बाइबल व्याख्या

भजन संहिता 129

बाइबल
यह अध्याय JL Group के सहयोग से संभव हुआ है

पाठ

इस्राएल को बोलने के लिए कहा जाता है, और वह अपने शरीर पर लिखा इतिहास पढ़ता है: बचपन से, यानी जाति के जन्म से ही, उसे बार बार क्लेश मिला, पर कोई उस पर प्रबल नहीं हुआ। फिर एक भयानक चित्र: "हलवाहों ने मेरी पीठ के ऊपर हल चलाया, और लम्बी-लम्बी रेखाएँ की।" इसके बाद मोड़ आता है, यहोवा धर्मी है, उसने दुष्टों के फंदों को काट डाला। और अंत में एक प्रार्थना जो शाप जैसी लगती है: सिय्योन के बैरी छत की घास की तरह हों, जिसकी कोई फसल नहीं, जिस पर कोई आशीष नहीं बोली जाती।

मूल बात

इस भजन का केंद्र यह दावा नहीं है कि परमेश्वर के लोग सुरक्षित रहे, बल्कि यह कि वे जीवित रहे। "परन्तु मुझ पर प्रबल नहीं हुए" एक विजय-गीत नहीं, बचे रहने का साँस भरता कबूलनामा है। पीठ पर हल चलने का अर्थ है खुली पीठ, जमीन की तरह चीरी हुई देह; यह गुलामी, बंधुआई और अपमान की स्मृति है। और ठीक यहीं भजनकार कहता है, "यहोवा धर्मी है।" यह धार्मिकता कोई दार्शनिक गुण नहीं, एक क्रिया है: उसने जुए की रस्सियाँ, बंधन के फंदे काट डाले। परमेश्वर की धार्मिकता का प्रमाण यह नहीं कि उसके लोग कभी घायल नहीं हुए, बल्कि यह कि घाव का अंतिम शब्द नहीं होता।

मुख्य सूत्र

तीसरा पद अकेला नहीं खड़ा। यशायाह 50 में परमेश्वर का दास कहता है कि उसने अपनी पीठ मारनेवालों को सौंप दी, और मुँह नहीं फेरा। वही चीरी हुई पीठ जो यहाँ पूरी जाति का चिह्न है, वहाँ एक व्यक्ति की देह पर सिमट आती है। सुसमाचारों में रोमी कोड़े की वही रेखाएँ मसीह की पीठ पर खींची जाती हैं, और वह उन्हें ओढ़ लेता है। यह जबरन खींची गई समानता नहीं; यह उसी सूत्र का अगला धागा है। इस्राएल कहता है, उन्होंने जोता पर मुझे खत्म न कर सके। मसीह आगे जाता है: उन्होंने जोता, और उस जोती गई मिट्टी से पुनरुत्थान की फसल उगी। जहाँ भजन केवल बचे रहने की गवाही देता है, वहाँ क्रूस फलदायी होने की।

दर्पण

कुछ घाव ठीक नहीं होते, वे निशान बन जाते हैं। वह रिश्तेदार जिसने आपके बचपन को काला किया, वह नौकरी जहाँ आपको वर्षों छोटा दिखाया गया, वह बीमारी जिसने शरीर पर लकीरें छोड़ दीं। यह भजन आपको यह नहीं कहता कि लकीरें भूल जाओ या उन्हें सुंदर बना लो। वह उन्हें गिनता है, नाम देता है, और फिर भी परमेश्वर को धर्मी कहता है। खतरा दो तरफ है: या तो हम अपनी कहानी को शिकायत बना लेते हैं, या उसे इतनी जल्दी ढक देते हैं कि कृतज्ञता झूठी हो जाए। भजन तीसरा रास्ता देता है, पूरा सच बोलो और फिर परमेश्वर की ओर मुड़ो।

आज एक कागज पर अपने जीवन के उस सबसे पुराने घाव का एक वाक्य लिखिए, और उसके नीचे यही शब्द लिखिए: "परन्तु मुझ पर प्रबल नहीं हुए।" फिर उसे ऊँचे स्वर में पढ़िए।

मुख्य पात्र

यहाँ मुख्य पात्र "इस्राएल" है, पर वह एक अकेला गवाह बनकर बोलता है, जैसे अदालत में खड़ा कोई बूढ़ा आदमी अपनी पीठ खोलकर दिखा रहा हो। उसका भावनात्मक नक्शा मिश्रित है: थकान, गहरी स्मृति, और एक जिद्दी विश्वास। वह शत्रुओं के नाम नहीं लेता, क्योंकि नाम बदलते रहते हैं, मिस्र, अश्शूर, बाबुल; जो नहीं बदलता वह है उसका बचा रहना। ध्यान दीजिए कि वह बदला अपने हाथ में नहीं लेता। पाँचवें पद से आगे सब कुछ इच्छा के रूप में है, "वे लज्जित हों", "वे छत पर की घास के समान हों"। यह कमजोरी नहीं, अनुशासन है: क्रोध को प्रार्थना में बदल देना, तलवार में नहीं।

प्रश्न

आखिरी पद कहीं ज्यादा कठोर है जितना पहली नजर में लगता है। खेत में काम करनेवाले एक दूसरे को आशीष देते थे; रूत 2 में बोअज अपने लवनेवालों से यही कहता है, और वे उत्तर देते हैं। यानी भजनकार चाहता है कि शत्रुओं के जीवन में वह साधारण, रोजमर्रा की आशीष का आदान-प्रदान तक न बचे। कोई न कहे, "यहोवा की आशीष तुम पर होवे।" और यीशु कहता है, अपने बैरियों को आशीष दो। इस तनाव को मैं सुलझा नहीं सकता, और सस्ता समाधान देना बेईमानी होगी। इतना कहूँगा: भजन उस आदमी की प्रार्थना है जिसकी पीठ अभी भी जल रही है, और परमेश्वर ऐसी प्रार्थनाओं को अपनी पुस्तक में जगह देते हैं, बजाय इसके कि वे दिल में जहर बनकर सड़ें।

