भजन संहिता 150:6
पाठ
भजन की पूरी कड़ी एक ही शब्द पर टिकी है: स्तुति करो। पवित्रस्थान में, आकाशमण्डल में, नरसिंगे और वीणा के साथ, डफ और नाच के साथ, झाँझों की गूँज के साथ। और फिर, जैसे कोई संगीतकार अंतिम स्वर को सबसे ऊँचा उठा देता है, छठा पद वाद्ययंत्रों को पीछे छोड़कर सीधे जीवित प्राणियों की ओर मुड़ जाता है: "जितने प्राणी हैं सब के सब यहोवा की स्तुति करें! यहोवा की स्तुति करो!" अब न कोई स्थान सीमित करता है, न कोई वाद्य, न कोई विशेष दल। जिसके भीतर साँस है, वही इस आमंत्रण का पात्र है। पूरी भजन-संहिता, जो पद के विलाप, क्रोध, पछतावे और भय से होकर गुज़री है, यहाँ आकर एक ही वाक्य में समाप्त होती है। कोई शर्त नहीं, कोई अपवाद नहीं, केवल साँस और स्तुति।
मूल मर्म
इस पद का मर्म उस छोटे से शब्द में छिपा है जिसे हिन्दी "प्राणी" कहती है। इब्रानी में यह नशामा है, वही साँस जो परमेश्वर ने उत्पत्ति में मिट्टी के पुतले की नाक में फूँकी थी। यानी स्तुति कोई अतिरिक्त धार्मिक गतिविधि नहीं, मनुष्य के अस्तित्व का मूल कारण है। आप इसलिए साँस नहीं लेते कि जीवित रहें; आप इसलिए जीवित हैं कि उसकी स्तुति करें जिसने साँस दी। यह बात हमारी उपलब्धि-केंद्रित सोच को चुभती है। हम मानते हैं कि परमेश्वर के सामने हमारा मूल्य इस पर टिका है कि हम क्या करते हैं, कितना सेवा करते हैं, कितना सही विश्वास रखते हैं। पर यह पद कहता है: तुम्हारे पास जो एकमात्र योग्यता है, वह है उधार ली हुई साँस। और वही पर्याप्त है, क्योंकि वह साँस स्वयं अनुग्रह का उपहार है, कमाई हुई चीज़ नहीं।
सूत्र
जो साँस उत्पत्ति में दी गई थी, वह सुसमाचारों में एक बिल्कुल अप्रत्याशित जगह पर दिखाई देती है: क्रूस पर। जिसने प्रत्येक प्राणी को साँस दी, उसने स्वयं साँस ली, और फिर उसे छोड़ दिया। यूहन्ना ध्यान से लिखता है कि यीशु ने सिर झुकाकर प्राण त्याग दिए। भजन 150 की अंतिम पंक्ति वहाँ टूटती हुई लगती है, क्योंकि स्तुति का स्रोत स्वयं निःश्वास पड़ा है। पर तीसरे दिन के बाद वही यीशु अपने चेलों पर फूँकते हैं और कहते हैं, पवित्र आत्मा लो। उत्पत्ति की फूँक दोहराई जाती है, इस बार नई सृष्टि के लिए। इसलिए यह पद केवल एक उत्सवी समापन नहीं, एक भविष्यवाणी है: जिस दिन मसीह में हर साँस पुनर्स्थापित होगी, उस दिन यह आमंत्रण पूरा होगा, और प्रकाशितवाक्य में यूहन्ना ठीक यही दृश्य देखता है, स्वर्ग, पृथ्वी और समुद्र का हर प्राणी मेम्ने की स्तुति करता हुआ।
दर्पण
यह पद उन लोगों के लिए सबसे कठिन है जो थके हुए हैं। जब आप सुबह उठकर बीमार माँ की दवा गिनते हैं, जब वेतन महीने के बीस तारीख तक ही चलता है, जब शरीर पहले जैसा साथ नहीं देता, तब "स्तुति करो" एक और बोझ जैसा सुनाई देता है। पर ध्यान दीजिए, पद यह नहीं कहता कि जिनके पास कारण हैं वे स्तुति करें, न ही यह कि जिनके पास शक्ति है। केवल साँस। यानी यह आमंत्रण आपकी सबसे कमज़ोर हालत में भी वापस नहीं लिया जाता। यह आपके अभिमान को भी तोड़ता है: आपकी योग्यता, पद, और धर्मनिष्ठा कुछ नहीं जोड़तीं, और आपकी असफलता कुछ नहीं घटाती।
