भजन संहिता 102:22
पाठ
खंडहरों के बीच बैठा वह आदमी अचानक ऊपर देखता है, और उसकी आँखों में एक ऐसा दृश्य उतरता है जो अभी कहीं नहीं है: सिय्योन की टूटी दीवारों पर धूल जमी है, पर उन्हीं फाटकों से भीड़ भीतर आ रही है, और वह भीड़ केवल इस्राएल की नहीं है। पद 22 उस दृश्य का शिखर है। कवि कहता है कि यरूशलेम में यहोवा की स्तुति तब गूँजेगी, "जब देश-देश, और राज्य-राज्य के लोग यहोवा की उपासना करने को इकट्ठे होंगे।" यानी जो प्रार्थना एक अकेले, टूटे, अनिद्रा से जूझते आदमी की कराह से शुरू हुई थी, वह यहाँ राष्ट्रों की सामूहिक आराधना में जा मिलती है। एक आदमी की आह से पूरी पृथ्वी का गीत।
मर्म
यह पद परमेश्वर के बारे में एक ऐसी बात कहता है जिसे हम अक्सर छोटा कर देते हैं: उनका उत्तर हमारी प्रार्थना से बड़ा होता है। कवि ने केवल इतना माँगा था कि परमेश्वर अपना मुख न छिपाएँ, कि उसकी जलती हड्डियों को राहत मिले। पर जो उत्तर उसे दिखाया जाता है वह उसकी निजी चंगाई नहीं, बल्कि पूरी पृथ्वी का इकट्ठा होना है। परमेश्वर बंदियों का कराहना सुनते हैं (पद 20), और उस सुनने का अंतिम फल यह है कि राज्य-राज्य के लोग उनके सामने झुकते हैं। यहाँ उद्धार का ढाँचा साफ दिखता है: करुणा नीचे से शुरू होती है, सबसे लाचार से, और ऊपर उठते-उठते राष्ट्रों तक फैल जाती है। परमेश्वर की महिमा और टूटे हुए लोगों की सुनवाई दो अलग विषय नहीं, एक ही कहानी के दो सिरे हैं। इसीलिए आपकी छोटी, शर्मिंदा प्रार्थना किसी बहुत बड़ी चीज़ का हिस्सा है, भले ही आज वह ऐसी न लगे।
जोड़ने वाला सूत्र
ध्यान दीजिए कि यह पद क्या माँग रहा है: राष्ट्रों को इकट्ठा करने के लिए किसी को यरूशलेम को फिर से खड़ा करना होगा, और उससे भी बड़ी बात, बाहरवालों को भीतर आने का अधिकार देना होगा। पुराने नियम का मंदिर ऐसा नहीं था; वहाँ दीवारें थीं, आँगन थे, और गैर-यहूदियों के लिए एक सीमा-रेखा। पद 22 उस रेखा को मिटा देता है, पर बताता नहीं कि कैसे। इब्रानियों की पुस्तक इसी भजन के अंतिम पदों को (वह अटल परमेश्वर जिसके वर्षों का अन्त नहीं) सीधे पुत्र पर लागू करती है। यानी नए नियम के लेखक ने इस कवि की पुकार का उत्तर एक व्यक्ति में देखा: वही जो स्वयं टूटा, जिसकी हड्डियाँ जलीं, और जिसके द्वारा दूर के लोग पास लाए गए। सिय्योन की भीड़ मसीह के चारों ओर की भीड़ है।
दर्पण
हम में से ज़्यादातर लोग अपनी प्रार्थनाओं से थोड़ा शर्मिंदा रहते हैं। बच्चे के परीक्षा-परिणाम, दफ़्तर के उस आदमी का व्यवहार, पीठ का वह दर्द जो तीन महीने से नहीं जा रहा, बैंक का बैलेंस जो महीने के बीसवें दिन डराने लगता है। हम सोचते हैं, इतनी छोटी बातों के लिए परमेश्वर को परेशान करना ठीक नहीं। यह भजन उस शर्म को उलट देता है। कवि की कराह छोटी थी, निजी थी, अनिद्रा और तानों से भरी थी, और वही कराह राष्ट्रों की आराधना तक जा पहुँची। आपकी प्रार्थना छोटी है, पर वह अकेली नहीं है; वह एक बहुत बड़ी नदी की एक धारा है।