संदर्भ

यह "यात्रा का गीत" है, यरूशलेम की ओर चढ़ते तीर्थयात्रियों का भजन, संभवतः बंधुआई से लौटने के बाद के समय का, जब मंदिर खड़ा तो था पर जाति छोटी, गरीब और पड़ोसियों के दबाव में थी। उस दुनिया में खेती और युद्ध की भाषा एक थी: हल, फसल, पूलियाँ, और पीठ पर कोड़े। फिलिस्तीनी घरों की छतें मिट्टी की होती थीं, वर्षा के बाद उन पर घास उग आती थी, जो कुछ ही दिनों में धूप में सूख जाती थी, न जड़, न फसल, न लवनेवाला। यह चित्र हर सुननेवाले ने अपनी आँखों से देखा था। एक छोटी जाति ऊपर चढ़ते हुए गा रही है कि साम्राज्य छत की घास हैं, और वह अब भी जीवित है।

चिंतन

आपके जीवन की कौन सी "लम्बी-लम्बी रेखाएँ" हैं जिन्हें आपने अब तक परमेश्वर के सामने नाम देकर नहीं रखा?

जब आप किसी के विरुद्ध कड़वाहट से भरे हों, तो क्या आप उसे प्रार्थना में परमेश्वर के हाथ सौंप पाते हैं, या अपने हाथों में रखना पसंद करते हैं?

Psalms में और गहराई से जानें

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The Songs of Jesus

Timothy Keller

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Psalms 1-72

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Kidner's crisp notes have helped generations pray the psalms.

Psalms 73-150

Derek Kidner

The second half of the psalter with the same loved precision.

Reflections on the Psalms

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Psalms Volume 1

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Psalms 129 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

भजन संहिता 129 का क्या अर्थ है?
इस्राएल को बोलने के लिए कहा जाता है, और वह अपने शरीर पर लिखा इतिहास पढ़ता है: बचपन से, यानी जाति के जन्म से ही, उसे बार बार क्लेश मिला, पर कोई उस पर प्रबल नहीं हुआ। फिर एक भयानक चित्र: "हलवाहों ने मेरी पीठ के ऊपर हल चलाया, और लम्बी-लम्बी रेखाएँ की।" इसके बाद मोड़ आता है, यहोवा धर्मी है, उसने दुष्टों के फंदों को काट डाला। और अंत में एक प्रार्थना जो शाप जैसी लगती है: सिय्योन के बैरी छत की घास की तरह हों, जिसकी कोई फसल नहीं, जिस पर कोई आशीष नहीं बोली जाती।
भजन संहिता 129 किस विषय में है?
तीसरा पद अकेला नहीं खड़ा। यशायाह 50 में परमेश्वर का दास कहता है कि उसने अपनी पीठ मारनेवालों को सौंप दी, और मुँह नहीं फेरा। वही चीरी हुई पीठ जो यहाँ पूरी जाति का चिह्न है, वहाँ एक व्यक्ति की देह पर सिमट आती है। सुसमाचारों में रोमी कोड़े की वही रेखाएँ मसीह की पीठ पर खींची जाती हैं, और वह उन्हें ओढ़ लेता है। यह जबरन खींची गई समानता नहीं; यह उसी सूत्र का अगला धागा है। इस्राएल कहता है, उन्होंने जोता पर मुझे खत्म न कर सके। मसीह आगे जाता है: उन्होंने जोता, और उस जोती गई मिट्टी से पुनरुत्थान की फसल उगी। जहाँ भजन केवल बचे रहने की गवाही देता है, वहाँ क्रूस फलदायी होने की।
भजन संहिता 129 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
आज एक कागज पर अपने जीवन के उस सबसे पुराने घाव का एक वाक्य लिखिए, और उसके नीचे यही शब्द लिखिए: "परन्तु मुझ पर प्रबल नहीं हुए।" फिर उसे ऊँचे स्वर में पढ़िए।
भजन संहिता 129 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
आखिरी पद कहीं ज्यादा कठोर है जितना पहली नजर में लगता है। खेत में काम करनेवाले एक दूसरे को आशीष देते थे; रूत 2 में बोअज अपने लवनेवालों से यही कहता है, और वे उत्तर देते हैं। यानी भजनकार चाहता है कि शत्रुओं के जीवन में वह साधारण, रोजमर्रा की आशीष का आदान-प्रदान तक न बचे। कोई न कहे, "यहोवा की आशीष तुम पर होवे।" और यीशु कहता है, अपने बैरियों को आशीष दो। इस तनाव को मैं सुलझा नहीं सकता, और सस्ता समाधान देना बेईमानी होगी। इतना कहूँगा: भजन उस आदमी की प्रार्थना है जिसकी पीठ अभी भी जल रही है, और परमेश्वर ऐसी प्रार्थनाओं को अपनी पुस्तक में जगह देते हैं, बजाय इसके कि वे दिल में जहर बनकर सड़ें।
भजन संहिता 129 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
आपके जीवन की कौन सी "लम्बी-लम्बी रेखाएँ" हैं जिन्हें आपने अब तक परमेश्वर के सामने नाम देकर नहीं रखा?

Psalms 129 में आपको क्या स्पर्श करता है?

इस अंश पर अभी तक कोई अंतर्दृष्टि साझा नहीं की गई है। पहले बनें और कुछ छोड़ें: एक अंतर्दृष्टि, प्रार्थना या धन्यवाद।

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