बाइबल व्याख्या

फिलिप्पियों 4:3

बाइबल

पाठ

पौलुस किसी अनजान साथी को, जिसे वह "हे सच्चे सहकर्मी" कहकर पुकारता है, एक सीधा निवेदन भेजता है: उन दो स्त्रियों की सहायता कर। ये वही यूओदिया और सुन्तुखे हैं जिनका मतभेद पिछले पद में सामने आया, और जिनसे पौलुस चाहता है कि वे "प्रभु में एक मन रहें"। फिर वह उनका परिचय देता है, और यही परिचय चौंकाता है: झगड़ालू बहनों के रूप में नहीं, बल्कि ऐसी साथियों के रूप में जिन्होंने "मेरे साथ सुसमाचार फैलाने में, क्लेमेंस और मेरे अन्य सहकर्मियों समेत परिश्रम किया"। बाकी नाम पौलुस गिनाता नहीं, बस एक वाक्य में सब समेट देता है: "जिनके नाम जीवन की पुस्तक में लिखे हुए हैं।" पत्र की सूची अधूरी है; असली सूची कहीं और रखी हुई है।

मूल बात

ध्यान दीजिए कि पौलुस मेल-मिलाप की बुनियाद कहाँ रखता है। वह न्याय नहीं करता, दोष नहीं बाँटता, यह तय नहीं करता कि कौन सही था। वह इन स्त्रियों को उनका असली नाम-पता याद दिलाता है: तुम वे हो जिनके नाम जीवन की पुस्तक में लिखे हुए हैं। यह पुस्तक कमाई नहीं जाती; इसमें नाम लिखे जाते हैं, और लिखने वाला परमेश्वर है। यानी इन दोनों की एकता का आधार उनका स्वभाव, उनकी सहमति या उनकी सेवा का रिकॉर्ड नहीं, बल्कि मसीह में चुना जाना और उनके लहू से मोल लिया जाना है। परिश्रम इस अनुग्रह का फल है, शर्त नहीं। और यहीं मतभेद की जड़ कटती है: जब दो लोग जानते हैं कि वे एक ही मेम्ने की पुस्तक में एक साथ लिखे हैं, तो आपस में अड़े रहना अपने ही उद्धार के तर्क को झुठलाना बन जाता है।

साझा सूत्र

"जीवन की पुस्तक" कोई नया विचार नहीं है। मूसा ने सीनै पर परमेश्वर से कहा था कि यदि लोगों को क्षमा न मिले तो मेरा नाम भी आपकी पुस्तक से मिटा दीजिए (निर्गमन 32); वहाँ एक मध्यस्थ अपने नाम को दाँव पर लगाकर दूसरों के नाम बचाना चाहता है। पुराने नियम में यह इच्छा अधूरी रह जाती है, क्योंकि मूसा का नाम किसी और के बदले में स्वीकार नहीं किया जाता। प्रकाशितवाक्य में वही पुस्तक फिर खुलती है, पर अब उसका मालिक नामधारी है: वह मेम्ने की जीवन की पुस्तक है। जो मूसा नहीं कर सका, वह मसीह ने किया, अपना नाम मिटने दिया ताकि हमारा लिखा जाए। इसलिए पौलुस का यह छोटा-सा वाक्य पूरे उद्धार-इतिहास का सिरा है: फिलिप्पी की दो बहनों का झगड़ा क्रूस की छाया में लाकर रख दिया गया है।

