भजन संहिता 102:12
पाठ
छत पर बैठा वह आदमी रात भर जागता रहा है। नीचे शहर सो गया, ऊपर वह अकेला, "गौरे के समान" जो छत पर अकेला बैठता है। उसकी रोटी राख है, उसका पानी आँसुओं से खारा, उसकी हड्डियाँ भीतर से जल रही हैं, और उसके दिन धुएँ की तरह उड़ रहे हैं। फिर, ठीक बारहवें पद पर, वाक्य अचानक मुड़ जाता है। एक ही शब्द से: "परन्तु।" वह अपनी सूखती हुई घास-सी ज़िन्दगी से नज़र उठाकर कहता है, "परन्तु हे यहोवा, तू सदैव विराजमान रहेगा; और जिस नाम से तेरा स्मरण होता है, वह पीढ़ी से पीढ़ी तक बना रहेगा।" वह अपने बारे में कुछ नहीं बदलता। वह सिर्फ़ यह कहता है कि परमेश्वर बदलते नहीं, उनका सिंहासन खाली नहीं होता, और उनका नाम एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक जीवित रहता है।
मूल बात
ध्यान दीजिए, यह पद दुःख का उत्तर नहीं देता, वह दुःख के बग़ल में एक दूसरा सच रख देता है। प्रार्थना करनेवाला यह नहीं कहता कि मेरी हड्डियाँ ठीक हो जाएँगी या मेरे शत्रु चुप हो जाएँगे। वह कहता है: मैं ढलती छाया हूँ, आप सिंहासन पर विराजमान हैं। यही बाइबल की आस्था की रीढ़ है। हमारी सुरक्षा इस बात में नहीं कि हमारा जीवन टिकाऊ है, बल्कि इसमें कि परमेश्वर टिकाऊ हैं। और वह "नाम" कोई शब्द भर नहीं; इब्रानी में नाम का अर्थ है प्रकट किया हुआ चरित्र, वह पहचान जिसके सहारे आप किसी को पुकार सकते हैं। यहोवा का नाम पीढ़ी से पीढ़ी तक बना रहता है, इसका मतलब यह है कि जो परमेश्वर मिस्र में सुनते थे, वही आज इस छत पर सुनते हैं। इसलिए यह पद केवल परमेश्वर की अनंतता की घोषणा नहीं, बल्कि एक टूटे हुए आदमी का दावा है कि उसकी छोटी-सी, धुएँ जैसी उम्र किसी ऐसे में लंगर डाले हुए है जो कभी नहीं मिटता।
सूत्र
बाइबल की बड़ी कहानी में यह पद एक कील की तरह गड़ा हुआ है, और नए नियम ने उस कील को पकड़कर लटका दिया है। इब्रानियों की पत्री इसी भजन के अंत को, "आदि में तूने पृथ्वी की नींव डाली… परन्तु तू वहीं है, और तेरे वर्षों का अन्त न होगा", सीधे पुत्र पर लागू करती है। यानी जिस अटल सिंहासन की ओर यह पीड़ित आदमी आँख उठा रहा था, कलीसिया ने उसमें मसीह का चेहरा पहचाना। और यह जोड़ बेतुका नहीं है। क्योंकि यही मसीह वह हैं जो स्वयं छत पर बैठे उस अकेले पक्षी बन गए, जिनका मुँह लोगों ने ठट्ठे में भरा, जिनके दिन धुएँ की तरह छोटे कर दिए गए। भजनकार दुःख और अनंतता को दो अलग खंभों की तरह खड़ा करता है; क्रूस पर वे दोनों एक ही व्यक्ति में मिल जाते हैं।
दर्पण
