भजन संहिता 147
पाठ
यरूशलेम के फाटकों के खम्भे फिर से मज़बूत किए जा रहे हैं, बिखरे हुए लोग लौटकर इकट्ठे हो रहे हैं, और टूटे मनवालों के घावों पर मरहम बाँधा जा रहा है। इसी परमेश्वर के हाथ में तारों की गिनती भी है, बादलों का पानी भी, पहाड़ों की घास भी, और कौवे के भूखे बच्चों की पुकार भी। भजन तीन बार स्तुति का बुलावा देता है (पद 1, 7, 12) और हर बार उसके पीछे कारण जोड़ता है: वह बसाता है, वह खिलाता है, वह अपना वचन याकूब को बताता है। अंत चौंकाने वाला है: "किसी और जाति से उसने ऐसा बर्ताव नहीं किया।"
मर्म
इस भजन की ताकत उसके जोड़ में है। जो परमेश्वर तारों को नाम से बुलाता है, वही खेदित मनवालों की पट्टी बाँधता है। हम अक्सर इन दोनों को अलग रखते हैं: विशाल परमेश्वर दूर, कोमल परमेश्वर पास। भजनकार कहता है, यह एक ही सामर्थ्य के दो चेहरे हैं। "उसकी बुद्धि अपरम्पार है" इसलिए वह छोटे को भूल नहीं सकता; जो अनगिनत तारों का हिसाब रखता है, उसके लिए एक टूटा हुआ दिल गिनती से बाहर नहीं। और इसी परमेश्वर की पसंद उलटी है: घोड़े का बल और मनुष्य के बलवन्त पैर उसे प्रभावित नहीं करते। वह उनसे प्रसन्न होता है "जो उसकी करुणा पर आशा लगाए रहते हैं।" सामर्थ्य उसकी है; हमारा हिस्सा आशा है।
मुख्य सूत्र
निर्वासन से लौटे लोगों के लिए यह भजन आधा-अधूरा सच था: फाटक बने, पर राजा नहीं लौटा; अनाज मिला, पर साम्राज्य के कर भी चुकाने पड़े। "निकाले हुए इस्राएलियों को इकट्ठा कर रहा है" एक ऐसा वाक्य है जो अपने पूरे होने की प्रतीक्षा करता रहा। यीशु मसीह जब नासरत में खड़े होकर टूटे मनवालों को चंगा करने की सेवा अपने ऊपर लेते हैं, तब यह भजन शब्दशः चलने-फिरने लगता है। और वे कौवों का हवाला देकर चिन्ता करने वालों को समझाते हैं (लूका 12:24), मानो भजन 147 का पद 9 उनकी जेब में हो। जो परमेश्वर बिखरों को बटोरता है, वह अंततः क्रूस के द्वारा सब जातियों में से अपने लोगों को इकट्ठा करता है।
दर्पण
यह भजन दो तरह के लोगों को असहज करता है। पहला, वह जो अपने "घोड़े" गिनता है: बचत खाता, डिग्रियाँ, नेटवर्क, शरीर की ताकत, वह सब जिसके बल पर आप रात को निश्चिन्त सोते हैं। भजन कहता है, परमेश्वर इनसे प्रभावित नहीं होते। दूसरा, वह जो अपने आप को गिनती से बाहर समझता है: जिसकी नौकरी चली गई, जिसका विवाह टूट गया, जिसका शरीर अब साथ नहीं देता। उससे भजन कहता है, तारों का नाम रखने वाला तुम्हारा नाम भूला नहीं। दोनों को एक ही जगह आना है, "उसकी करुणा पर आशा" लगाने की जगह।
आज रात बाहर निकलकर आकाश की ओर देखिए, चाहे बादल हों, और ऊँचे स्वर में कहिए: "वह तारों को गिनता है, और मेरा नाम भी जानता है।" फिर अपना वह घाव नाम लेकर उन्हें सौंप दीजिए जिसकी पट्टी अब तक नहीं बँधी।
श्रोताओं का चेहरा
कल्पना कीजिए: फारसी साम्राज्य के एक छोटे से प्रान्त यहूद में, मलबे पर बसा एक नगर। चूने और धूल की गंध, नए दरवाज़ों की लकड़ी, और चारों ओर वे लोग जिनके दादा बाबुल की नहरों के किनारे रोए थे। उनके पड़ोसी ताकतवर हैं, उनके पास सेना नहीं, घोड़े नहीं, राजा नहीं। जब वे गाते हैं "उसने तेरे फाटकों के खम्भों को दृढ़ किया है," तो यह कोई काव्य नहीं, यह गिनती में आ सकने वाला अनुभव है। और जब सर्दी में पाला गिरता है और खेत जम जाते हैं, तो पद 17 का प्रश्न, "उसकी की हुई ठण्ड को कौन सह सकता है?", रसोई की चिन्ता है: अगला गेहूँ आएगा या नहीं। उनके लिए मौसम धर्मशास्त्र था।