दर्पण

हम में से ज़्यादातर लोग अपने विवादों में एक ही चीज़ चाहते हैं: यह प्रमाणित हो जाए कि हम सही थे। कलीसिया की समिति में, ससुराल के व्हाट्सएप ग्रुप में, दफ़्तर की उस मीटिंग में जहाँ आपकी बात काट दी गई थी। और अक्सर हम सही भी होते हैं। पौलुस इसी जगह हाथ रखता है और सही होने के सवाल को ही किनारे कर देता है। वह नहीं पूछता कि यूओदिया ने क्या कहा; वह पूछता है कि उसका नाम कहाँ लिखा है। जिस व्यक्ति से आप महीनों से अकड़े हुए हैं, यदि उसका नाम भी उसी पुस्तक में है जिसमें आपका, तो आपकी अकड़ की उम्र बहुत छोटी है और आपके रिश्ते की उम्र अनन्त। आज ही एक काग़ज़ पर उस एक व्यक्ति का नाम लिखिए जिससे आपका मन फटा हुआ है, उसके नीचे लिखिए "जीवन की पुस्तक में", और वह नाम ज़ोर से बोलकर परमेश्वर के सामने रखिए।

मुख्य पात्र

पौलुस यहाँ जेल से लिख रहा है, और जेल आदमी को या तो कड़वा बनाती है या साफ़। वह साफ़ हो गया है। उसके पास न धमकी है, न पद का रौब; वह "विनती करता हूँ" कहता है। वह दोनों स्त्रियों का नाम खुलकर लिखता है, जो कठोर लग सकता है, पर साथ ही उनकी इज़्ज़त भी सार्वजनिक करता है: इन्होंने मेरे साथ परिश्रम किया। ऐसे समाज में जहाँ स्त्रियों का नाम सार्वजनिक पत्र में आना असामान्य था, पौलुस उन्हें "सहकर्मी" वाली श्रेणी में रखता है, उसी शब्द के साथ जिससे वह अपने साथी प्रचारकों को पुकारता है। और फिर वह ख़ुद पीछे हट जाता है और तीसरे व्यक्ति से मदद माँगता है। यह उस आदमी की तस्वीर है जो जानता है कि कलीसिया उसकी नहीं, मसीह की है।

पहले श्रोता

फिलिप्पी रोमी सैनिकों की बसाई हुई कॉलोनी थी, जहाँ नागरिकता एक असली, लिखित, रजिस्टर में दर्ज चीज़ थी। नाम सूची में हो तो आप कोई हैं; न हो तो आप कुछ नहीं। इस पत्र के श्रोता उन रजिस्टरों की ताक़त जानते थे। जब पौलुस कहता है कि इन लोगों के नाम जीवन की पुस्तक में लिखे हुए हैं, तो वे एक ऊँची, अदृश्य नागरिक-सूची की कल्पना करते हैं, जिसका सम्राट कैसर नहीं है। यही बात पत्र के अंत में और चुभती है, जहाँ "कैसर के घराने" के विश्वासी नमस्कार भेजते हैं। दोनों सूचियों में नाम हो सकते हैं, पर केवल एक सूची मृत्यु के पार तक चलती है। मंडली के छोटे-मोटे झगड़े ऐसी नागरिकता वाले लोगों को शोभा नहीं देते।

शास्त्र की गूँज

लूका 10 में शिष्य दुष्टात्माओं पर अधिकार पाकर लौटते हैं और यीशु उनकी खुशी की दिशा बदल देते हैं: इस पर आनन्दित मत हो कि आत्माएँ वश में हैं, बल्कि इस पर कि तुम्हारे नाम स्वर्ग में लिखे हैं। सेवा का रिकॉर्ड नहीं, दर्ज नाम, यही ठहराव है। और इसी पत्र के दूसरे अध्याय में पौलुस ने मसीह के उस मन का वर्णन किया था जिसने अपने को रिक्त कर दिया और क्रूस तक झुक गया। पद 3 उसी धर्मशास्त्र का ज़मीनी रूप है: जो मन क्रूस तक झुका, वही मन दो बहनों के बीच झुकने का सामर्थ्य देता है। एकता कोई अलग विषय नहीं, वह मसीह के दीन होने की नकल है।

चिंतन

आपकी पहचान इस समय किस "सूची" से बनी हुई है, और वह सूची मृत्यु के पार कितनी दूर तक चलती है?

