भजन संहिता 2:12
पाठ
"पुत्र को चूमो" — यही इस भजन का अंतिम, चौंकाने वाला आदेश है। जिन राजाओं ने अभी-अभी बन्धन तोड़ने और रस्सियाँ उतार फेंकने की बात की थी (पद 3), उन्हीं से अब कहा जाता है कि वे उस पुत्र के सामने झुककर उसे चूमें, अर्थात् अधीनता और निष्ठा का वह चिन्ह दिखाएँ जो प्राचीन दरबारों में प्रजा अपने स्वामी को देती थी। कारण साफ है: यदि वे नहीं झुकेंगे, तो उसका क्रोध भड़केगा और वे "मार्ग ही में" नाश हो जाएँगे, यानी अपनी योजना पूरी करने से पहले ही, बीच रास्ते में। और फिर, इस चेतावनी की पूँछ पर, अचानक एक आशीष लटक जाती है: "धन्य है वे जो उसमें शरण लेते है।" धमकी और निमंत्रण एक ही साँस में।
मर्म
यह पद परमेश्वर के बारे में दो बातें एक साथ कहता है जिन्हें हम अक्सर अलग-अलग रखना चाहते हैं। पहली: परमेश्वर का अधिकार वास्तविक है, और उसका इनकार वास्तविक विनाश लाता है। यह कोई प्रतीकात्मक क्रोध नहीं; भजन कहता है वह "क्षण भर में" भड़क सकता है। दूसरी: यही क्रोधित राजा वही है जिसमें शरण ली जा सकती है। ध्यान दीजिए, बचने का उपाय उस क्रोध से भागना नहीं, बल्कि उसी व्यक्ति के पास दौड़ना है जिसका क्रोध डरावना है। यही सुसमाचार का ढाँचा है, पुराने नियम के बीचों-बीच। न्याय और अनुग्रह दो अलग दरवाज़े नहीं, एक ही दरवाज़ा हैं, और उस दरवाज़े का नाम "पुत्र" है। जो उससे टकराता है, टूटता है; जो उससे लिपटता है, धन्य कहलाता है।
सूत्र
भजन 2 इस्राएल के राजा के राज्याभिषेक पर गाया गया होगा, पर इसके शब्द किसी दाऊद-वंशी राजा के नाप से हमेशा बड़े रहे। किस यहूदी राजा को "दूर-दूर के देशों" की निज भूमि मिली? किसके चरणों में जाति-जाति के लोग आए? भजन का वादा अधूरा लटका रहा, सदियों तक, जब तक कि यरदन के किनारे स्वर्ग से वही वाक्य नहीं सुनाई दिया जो पद 7 में लिखा है: "तू मेरा पुत्र है।" प्रेरितों ने इसे पहचान लिया। पतरस और यूहन्ना जब छूटकर लौटे, तो उन्होंने ठीक इसी भजन के पद 1-2 को प्रार्थना में दोहराया, क्योंकि हेरोदेस और पीलातुस के षड्यंत्र में उन्हें वही पुराना हुल्लड़ दिखा। और "पुत्र को चूमो" का उत्तर? वह क्रूस के नीचे मिला, जहाँ एक रोमी सूबेदार ने घुटने टेके बिना भी स्वीकार किया कि यह परमेश्वर का पुत्र था।
दर्पण
हम सोचते हैं बगावत कोई बड़ी बात होती है, तख्ता पलटना, ईश्वर को नकारना। पर भजन के राजा बड़े शब्द बोलते हैं और छोटे काम करते हैं: बस रस्सी ढीली कर लेना। आप भी जानते हैं वह जगह कहाँ है। वह हिसाब जो आप किसी को दिखाना नहीं चाहते। वह रिश्ता जिसमें आपने तय कर लिया है कि क्षमा माँगना अब आपकी शान के खिलाफ है। वह रविवार की आराधना जिसमें शरीर हाज़िर है और गर्दन अकड़ी हुई। "पुत्र को चूमो" का मतलब है वहीं झुकना जहाँ आपने झुकने से इनकार किया है। और ध्यान दीजिए, भजन उन्हें धमकाकर छोड़ता नहीं; वह उन्हें शरण का रास्ता दिखाता है। आज, किसी शांत कोने में, ज़ोर से बोलकर उस एक बात का नाम लीजिए जिस पर आपने मसीह का अधिकार अब तक नहीं माना, और फिर कहिए: "यह भी आपका है।"