आप जानते हैं यह पद कब सबसे कठिन लगता है? जब आपकी रिपोर्ट में वह शब्द लिखा हो जिसे पढ़ते ही कमरा ठंडा हो जाता है। जब नौकरी जाने के बाद आप सुबह चार बजे छत पर नहीं, पर मोबाइल की रोशनी में जागते हैं और बैंक का बैलेंस बार-बार देखते हैं। जब कोई रिश्ता ऐसा टूटा हो कि आपका नाम दूसरों के मुँह में मज़ाक बन गया हो। ऐसे में "तू सदैव विराजमान रहेगा" पहली बार में ठंडा लग सकता है, लगभग निर्मम: मेरा क्या, प्रभु? पर गौर कीजिए, भजनकार यह पद अपने दुःख को छोटा करने के लिए नहीं कहता। वह अपनी छोटी उम्र को स्वीकार करता है और फिर भी बड़े सिंहासन को नमस्कार करता है। यही परिपक्व विश्वास है: अपनी हालत को झुठलाए बिना परमेश्वर की स्थिरता को मान लेना।
संदर्भ
यह भजन किसी व्यक्ति की निजी बीमारी की डायरी लगता है, पर तेरहवें पद से पता चलता है कि पीछे एक राष्ट्र का मलबा पड़ा है: "तेरे दास उसके पत्थरों को चाहते हैं, और उसके खंडहरों की धूल पर तरस खाते हैं।" यरूशलेम गिर चुका है, मंदिर जल चुका है, लोग बाबुल में हैं या उजड़े शहर के आसपास बचे-खुचे जी रहे हैं। उस दुनिया में देवता और उसके शहर का भाग्य एक साथ जुड़ा माना जाता था; शहर गिरा, मतलब देवता हार गया। पड़ोसी जातियाँ यही ताना मारती थीं। इसीलिए आठवें पद के शत्रु सिर्फ़ व्यक्तिगत दुश्मन नहीं, वे वे आवाज़ें हैं जो कहती हैं कि यहोवा का नाम अब बेकार हो गया। और ठीक इसी शोर के बीच यह आदमी कहता है कि नहीं, वह नाम पीढ़ी से पीढ़ी तक बना रहेगा।
एक बारीकी
"विराजमान रहेगा" के पीछे इब्रानी क्रिया है याशव, जिसका सीधा अर्थ है बैठना, टिककर रहना, बसा हुआ होना। यही शब्द किसी के अपने घर में बस जाने के लिए भी चलता है और राजा के सिंहासन पर बैठने के लिए भी। अब इस चित्र की चुभन देखिए: चारों ओर सब कुछ उजड़ चुका है, पत्थर बिखरे हैं, लोग बेघर हैं, प्रार्थना करनेवाला रात भर करवटें बदलता है, कहीं कोई ठहराव नहीं। और वह कहता है, आप बैठे हुए हैं। परमेश्वर भागदौड़ में नहीं हैं, घबराए हुए नहीं हैं, अपना पद छोड़कर कहीं गए नहीं हैं। जहाँ भजनकार की चमड़ी हड्डियों से सट गई है, वहाँ परमेश्वर आराम से, अटल, बैठे हुए हैं। यह आलस्य नहीं, अधिकार है।
मुख्य पात्र
इस पद का असली मुख्य पात्र वही है जिसका नाम पुकारा गया: यहोवा। और भजनकार उनके बारे में जो कहता है, वह चुनाव है, अनुभूति नहीं। उसकी अनुभूति दसवें पद में दर्ज है: "तूने मुझे उठाया, और फिर फेंक दिया है।" वह परमेश्वर को दोषी ठहराने से नहीं हिचकता। फिर भी वह उन्हीं परमेश्वर के आगे घुटने टेकता है जिनके क्रोध का उसने अभी नाम लिया। यह विश्वास का सबसे ईमानदार रूप है: शिकायत और आराधना एक ही साँस में। और सत्रहवाँ पद बताता है कि यह सिंहासन कैसा है, "वह लाचार की प्रार्थना की ओर मुँह करता है, और उनकी प्रार्थना को तुच्छ नहीं जानता।" अनंत परमेश्वर दूर के सम्राट नहीं; उनकी अनंतता का एक चेहरा है जो झुककर सुनता है।
अंतर्पाठ