जिस व्यक्ति से आपका मतभेद है, क्या आप उसका परिचय दूसरों के सामने वैसे दे सकते हैं जैसे पौलुस ने दिया, यानी उसकी सबसे बड़ी खूबी बताकर?

Philippians में और गहराई से जानें

चुनी हुई पुस्तकें जो इस बाइबल पुस्तक को और गहराई से समझाती हैं।

The Message of Philippians

Alec Motyer

Joy in every circumstance, traced through Paul's warmest letter.

Paul For Everyone: The Prison Letters

N.T. Wright

Ephesians, Philippians, Colossians and Philemon in short daily readings.

Philippians: An Introduction and Commentary

Ralph Martin

A trusted Tyndale commentary: compact, careful and clear on every passage.

Philippians

Frank Thielman

Explains what it meant then, and bridges it honestly to life now.

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Philippians 4:3 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

फिलिप्पियों 4:3 का क्या अर्थ है?
पौलुस किसी अनजान साथी को, जिसे वह "हे सच्चे सहकर्मी" कहकर पुकारता है, एक सीधा निवेदन भेजता है: उन दो स्त्रियों की सहायता कर। ये वही यूओदिया और सुन्तुखे हैं जिनका मतभेद पिछले पद में सामने आया, और जिनसे पौलुस चाहता है कि वे "प्रभु में एक मन रहें"। फिर वह उनका परिचय देता है, और यही परिचय चौंकाता है: झगड़ालू बहनों के रूप में नहीं, बल्कि ऐसी साथियों के रूप में जिन्होंने "मेरे साथ सुसमाचार फैलाने में, क्लेमेंस और मेरे अन्य सहकर्मियों समेत परिश्रम किया"। बाकी नाम पौलुस गिनाता नहीं, बस एक वाक्य में सब समेट देता है: "जिनके नाम जीवन की पुस्तक में लिखे हुए हैं।" पत्र की सूची अधूरी है; असली सूची कहीं और रखी हुई है।
फिलिप्पियों 4:3 किस विषय में है?
"जीवन की पुस्तक" कोई नया विचार नहीं है। मूसा ने सीनै पर परमेश्वर से कहा था कि यदि लोगों को क्षमा न मिले तो मेरा नाम भी आपकी पुस्तक से मिटा दीजिए (निर्गमन 32); वहाँ एक मध्यस्थ अपने नाम को दाँव पर लगाकर दूसरों के नाम बचाना चाहता है। पुराने नियम में यह इच्छा अधूरी रह जाती है, क्योंकि मूसा का नाम किसी और के बदले में स्वीकार नहीं किया जाता। प्रकाशितवाक्य में वही पुस्तक फिर खुलती है, पर अब उसका मालिक नामधारी है: वह मेम्ने की जीवन की पुस्तक है। जो मूसा नहीं कर सका, वह मसीह ने किया, अपना नाम मिटने दिया ताकि हमारा लिखा जाए। इसलिए पौलुस का यह छोटा-सा वाक्य पूरे उद्धार-इतिहास का सिरा है: फिलिप्पी की दो बहनों का झगड़ा क्रूस की छाया में लाकर रख दिया गया है।
फिलिप्पियों 4:3 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
पौलुस यहाँ जेल से लिख रहा है, और जेल आदमी को या तो कड़वा बनाती है या साफ़। वह साफ़ हो गया है। उसके पास न धमकी है, न पद का रौब; वह "विनती करता हूँ" कहता है। वह दोनों स्त्रियों का नाम खुलकर लिखता है, जो कठोर लग सकता है, पर साथ ही उनकी इज़्ज़त भी सार्वजनिक करता है: इन्होंने मेरे साथ परिश्रम किया। ऐसे समाज में जहाँ स्त्रियों का नाम सार्वजनिक पत्र में आना असामान्य था, पौलुस उन्हें "सहकर्मी" वाली श्रेणी में रखता है, उसी शब्द के साथ जिससे वह अपने साथी प्रचारकों को पुकारता है। और फिर वह ख़ुद पीछे हट जाता है और तीसरे व्यक्ति से मदद माँगता है। यह उस आदमी की तस्वीर है जो जानता है कि कलीसिया उसकी नहीं, मसीह की है।
फिलिप्पियों 4:3 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
लूका 10 में शिष्य दुष्टात्माओं पर अधिकार पाकर लौटते हैं और यीशु उनकी खुशी की दिशा बदल देते हैं: इस पर आनन्दित मत हो कि आत्माएँ वश में हैं, बल्कि इस पर कि तुम्हारे नाम स्वर्ग में लिखे हैं। सेवा का रिकॉर्ड नहीं, दर्ज नाम, यही ठहराव है। और इसी पत्र के दूसरे अध्याय में पौलुस ने मसीह के उस मन का वर्णन किया था जिसने अपने को रिक्त कर दिया और क्रूस तक झुक गया। पद 3 उसी धर्मशास्त्र का ज़मीनी रूप है: जो मन क्रूस तक झुका, वही मन दो बहनों के बीच झुकने का सामर्थ्य देता है। एकता कोई अलग विषय नहीं, वह मसीह के दीन होने की नकल है।
फिलिप्पियों 4:3 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
जिस व्यक्ति से आपका मतभेद है, क्या आप उसका परिचय दूसरों के सामने वैसे दे सकते हैं जैसे पौलुस ने दिया, यानी उसकी सबसे बड़ी खूबी बताकर?
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Philippians 4 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

