशुद्ध हो जाता था, मसीह के स्पर्श से लोथ जीवित हो जाती थी। जो पवित्रता नियम से बचाई जाती थी, वह उनमें ऐसी शक्ति बनकर आई जो अशुद्धता को अपनी ओर खींचकर शुद्ध कर देती है। और पद 25 का वह "मुख का प्रकाश", पौलुस कहता है, हमें मसीह के चेहरे में दिखाई देता है।
गिनती 6 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
आज सोने से पहले किसी एक व्यक्ति के सामने, उसका नाम लेकर, पद 24 से 26 का आशीर्वाद ज़ोर से बोलिए।
गिनती 6 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
केन्द्र में परमेश्वर हैं, और उनका स्वर सुनने लायक है। वे मन्नत की माँग नहीं करते, पर जब कोई मानता है तो उसे गम्भीरता से लेते हैं। वे दुर्घटना के लिये रास्ता रखते हैं, पंडुक और कबूतरी, गरीब का बलिदान। वे अन्त में मन्नत तोड़ने की सज़ा नहीं, बल्कि अपना नाम देते हैं: "मेरे नाम को इस्राएलियों पर रखें, और मैं उन्हें आशीष दिया करूँगा।" तीन बार यहोवा का नाम, हर बार और निकट आता हुआ: पहले रक्षा, फिर अनुग्रह, फिर मुख का पूरा मुड़ जाना और शान्ति। यह उस परमेश्वर का चित्र है जो दूर से देखते नहीं, चेहरा घुमाते हैं। शोक-घर से दूर रहने वाले नाज़ीर के ऊपर वही चेहरा झुका है।
गिनती 6 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
आपके जीवन में कोई ऐसी बात है जो आपने किसी आज्ञा के कारण नहीं, केवल परमेश्वर के प्रेम के कारण छोड़ी है? यदि नहीं, तो क्यों नहीं?
हमारे साझेदारों के सहयोग से संभव

Numbers 6 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 16

नाज़ीर ने अपनी मन्नत पूरी की, बाल नहीं कटवाए, दाखमधु नहीं छुआ, सब कुछ ठीक से निभाया। और फिर भी अंत में याजक "उसके पापबलि और होमबलि को चढ़ाए।" सोचो, सबसे समर्पित जीवन भी बिना बलिदान के परमेश्वर के सामने खड़ा नहीं हो सकता। तेरी सेवा, तेरा उपवास, तेरी ईमानदारी सुंदर है, पर तुझे बचाती नहीं। मसीह का लहू ही तुझे खड़ा रखता है।

प्रार्थना संपादकीय पर पद 13

पिता, जब किसी समर्पण का समय पूरा होता है, तो मुझे सिखा कि मैं खुद को तेरे सामने ले आऊँ, खाली हाथ नहीं, बल्कि खुले दिल से। जो वादा मैंने तुझसे किया, उसे अंत तक निभाने की शक्ति दे, और मेरी हर शुरुआत और हर अंत तुझी में हो।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 7

नाज़ीर की मन्नत लेने वाला अपने माता, पिता, भाई या बहन की मृत्यु पर भी अशुद्ध नहीं हो सकता था। अपने सबसे प्रियजन के शव के पास भी नहीं जा सकता था, क्योंकि "उसके परमेश्वर की मन्नत का चिन्ह उसके सिर पर होता है।"

सोचिए, कितनी कठिन बात है। जिस पिता ने उसे पाला, जिस माँ ने उसे जन्म दिया, उनके अंतिम संस्कार में भी वह सामान्य रीति से शामिल नहीं हो सकता। परमेश्वर के लिए अलग किया जाना कभी कभी हमारे सबसे कोमल रिश्तों से भी ऊँची कीमत माँगता है। क्या आप उस कीमत को पहचानते हैं जो आपका समर्पण आपसे माँग रहा है?

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