आज ही यह कीजिए: एक काग़ज़ पर अपनी सबसे छोटी, सबसे शर्मिंदा करनेवाली प्रार्थना एक वाक्य में लिखिए, और ठीक उसके नीचे किसी एक देश का नाम लिखिए जहाँ आज लोग कष्ट में हैं। फिर दोनों वाक्यों को ज़ोर से बोलकर प्रार्थना कीजिए, एक ही साँस में।
संदर्भ
यह भजन उस समय की गंध लिए हुए है जब यरूशलेम मलबा था। पद 14 में परमेश्वर के दास शहर के "पत्थरों को चाहते हैं" और "खंडहरों की धूल पर तरस" खाते हैं, यह किसी सुरक्षित नगर के निवासी की भाषा नहीं है। यह बंधुआई का, या बंधुआई से लौटे उस छोटे, कमज़ोर समुदाय का स्वर है जिसके पास न सेना थी, न राजा, न प्रतिष्ठा। उनके चारों ओर के साम्राज्य विशाल थे, और वे स्वयं एक भूली हुई प्रांत-कथा। ऐसे में "राज्य-राज्य के लोग" यहोवा की उपासना के लिए इकट्ठे होंगे, यह कहना राजनीतिक रूप से हास्यास्पद था। जिनके पास शक्ति है वे झुकेंगे, और जिनके पास कुछ नहीं है वे साक्षी होंगे।
एक बारीकी
"उपासना करने को" के पीछे इब्रानी शब्द है आवाद, जिसका अर्थ सेवा करना भी है और दासता भी। यही शब्द उस मेहनत के लिए इस्तेमाल होता है जो मिस्र में इस्राएल से करवाई गई थी, और यही शब्द भजन के अंतिम पद में लौटता है: "तेरे दासों की सन्तान बनी रहेगी।" यानी पद 22 में जो राष्ट्र आते हैं, वे केवल दर्शक बनकर नहीं आते; वे सेवा में लग जाते हैं, वे दास बन जाते हैं। और यह ठीक वही श्रेणी है जिसमें कवि पहले से खड़ा है। साम्राज्यों के लोग उसकी पंक्ति में आकर खड़े होते हैं, ऊपर नहीं। जिस दिन राजा घुटने टेकते हैं, उस दिन खंडहर पर बैठा आदमी अजनबी नहीं रहता।
मुख्य पात्र
इस पद के पीछे जो परमेश्वर खड़े हैं, वे पद 19 में ऊँचे पवित्रस्थान से नीचे देखते हैं, और जो चीज़ उनका ध्यान खींचती है वह किसी राजा का जुलूस नहीं, "बन्दियों का कराहना" है। यह उनके स्वभाव का सबसे विचित्र और सबसे भरोसेमंद हिस्सा है: वे ऊँचाई से देखते हैं, पर सबसे नीचे की आवाज़ पर रुकते हैं। पद 17 कहता है कि वे लाचार की प्रार्थना को तुच्छ नहीं जानते। यह कोई भावुक कोमलता नहीं है; इसी सुनने में से इतिहास का रुख बदलता है, इसी से राष्ट्र इकट्ठे होते हैं। परमेश्वर की महिमा उनकी करुणा से टकराती नहीं, उसी से बहती है।
अंतर्पाठ
यशायाह 56 में परमेश्वर परदेशियों से वादा करते हैं कि उनका भवन सब जातियों के लिए प्रार्थना का घर कहलाएगा, और वहाँ भी शर्त वही है, सेवा और नाम से प्रेम। भजन 102 का यह पद उसी वादे का काव्यात्मक चित्र है। और सदियों बाद यीशु मंदिर के उसी बाहरी आँगन में मेज़ें उलट देते हैं, ठीक उस जगह जहाँ गैर-यहूदी प्रार्थना करने आते थे, और यशायाह के वही शब्द दोहराते हैं। यह संयोग नहीं है। जिस दिन धर्म का व्यापार बाहरवालों की जगह घेर लेता है, उस दिन पद 22 का दृश्य टलता है। यीशु का क्रोध इसी भजन के सपने की रक्षा में उठा हुआ क्रोध था।
पहले सुननेवाले