धन्यवाद संपादकीय पर पद 14

पिता, धन्यवाद उन लोगों के लिए जो मेरे क्लेश में मेरे सहभागी हुए। जिन्होंने चुपचाप मेरा बोझ उठाया, मेरे लिए प्रार्थना की और ज़रूरत के समय हाथ बढ़ाया। उनका भला करना मेरे लिए आपका ही प्रेम था। उन्हें आशीष दीजिए।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 7

पौलुस यह बात जेल से लिखता है, जहाँ पहरेदार उसके दरवाज़े पर खड़े थे। और वही चित्र वह उठाता है, "परमेश्वर की शान्ति, जो सारी समझ से परे है, तुम्हारे हृदय और तुम्हारे विचारों को मसीह यीशु में सुरक्षित रखेगी।" ध्यान दे, शान्ति हालात नहीं बदलती, वह तेरे मन पर पहरा देती है। डर अंदर आने की कोशिश करता रहेगा, पर उसे भीतर घुसने नहीं दिया जाएगा। आज तू किस चिंता को प्रार्थना में सौंपेगा?

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 9

पौलुस सिर्फ यह नहीं कहता कि मेरी बातें सुनो। वह कहता है, "जो बातें तुमने मुझसे सीखीं, और ग्रहण कीं, और सुनीं, और मुझमें देखीं, उन्हीं का पालन किया करो।" उसने अपना जीवन खुला रख दिया था। क्या कोई तुम्हें देखकर मसीह को सीख सकता है? और ध्यान दो, पहले शान्ति हृदय की रखवाली करती है, पर यहाँ शान्ति का परमेश्वर स्वयं साथ चलता है। जब तुम मानने लगते हो, तब वह पास आ जाता है।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 15

हे फिलिप्पियों, तुम आप भी जानते हो कि सुसमाचार प्रचार के आरम्भ में... तुम्हें छोड़ और किसी कलीसिया ने लेने-देने के विषय में मेरी सहभागिता न की।" पौलुस को वह शुरुआती दिन याद है, जब वह जाना-पहचाना नाम नहीं था और देने में कोई फायदा नहीं दिखता था। तब फिलिप्पी ने हाथ बढ़ाया। सोचो, क्या तुम किसी का साथ तब देते हो जब उसका काम अभी छोटा और अनजाना है?

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