कठिन प्रश्न
पद 20 खटकता है: "किसी और जाति से उसने ऐसा बर्ताव नहीं किया।" क्या परमेश्वर पक्षपाती हैं? ईमानदारी से कहें तो यह पद चुनाव का दावा करता है और उसे छिपाता नहीं। पर ध्यान दीजिए, जो चीज़ इस्राएल को विशेष बनाती है वह बेहतर घोड़े या बड़ी सीमा नहीं, बल्कि वचन है: "उसने याकूब को अपना वचन बताया।" यह विशेषाधिकार कम और ज़िम्मेदारी अधिक है, क्योंकि जिसे विधियाँ दी गई हैं उसी से हिसाब भी माँगा जाएगा (रोमियों 3:2 इसी तनाव को उठाता है)। फिर भी जलन का काँटा बना रहता है: बाकी जातियाँ क्यों अँधेरे में रहीं? भजन इसका उत्तर नहीं देता। वह केवल इतना कहता है कि जिसे प्रकाश मिला है, वह उसे अपनी योग्यता न समझे।
अन्तर्पाठ
यशायाह 40 इसी भजन का बड़ा भाई है: वहाँ भी परमेश्वर तारों की सेना को नाम लेकर बुलाते हैं, और वहीं वे थके हुए को बल देते हैं, ताकि निर्वासितों को शान्ति की खबर मिले। यह जोड़ संयोग नहीं; दोनों पाठ उसी घायल पीढ़ी से बोल रहे हैं। दूसरी ओर पद 10 का उलटा दर्पण राजाओं की वे सूचियाँ हैं जहाँ सुलैमान से लेकर आगे तक घोड़े और रथ गिने जाते हैं, और जिनका अंत हर बार हार में होता है। इस्राएल का इतिहास ही इस भजन का प्रमाण है: जहाँ उन्होंने घोड़ों पर भरोसा किया, वहाँ गिरे; जहाँ करुणा पर आशा रखी, वहाँ बटोरे गए।
चिंतन
आपके जीवन के कौन से "घोड़े" हैं, वे सहारे जिन्हें गिनकर आप सुरक्षित महसूस करते हैं, और उन्हें छोड़ देने में सबसे ज़्यादा डर किस बात का लगता है?
जो परमेश्वर तारों का नाम रखते हैं, वही आपके घाव पर पट्टी बाँधना चाहते हैं; आपने अब तक कौन सा घाव उन्हें दिखाया ही नहीं?
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Psalms 147 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
भजन संहिता 147 का क्या अर्थ है?
भजन संहिता 147 किस विषय में है?
भजन संहिता 147 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
भजन संहिता 147 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
भजन संहिता 147 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Psalms 147 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पिता, आप ही आकाश को बादलों से ढकते हैं और सूखी धरती के लिए बारिश तैयार करते हैं। पहाड़ों की घास तक आपकी नज़र में है, तो मेरी ज़रूरतें भी आपसे छिपी नहीं हैं। जब मन सूखा सा लगे, तब मुझ पर भी अपनी नमी बरसाइए और भरोसा करना सिखाइए।
जो परमेश्वर तारों की गिनती करता है और हर एक का नाम रखता है, वही झुके हुए लोगों को सम्भालता है: "यहोवा नम्र लोगों को सम्भालता है, और दुष्टों को भूमि पर पटक देता है।" सम्भालना माने थामे रखना, गिरने न देना। आज अगर तू टूटा हुआ महसूस करता है, तो जान ले कि तेरी कमज़ोरी उसे दूर नहीं करती, वही उसे पास खींचती है।
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