कल्पना कीजिए कि यह भजन उस समुदाय में पढ़ा जा रहा है जिसके दादा-दादी को ज़ंजीरों में ले जाया गया था, और जो अब आधी बनी दीवारों के बीच रहता है। पड़ोसी उन्हें ताना मारते हैं, ठीक जैसे पद 8 में शत्रु कवि का नाम श्राप की तरह इस्तेमाल करते हैं। उनके कानों में पद 22 दो चीज़ें एक साथ करता है: यह उनकी वर्तमान बेइज़्ज़ती को स्वीकार करता है, और साथ ही उनसे कहता है कि यह अंतिम दृश्य नहीं है। वे यह भी सुनते हैं कि पद 18 के अनुसार यह बात "आनेवाली पीढ़ी के लिये लिखी जाएगी।" यानी उन्हें बताया जा रहा है कि शायद वे स्वयं यह दिन न देखें, पर लिखना फिर भी ज़रूरी है।
कठिन प्रश्न
अगर हम ईमानदार हैं तो सवाल यह है: ढाई हज़ार साल बाद भी राष्ट्र इकट्ठे नहीं हुए। यरूशलेम आज भी विवाद का शहर है, और उपासना से ज़्यादा वहाँ बारूद की चर्चा होती है। तो क्या यह पद पूरा हुआ? भजन स्वयं कोई सस्ता उत्तर नहीं देता, क्योंकि इस भव्य दृश्य के तुरंत बाद पद 23 में कवि फिर अपनी घटती ताक़त और आधी उम्र की शिकायत पर लौट आता है। दर्शन उसे उसके दुख से बाहर नहीं निकालता; वह दर्शन के साथ दुख में लौटता है। शायद यही ईमानदार विश्वास का आकार है: वादा देख लेना, और फिर उसी टूटे शरीर के साथ जीना, यह जानते हुए कि जो समय ठहराया गया है वह हमारे कैलेंडर पर नहीं, उनके पर लिखा है।
चिंतन के प्रश्न
आपकी प्रार्थनाओं में कितनी जगह आपके अपने घर की चारदीवारी से बाहर के लोगों के लिए है, और यह अनुपात आपके परमेश्वर-चित्र के बारे में क्या कहता है?
पद 18 कहता है कि यह बात आनेवाली पीढ़ी के लिए लिखी जाएगी। आप किस बात के साक्षी बन रहे हैं जिसका फल शायद आप स्वयं न देखें?
आपकी मंडली में वह "बाहर का आँगन" कहाँ है, वह जगह जहाँ अजनबी आकर खड़ा हो सकता है, और क्या वहाँ अब भी जगह बची है?
Psalms में और गहराई से जानें
चुनी हुई पुस्तकें जो इस बाइबल पुस्तक को और गहराई से समझाती हैं।
A year of daily devotions through every psalm, ideal alongside your reading.
The second half of the psalter with the same loved precision.
Lewis thinking out loud about praise, cursing psalms and joy.
Explains what it meant then, and bridges it honestly to life now.
Faith.network earns a small commission on Kobo purchases made through these links, at no extra cost to you. It helps keep the studies free.
Psalms 102:22 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
भजन संहिता 102:22 का क्या अर्थ है?
भजन संहिता 102:22 किस विषय में है?
भजन संहिता 102:22 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
भजन संहिता 102:22 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
भजन संहिता 102:22 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Psalms 102 में आपको क्या स्पर्श करता है?
इस अंश पर अभी तक कोई अंतर्दृष्टि साझा नहीं की गई है। पहले बनें और कुछ छोड़ें: एक अंतर्दृष्टि, प्रार्थना या धन्यवाद।
इस अंश को किसी और स्तर पर देखें
शुरुआती, धर्मशास्त्री, या कोई अलग लंबाई? सेटिंग्स बदलें और अपना संस्करण बनाएँ।
अध्ययन टूल में खोलें