बाइबल व्याख्या

भजन संहिता 150

बाइबल
यह अध्याय JL Group के सहयोग से संभव हुआ है

पाठ

भजन संहिता का अंतिम पद मंदिर के आँगन की धूल और धुएँ से उठता है, जहाँ झाँझ की खनक कानों में चुभती है और नंगे पैर पत्थर पर थिरकते हैं। यह भजन कुछ माँगता नहीं, कुछ शिकायत नहीं करता, किसी शत्रु का नाम नहीं लेता। वह केवल एक ही आज्ञा तेरह बार दोहराता है: "यहोवा की स्तुति करो!" वह बताता है कि स्तुति कहाँ हो, परमेश्वर के पवित्रस्थान में और उसके सामर्थ्य से भरे आकाशमण्डल में; क्यों हो, उसके पराक्रम के कामों और उसकी अत्यन्त बड़ाई के कारण; किस तरह हो, नरसिंगा, सारंगी, वीणा, डफ, नाच, बाँसुरी और ऊँचे शब्दवाली झाँझ के साथ; और अंत में, कौन करे: "जितने प्राणी हैं सब के सब।" फिर वाद्य थम जाते हैं और पूरी पुस्तक चुप हो जाती है।

मर्म

इस भजन का केंद्र वह छोटा-सा वाक्यांश है जो सबसे आसानी से छूट जाता है: "उसकी अत्यन्त बड़ाई के अनुसार उसकी स्तुति करो।" यहाँ स्तुति का पैमाना हमारी भावना नहीं, हमारी परिस्थिति नहीं, यहाँ तक कि हमारी कृतज्ञता भी नहीं; पैमाना स्वयं परमेश्वर की महानता है। और यही वह पैमाना है जिसे कोई वाद्ययंत्र, कोई गायक-मंडली, कोई मानव फेफड़ा कभी पूरा नहीं कर सकता। इसलिए स्तुति कभी समाप्त नहीं होती, वह केवल रुकती है। ध्यान दीजिए कि यहाँ कुछ भी माँगा नहीं जा रहा। जो पुस्तक दुष्टों की सलाह और रोते हुए प्रश्नों से भरी है, वह यहाँ आकर निःस्वार्थ हो जाती है। यही बाइबल की मानव-समझ है: हम माँगने के लिए बने हैं, हाँ, पर अंततः हम उस परमेश्वर के सामने आनन्दित होने के लिए बने हैं जिसकी बड़ाई हमसे बड़ी है।

सूत्र

भजन संहिता की पाँचों पुस्तकें एक-एक स्तुति-वाक्य पर समाप्त होती हैं, पर आखिरी पुस्तक अपने अंत में एक पूरा भजन ही स्तुति बना देती है। यह संयोग नहीं। जो संग्रह पहले पद में "धन्य है वह मनुष्य" से शुरू होता है और बीच में "हे मेरे परमेश्वर, तूने मुझे क्यों छोड़ दिया" तक गिरता है, वह यहाँ आकर साँस लेते हर प्राणी के सम्मिलित शोर में खुलता है। यह केवल संपादकीय क्रम नहीं, यह उद्धार की दिशा है: विलाप आखिरी शब्द नहीं रखता। प्रकाशितवाक्य में यूहन्ना स्वर्ग, पृथ्वी और समुद्र की हर सृष्टि को मेम्ने के सिंहासन के सामने गाते सुनता है; वह दृश्य इसी भजन का पूरा होना है। मसीह वह है जिसने क्रूस पर अपनी साँस खो दी ताकि "जितने प्राणी हैं" वह वाक्य झूठा न रह जाए।

दर्पण

हममें से अधिकांश स्तुति को ईंधन की तरह बरतते हैं: हम गाते हैं ताकि हल्का महसूस करें, ताकि सप्ताह झेल सकें। यह भजन उस सौदे को तोड़ देता है। यहाँ स्तुति किसी मनोदशा का परिणाम नहीं, वह परमेश्वर की "अत्यन्त बड़ाई" का उचित प्रत्युत्तर है, चाहे आपकी रिपोर्ट अच्छी आई हो या नहीं, चाहे बेटा फोन उठाता हो या नहीं। और ध्यान दीजिए कि यहाँ कोई अकेला नहीं गा रहा; यह सामूहिक, शोरगुल भरा, शरीर से किया गया काम है, डफ और नाच समेत। जो विश्वास केवल सिर में रहता है, वह इस भजन में असहज होगा। आज कुछ ऐसा कीजिए: घर से बाहर खुले आसमान के नीचे खड़े होकर एक गहरी साँस लीजिए, और ऊँची आवाज़ में, सुनाई देने लायक, कहिए, "यहोवा की स्तुति करो", और उसके बाद परमेश्वर का एक ऐसा काम नाम लेकर बोलिए जो इसी सप्ताह आपके साथ हुआ।

