भजन संहिता 13
पाठ
चार बार एक ही चोट: "कब तक?" दाऊद परमेश्वर पर यह प्रश्न ऐसे फेंकता है जैसे कोई बन्द दरवाज़े पर मुट्ठी मारता हो, "क्या सदैव मुझे भूला रहेगा? तू कब तक अपना मुखड़ा मुझसे छिपाए रखेगा?" उसके भीतर दिन भर योजनाएँ घूमती हैं, हृदय में दुःख बैठा है, और शत्रु सिर पर खड़ा है। फिर वह तीन छोटी प्रार्थनाएँ करता है: ध्यान दे, उत्तर दे, मेरी आँखों में ज्योति आने दे, नहीं तो मृत्यु की नींद आ जाएगी। और तब, बिना किसी दिखाई देने वाले उत्तर के, भजन अचानक मुड़ जाता है: "परन्तु मैंने तो तेरी करुणा पर भरोसा रखा है।" छह पद, और उनमें शिकायत से गीत तक की पूरी यात्रा।
मर्म
यह भजन हमें सिखाता है कि विश्वास और शिकायत एक-दूसरे के शत्रु नहीं हैं। दाऊद परमेश्वर से दूर जाकर नहीं रोता, वह परमेश्वर के सामने खड़ा होकर रोता है, और यही अन्तर सब कुछ बदल देता है। "मुखड़ा छिपाना" इस्राएल की भाषा में परमेश्वर की अनुपस्थिति का सबसे गहरा शब्द है, क्योंकि आशीष का सार ही यह था कि परमेश्वर अपना मुख चमकाए। दाऊद को लगता है वह आशीष उससे छीन ली गई है। फिर भी वह उसी परमेश्वर को "हे मेरे परमेश्वर यहोवा" कहकर पुकारता है, वाचा के नाम से। यही धर्मशास्त्र का हृदय है: अनुभव कुछ कहता है, वाचा कुछ और, और विश्वास वाचा को अनुभव से ऊपर रखना सीखता है। करुणा, इब्रानी में हेसेद, अर्थात वह वफ़ादार प्रेम जो वादा करके मुकरता नहीं, वही वह चट्टान है जिस पर पद 5 खड़ा होता है।
सूत्र
परन्तु इस भजन का सबसे गहरा स्वर तब सुनाई देता है जब हम ध्यान दें कि परमेश्वर का मुख वास्तव में किससे छिपा था। दाऊद को लगा कि वह त्याग दिया गया है; उसका पुत्र, यीशु मसीह, वास्तव में त्यागा गया। क्रूस पर जो शब्द निकले, "हे मेरे परमेश्वर, तूने मुझे क्यों छोड़ दिया", वे इसी घराने के भजनों से आते हैं। दाऊद कहता है "नहीं तो मुझे मृत्यु की नींद आ जाएगी", और वह बच जाता है; मसीह उस नींद में उतर जाते हैं, ताकि हमारा "कब तक" एक दिन समाप्त हो सके। और पद 4 का शत्रु जो कहना चाहता था "मैं उस पर प्रबल हो गया", वही पुनरुत्थान की सुबह चुप करा दिया गया। इसलिए दाऊद का "तेरे उद्धार से मगन होगा" केवल एक भावना नहीं, एक भविष्यवाणी है।
दर्पण
दाऊद की सबसे थकाने वाली पीड़ा शत्रु नहीं, बल्कि उसका अपना मन है: "मैं कब तक अपने मन ही मन में युक्तियाँ करता रहूँ।" यह वह रात है जब आप छत को घूरते हुए बीमारी की रिपोर्ट, बैंक का सन्देश, या किसी सहकर्मी की बात को बार-बार उलटते-पलटते हैं, हर बार एक नई योजना बनाते हैं, और सुबह और अधिक थके हुए उठते हैं। भजन इस थकावट को पाप कहकर नहीं डाँटता; वह उसे प्रार्थना में बदल देता है। ध्यान दीजिए, दाऊद परिस्थिति बदलने से पहले गाना शुरू कर देता है। यह झूठा सकारात्मक सोच नहीं, यह स्मृति है: "उसने मेरी भलाई की है।"