पृष्ठभूमि
प्राचीन पूर्व में राजा की मृत्यु के बाद का समय सबसे खतरनाक होता था। अधीन राज्य उसी क्षण संधि तोड़ने का मौका ढूँढ़ते थे, और नया राजा गद्दी पर बैठते ही विद्रोह का सामना करता था। भजन 2 ठीक इसी दृश्य से खुलता है: जाति-जाति हुल्लड़ मचा रही हैं, हाकिम मिल-बैठकर षड्यंत्र रच रहे हैं। यरूशलेम कोई महाशक्ति नहीं था; मिस्र और अश्शूर के बीच दबा एक छोटा पहाड़ी राज्य। इसलिए पद 4 का दृश्य दुस्साहसी है: स्वर्ग में विराजमान परमेश्वर हँस रहे हैं। पूरे भजन का दावा यही है कि असली सिंहासन सिय्योन में नहीं, ऊपर है, और सिय्योन का राजा केवल उसका प्रतिनिधि है। पद 12 उसी दावे का अंतिम बयान है, जो अब विद्रोहियों को सीधे संबोधित करता है।
बारीकी
"मार्ग ही में नाश हो जाओ" — यह छोटा-सा वाक्यांश आसानी से पढ़ा जाता है और आसानी से चूक जाता है। यह अंत का चित्र नहीं, बीच का चित्र है। कोई यात्रा शुरू करता है, योजना बनाता है, सेना जुटाता है, और रास्ते में ही गिर पड़ता है। सिकंदर तैंतीस साल में मर गया। बाबेल की मीनार अधूरी छूटी। बगावत की त्रासदी यह नहीं कि वह हार जाती है, बल्कि यह कि वह कभी पूरी ही नहीं होती। और इसके ठीक बगल में भजन दूसरा शब्द रखता है: "शरण।" शरण लेने वाला भी मार्ग में है, पर वह किसी के भीतर है। यही अंतर है, मार्ग में अकेले नष्ट होना, या मार्ग में किसी की आड़ में सुरक्षित रहना।
श्रोता
पहले गाने वालों के लिए यह भजन राष्ट्रीय गर्व का गीत नहीं था, बल्कि एक बेचैन उम्मीद। वे जानते थे कि उनके राजा कैसे थे: कुछ अच्छे, ज़्यादातर कमज़ोर, कुछ घिनौने। फिर भी हर अभिषेक पर यह गीत गाया जाता, और हर बार शब्द राजा से बड़े निकलते। निर्वासन के बाद तो कोई राजा भी न बचा, और तब यह भजन पूरी तरह भविष्य की ओर मुड़ गया। जब बंदी लौटे और यह गीत पढ़ा, तो उनके कानों में "पुत्र को चूमो" का अर्थ था: फारस, यूनान, रोम जो भी आए, अंतिम शब्द उनका नहीं होगा। इसीलिए पद 12 की आशीष कोई मीठा उपसंहार नहीं थी। वह उन लोगों की जीवन-रेखा थी जिनके पास सिंहासन नहीं, केवल वादा बचा था।
चिंतन
आपके जीवन का कौन-सा हिस्सा इस समय "रस्सी ढीली करने" की अवस्था में है, जहाँ आप खुली बगावत तो नहीं करते, पर अधिकार भी नहीं मानते?
यदि क्रोध और शरण दोनों एक ही व्यक्ति में हैं, तो क्या आप मसीह के पास डर से भागकर जाते हैं, या डर के कारण दूर खड़े रहते हैं?
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