आज कुछ करने के लिए: एक मिनट चुपचाप बैठकर अपनी साँस को महसूस कीजिए, और हर साँस छोड़ते हुए धीरे से कहिए, "यहोवा की स्तुति करो।" बस एक मिनट, आवाज़ निकालकर।
अंतर्पाठ
भजन 6 में दाऊद परमेश्वर के सामने एक तर्क रखता है: मृत्यु में कोई तेरा स्मरण नहीं करता, कब्र में कौन तेरा धन्यवाद करेगा? पुराने नियम की यह शिकायत भजन 150 के अंत पर एक छाया डालती है, क्योंकि यदि स्तुति साँस पर टिकी है, तो मृत्यु स्तुति का अंत है। यही कारण है कि पुनरुत्थान केवल एक अतिरिक्त सिद्धांत नहीं, बल्कि इस पद की जान है। मसीह के जी उठने के बाद पौलुस मृत्यु को उसके डंक से वंचित घोषित करता है, और तब भजन 150 का आमंत्रण कब्र के पार तक फैल जाता है। जो साँस मिट्टी में लौट जाती है, वह मसीह में वापस दी जाएगी, और स्तुति का स्वर कभी नहीं टूटेगा।
प्रश्न
फिर भी एक प्रश्न बचा रहता है, और उसे चिकना करना बेईमानी होगी। "जितने प्राणी हैं सब के सब" में वे भी शामिल हैं जो परमेश्वर को नहीं जानते, जो उसका नाम तक नहीं लेते, और वे भी जिन्होंने उसके नाम पर क्रूरता की। क्या उनकी साँस भी स्तुति का आमंत्रण रखती है? पाठ कोई छँटाई नहीं करता, और यही असहज बात है। भजन इस प्रश्न को खुला छोड़ देता है कि अंत में यह आमंत्रण सचमुच कितनों तक पहुँचेगा। हम इतना जानते हैं कि परमेश्वर किसी का नाश नहीं चाहते, और यह भी कि मनुष्य इनकार कर सकता है। इन दोनों सच्चाइयों के बीच का तनाव यह भजन हल नहीं करता; वह केवल आमंत्रण को इतना चौड़ा कर देता है कि कोई अपने आप को बाहर न समझे।
पृष्ठभूमि
जिन्होंने यह भजन पहली बार गाया, वे बेबीलोन की बंधुआई के बाद का समुदाय थे, जिनका मन्दिर पहले जैसा भव्य नहीं था और जिनका राज्य लौटा नहीं था। भजन-संहिता उनके लिए एक पूरी यात्रा थी, जो भजन 1 की व्यवस्था-भक्ति से शुरू होकर दाऊद की पुकारों, राष्ट्र के विलापों और निर्वासन के सवालों से होकर गुज़री। उनके कानों में यह अंतिम पंक्ति किसी सुखद उत्सव-गीत की तरह नहीं, बल्कि एक साहसी घोषणा की तरह गूँजी होगी: हमारे पास नरसिंगा और झाँझ हों या न हों, हमारे पास साँस है, और इतना ही परमेश्वर के लिए पर्याप्त है। टूटे हुए लोगों के मुँह से निकला "यहोवा की स्तुति करो" सबसे वज़नदार स्तुति है।
चिंतन
आपकी ज़िंदगी का कौन-सा हिस्सा आपको लगता है कि स्तुति के योग्य नहीं, और यह पद उस हिस्से से क्या कहता है?
यदि आपका मूल्य आपकी उपलब्धियों पर नहीं बल्कि उधार ली हुई साँस पर टिका है, तो इस सप्ताह आपकी एक आदत कैसे बदलेगी?
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Psalms 150:6 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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Psalms 150 में आपको क्या स्पर्श करता है?
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