आज, दस मिनट निकालिए और काग़ज़ पर वह एक प्रश्न लिखिए जिस पर आपका मन रात को घूमता है, उसके नीचे लिखिए "परन्तु मैंने तो तेरी करुणा पर भरोसा रखा है", और उस काग़ज़ को ज़ोर से पढ़कर परमेश्वर के सामने रख दीजिए।
अन्तर्पाठ
भजन 22 इसी स्वर को चरम तक ले जाता है, और वहीं से सुसमाचार क्रूस की भाषा उधार लेते हैं; इसलिए भजन 13 को पढ़ना मसीह की प्रार्थना-भाषा का व्याकरण सीखना है। दूसरी ओर, गिनती 6 की वह जानी-पहचानी आशीष, जिसमें याजक कहता था कि यहोवा अपना मुख तुझ पर चमकाए, ठीक वही है जिसकी अनुपस्थिति दाऊद को काट रही है, और जिसकी कमी वह "मेरी आँखों में ज्योति आने दे" कहकर व्यक्त करता है। इन दो संदर्भों के बीच यह भजन खड़ा है: एक ओर आशीष का वादा, दूसरी ओर उस वादे का अँधेरे में अनुभव न होना। बीच का पुल करुणा है, और उस पुल का नाम अन्ततः मसीह निकलता है।
श्रोता
पहले गाने वाले इसे मन्दिर में, समूह में गाते थे, और यही चौंकाने वाली बात है। इस्राएल ने अपनी शिकायतों को छिपाया नहीं, उन्हें गीतपुस्तक में रखा और सार्वजनिक आराधना का हिस्सा बनाया। जिस समाज में हार का अर्थ था कि तुम्हारा देवता कमज़ोर है, वहाँ "कब तक मेरा शत्रु मुझ पर प्रबल रहेगा" गाना साहस माँगता था; पड़ोसी जातियाँ यही ताना देती थीं। दाऊद जानता है कि उसकी व्यक्तिगत पराजय परमेश्वर के नाम पर दाग़ बन जाएगी, इसीलिए पद 4 में वह अपनी इज़्ज़त नहीं, परमेश्वर की प्रतिष्ठा आगे रखता है। पहले श्रोताओं के लिए यह भजन निजी डायरी नहीं, वाचा के परमेश्वर के सामने रखी गई सामूहिक पुकार थी।
मुख्य पात्र
इस भजन में दाऊद बोलता है, पर केन्द्र में परमेश्वर हैं, और उनका चित्र दो परतों में उभरता है। ऊपरी परत पर वे चुप हैं, मुख छिपाए हुए, भूले हुए से। नीचे की परत पर वे वही हैं जिनकी करुणा पर भरोसा किया जा सकता है, जिनका उद्धार आनन्द का कारण है, जिन्होंने अतीत में भलाई की है। दाऊद दूसरी परत को पहली के नीचे से खोदकर निकालता है। और परमेश्वर इस खुदाई से नाराज़ नहीं होते; वे इस प्रार्थना को अपनी पुस्तक में सुरक्षित रख लेते हैं। जो परमेश्वर अपना मुख छिपाते दिखते हैं, वही अन्ततः मसीह के मुख में प्रकट होकर कहते हैं कि यह छिपना स्थायी नहीं था, केवल अस्थायी था।
चिन्तन
आपके मन में इस समय कौन-सा "कब तक" घूम रहा है, और क्या आपने उसे कभी परमेश्वर के सामने शब्दों में कहा है, या वह केवल भीतर ही भीतर चक्कर काटता रहा?
पद 5 तक पहुँचने के लिए दाऊद को अपनी परिस्थिति नहीं, अपनी स्मृति बदलनी पड़ी। परमेश्वर ने आपके साथ जो भलाई की है, उसकी कौन-सी एक ठोस घटना आप आज याद कर सकते हैं?
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