पहले पद से दो कदम पीछे हटिए और भजन 90 सुनिए, जहाँ मूसा भी मनुष्य की उम्र को घास कहता है और परमेश्वर के वर्षों को अनंत। पर वहाँ यह तुलना डराती है; यहाँ वही तुलना सांत्वना देती है। फ़र्क क्या है? यहाँ नाम पुकारा जाता है, और नाम का मतलब रिश्ता है। दूसरा गूँजता हुआ पन्ना निर्गमन 3 है, जहाँ परमेश्वर अपना नाम प्रकट करते हैं और कहते हैं कि यही उनका स्मरण-नाम पीढ़ी-पीढ़ी रहेगा। भजनकार शायद जान-बूझकर उसी वचन को उठा रहा है: वह परमेश्वर जिसने गुलामों की कराह सुनी थी, अब भी वही हैं। बीसवाँ पद इसी बात को दोहराता है, "ताकि बन्दियों का कराहना सुने।" जो नाम मिस्र में काम आया, वही बाबुल में भी काम आएगा।
श्रोता-चित्र
कल्पना कीजिए यह भजन पहली बार किन कानों तक पहुँचा। उजड़े यरूशलेम के आसपास इकट्ठे कुछ लोग, या परदेस में किसी घर में जुटा एक छोटा समूह। उनके पास न मंदिर था, न राजा, न सेना, न वह सब जो पहचान बनाता है। उनके बच्चे बाबुल की भाषा बोल रहे थे। उनके लिए "पीढ़ी से पीढ़ी तक" कोई काव्यात्मक अलंकार नहीं था, वह एक जोखिम भरा दावा था: क्या हमारे बाद भी कोई बचेगा जो इस नाम को जानेगा? भजन का अंत उसी चिंता को उत्तर देता है, "तेरे दासों की सन्तान बनी रहेगी।" हम यह पद अक्सर व्यक्तिगत ढाढ़स की तरह पढ़ते हैं; उन्होंने इसे अपने अस्तित्व के सवाल का उत्तर सुना।
कठिन प्रश्न
पर एक बात खटकती रहती है। परमेश्वर का सदा बने रहना मेरी जलती हड्डियों के लिए क्या करता है? अगर वे सिंहासन पर हैं और मैं धुआँ हूँ, तो यह अंतर मुझे सांत्वना देता है या और अकेला कर देता है? भजन इसका आसान उत्तर नहीं देता। तेईसवें पद में, बारहवें पद की घोषणा के बाद भी, वह फिर कराहता है कि परमेश्वर ने उसका बल घटाया। यानी विश्वास ने दर्द मिटाया नहीं। जो मिला वह यह है: उसकी छोटी ज़िन्दगी अब खाली हवा में नहीं लटकी, वह किसी अटल चीज़ से बँधी है। और मसीह में यह और आगे जाता है, क्योंकि वहाँ अनंत परमेश्वर ने खुद धुएँ जैसी उम्र पहन ली। फिर भी यह पूरी तरह हल नहीं होता, और भजनकार भी इसे हल नहीं करता। वह बस सिंहासन की ओर देखता रहता है, कराहते हुए।
चिंतन
आपके जीवन में इस समय कौन-सी बात "ढलती हुई छाया" जैसी है, और क्या आप उसे झुठलाए बिना नाम ले सकते हैं?
"परन्तु हे यहोवा" कहने के लिए भजनकार को अपनी हालत बदलनी नहीं पड़ी। आपकी प्रार्थना में वह "परन्तु" कहाँ आ सकता है?
आपके बाद की पीढ़ी आपसे परमेश्वर के नाम के बारे में क्या सुन रही है, आपके शब्दों से नहीं, आपके संकट में दिए गए जवाबों से?
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Psalms 102:12 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
भजन संहिता 102:12 का क्या अर्थ है?
भजन संहिता 102:12 किस विषय में है?
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भजन संहिता 102:12 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
भजन संहिता 102:12 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
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