बारीकी

छठे पद का हिन्दी "जितने प्राणी हैं" इब्रानी में कोल हन्नशामाह है, शाब्दिक रूप से "हर साँस"। यह "हर व्यक्ति" नहीं कहता, "हर विश्वासी" तो बिल्कुल नहीं। उत्पत्ति में परमेश्वर मिट्टी के पुतले की नासिका में यही नशामाह फूँकते हैं, और आदमी जीवित प्राणी हो जाता है। यानी भजन का अंतिम मापदंड योग्यता नहीं, शुद्धता नहीं, संगीत का ज्ञान नहीं, केवल यह कि आप साँस ले रहे हैं। जो उधार की साँस आपके भीतर चल रही है, वही आपका वाद्ययंत्र है और वही आपका निमंत्रण-पत्र। अस्पताल के बिस्तर पर पड़ा वह बूढ़ा जो गा नहीं सकता, इस आयत के दायरे से बाहर नहीं; उसकी काँपती साँस भी उसी वाद्यवृंद का हिस्सा है।

मुख्य पात्र

विचित्र बात यह है कि यह भजन परमेश्वर का कोई वर्णन नहीं करता। न "चरवाहा", न "चट्टान", न "राजा"। हम उन्हें केवल उस हलचल से पहचानते हैं जो वे पैदा करते हैं, जैसे अँधेरे कमरे में दीया नहीं, बल्कि उससे रोशन चीज़ें दिखती हैं। दो ही संकेत मिलते हैं: "पराक्रम के काम", यानी इतिहास में किया गया उद्धार, और "अत्यन्त बड़ाई", यानी उनका अपना स्वभाव। और वे पवित्रस्थान में भी हैं और आकाशमण्डल में भी, यरूशलेम के एक छोटे कमरे में और पूरे ब्रह्मांड में एक साथ। यह वह परमेश्वर है जो झाँझ की चुभती आवाज़ और नाचते पैरों से असहज नहीं होता। हमारी कल्पना का परमेश्वर अक्सर गंभीर और चुप है; यह परमेश्वर शोर सह सकता है, बल्कि उसे बुलाता है।

पृष्ठभूमि

कल्पना कीजिए निर्वासन के बाद का यरूशलेम, फारसी या यूनानी साम्राज्य के नक्शे पर एक मामूली प्रांत। मंदिर दोबारा खड़ा है, पर सुलैमान के मंदिर जैसा नहीं; कुछ बूढ़े आज भी उसे देखकर रो पड़ते हैं। हवा में जली चर्बी, धूप और भीड़ के पसीने की गंध है। लेवीय गायक-वंश अपने तय स्थानों पर खड़े हैं, पीतल की झाँझ उनके हाथ में है, नरसिंगा याजकों का अधिकार है। पर इस सूची में डफ और नाच भी हैं, जो मंदिर के पेशेवर संगीत नहीं, गाँव की स्त्रियों के उत्सव के वाद्य थे, लाल सागर के किनारे मरियम वाले। यानी भजन याजक और जनता के बीच की दीवार गिरा देता है। और एक राजनीतिक दुस्साहस भी: शक्तिहीन, करदाता, छोटे-से समुदाय ने घोषणा की कि साम्राज्य के देवता नहीं, यहोवा ही हर साँस की स्तुति के योग्य हैं।

मनन के प्रश्न

आपकी स्तुति किस पैमाने पर टिकी है, अपनी परिस्थिति पर या परमेश्वर की "अत्यन्त बड़ाई" पर, और पिछली बार कब यह अंतर आपको साफ़ दिखा?

यह भजन शरीर, शोर और समुदाय को स्तुति में खींच लाता है; आपकी आराधना में इन तीनों में से कौन-सा सबसे ज़्यादा गायब है, और क्यों?

Psalms में और गहराई से जानें

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The Songs of Jesus

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Psalms 1-72

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Psalms 73-150

Derek Kidner

The second half of the psalter with the same loved precision.

Reflections on the Psalms

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Psalms 150 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

भजन संहिता 150 का क्या अर्थ है?
भजन संहिता का अंतिम पद मंदिर के आँगन की धूल और धुएँ से उठता है, जहाँ झाँझ की खनक कानों में चुभती है और नंगे पैर पत्थर पर थिरकते हैं। यह भजन कुछ माँगता नहीं, कुछ शिकायत नहीं करता, किसी शत्रु का नाम नहीं लेता। वह केवल एक ही आज्ञा तेरह बार दोहराता है: "यहोवा की स्तुति करो!" वह बताता है कि स्तुति कहाँ हो, परमेश्वर के पवित्रस्थान में और उसके सामर्थ्य से भरे आकाशमण्डल में; क्यों हो, उसके पराक्रम के कामों और उसकी अत्यन्त बड़ाई के कारण; किस तरह हो, नरसिंगा, सारंगी, वीणा, डफ, नाच, बाँसुरी और ऊँचे शब्दवाली झाँझ के साथ; और अंत में, कौन करे: "जितने प्राणी हैं सब के सब।" फिर वाद्य थम जाते हैं और पूरी पुस्तक चुप हो जाती है।
भजन संहिता 150 किस विषय में है?
भजन संहिता की पाँचों पुस्तकें एक-एक स्तुति-वाक्य पर समाप्त होती हैं, पर आखिरी पुस्तक अपने अंत में एक पूरा भजन ही स्तुति बना देती है। यह संयोग नहीं। जो संग्रह पहले पद में "धन्य है वह मनुष्य" से शुरू होता है और बीच में "हे मेरे परमेश्वर, तूने मुझे क्यों छोड़ दिया" तक गिरता है, वह यहाँ आकर साँस लेते हर प्राणी के सम्मिलित शोर में खुलता है। यह केवल संपादकीय क्रम नहीं, यह उद्धार की दिशा है: विलाप आखिरी शब्द नहीं रखता। प्रकाशितवाक्य में यूहन्ना स्वर्ग, पृथ्वी और समुद्र की हर सृष्टि को मेम्ने के सिंहासन के सामने गाते सुनता है; वह दृश्य इसी भजन का पूरा होना है। मसीह वह है जिसने क्रूस पर अपनी साँस खो दी ताकि "जितने प्राणी हैं" वह वाक्य झूठा न रह जाए।
भजन संहिता 150 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
छठे पद का हिन्दी "जितने प्राणी हैं" इब्रानी में कोल हन्नशामाह है, शाब्दिक रूप से "हर साँस"। यह "हर व्यक्ति" नहीं कहता, "हर विश्वासी" तो बिल्कुल नहीं। उत्पत्ति में परमेश्वर मिट्टी के पुतले की नासिका में यही नशामाह फूँकते हैं, और आदमी जीवित प्राणी हो जाता है। यानी भजन का अंतिम मापदंड योग्यता नहीं, शुद्धता नहीं, संगीत का ज्ञान नहीं, केवल यह कि आप साँस ले रहे हैं। जो उधार की साँस आपके भीतर चल रही है, वही आपका वाद्ययंत्र है और वही आपका निमंत्रण-पत्र। अस्पताल के बिस्तर पर पड़ा वह बूढ़ा जो गा नहीं सकता, इस आयत के दायरे से बाहर नहीं; उसकी काँपती साँस भी उसी वाद्यवृंद का हिस्सा है।
भजन संहिता 150 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
कल्पना कीजिए निर्वासन के बाद का यरूशलेम, फारसी या यूनानी साम्राज्य के नक्शे पर एक मामूली प्रांत। मंदिर दोबारा खड़ा है, पर सुलैमान के मंदिर जैसा नहीं; कुछ बूढ़े आज भी उसे देखकर रो पड़ते हैं। हवा में जली चर्बी, धूप और भीड़ के पसीने की गंध है। लेवीय गायक-वंश अपने तय स्थानों पर खड़े हैं, पीतल की झाँझ उनके हाथ में है, नरसिंगा याजकों का अधिकार है। पर इस सूची में डफ और नाच भी हैं, जो मंदिर के पेशेवर संगीत नहीं, गाँव की स्त्रियों के उत्सव के वाद्य थे, लाल सागर के किनारे मरियम वाले। यानी भजन याजक और जनता के बीच की दीवार गिरा देता है। और एक राजनीतिक दुस्साहस भी: शक्तिहीन, करदाता, छोटे-से समुदाय ने घोषणा की कि साम्राज्य के देवता नहीं, यहोवा ही हर साँस की स्तुति के योग्य हैं।
भजन संहिता 150 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
यह भजन शरीर, शोर और समुदाय को स्तुति में खींच लाता है; आपकी आराधना में इन तीनों में से कौन-सा सबसे ज़्यादा गायब है, और क्यों?

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