भजन संहिता 56:8
पाठ
दाऊद अपने शत्रुओं की घेराबंदी के बीच अचानक रुककर एक अजीब, कोमल बात कहता है: "तू मेरे मारे-मारे फिरने का हिसाब रखता है; तू मेरे आँसुओं को अपनी कुप्पी में रख ले! क्या उनकी चर्चा तेरी पुस्तक में नहीं है?" भागते-फिरते जीवन के हर कदम का लेखा परमेश्वर के पास है, यह उसका दावा है। और फिर वह और आगे बढ़ता है: मेरे आँसू यूँ ही मिट्टी में न गिरें, उन्हें अपनी कुप्पी में सँभाल लीजिए। अंत में एक प्रश्न, जो वास्तव में प्रश्न नहीं बल्कि विश्वास की पकड़ है: ये सब तो आपकी पुस्तक में लिखे ही हैं, है न?
मूल बात
यहाँ परमेश्वर का जो चित्र उभरता है, वह एक दूर बैठे न्यायी का नहीं, बल्कि एक हिसाब रखने वाले का है, जो आँसुओं जैसी व्यर्थ चीज़ को भी सहेजने लायक समझता है। यह वही परमेश्वर है जो मिस्र में इस्राएल की कराह "सुनता" और उनके दुःख को "जानता" है; निर्गमन की वह भाषा यहाँ एक अकेले आदमी पर लागू हो जाती है। दुःख का सबसे गहरा दंश यह नहीं कि वह आता है, बल्कि यह कि वह गुमनाम लगता है, किसी ने गिना ही नहीं। पद 8 उसी गुमनामी को तोड़ता है। मलाकी में भी परमेश्वर के सामने एक "स्मरण की पुस्तक" लिखी जाती है, और वहाँ भी बात डरने वालों की है जिन्हें लगता था कि उनका जीवन बेहिसाब बीत रहा है। दाऊद का भरोसा तर्क पर नहीं, इसी स्मृति पर टिका है।
सूत्र
आँसुओं की कुप्पी एक छोटी-सी छवि है, पर वह पूरी बाइबल में से होकर बहती है। पुराने नियम में परमेश्वर अपनी प्रजा का दुःख भूलते नहीं; यही स्मृति उन्हें छुड़ाने पर मजबूर करती है। और जब यीशु मसीह लाज़र की कब्र के सामने स्वयं रो पड़ते हैं, तो वह परमेश्वर आँसू केवल सँभालता नहीं, बहाता भी है। गतसमनी में जो पसीना और पुकार थी, वह भी इसी कुप्पी में गिरी। इसलिए प्रकाशितवाक्य का वह दृश्य, जहाँ परमेश्वर स्वयं अपने लोगों की आँखों से हर आँसू पोंछ देते हैं, किसी भावुक कविता का अंत नहीं है, बल्कि उस हिसाब का समापन है जो पद 8 में शुरू होता है। जो सहेजा गया था, वही एक दिन सामने रखकर सुखाया जाएगा। दाऊद को यह अंत दिखा नहीं था, फिर भी उसने उसकी दिशा में हाथ बढ़ा दिया।
दर्पण
यह पद उन लोगों को छूता है जिनका दुःख किसी रजिस्टर में दर्ज नहीं होता। वह माँ जो रात को बाथरूम में नल खोलकर रोती है ताकि बच्चे न सुनें। वह आदमी जिसके बारे में दफ़्तर में बातें गढ़ी जाती हैं, ठीक वैसे ही जैसे पद 5 में दाऊद के वचनों का "उलटा अर्थ" लगाया जाता था, और जो सफ़ाई देते-देते थक चुका है। वह बुज़ुर्ग जो अस्पताल के गलियारे में अकेला बैठा है। हमारा सबसे गहरा डर यह नहीं कि परमेश्वर कठोर हैं, बल्कि यह कि वे ध्यान ही नहीं दे रहे; कि हमारे आँसू बस भाप बनकर उड़ गए। दाऊद इस डर को नकारता नहीं, वह उसे परमेश्वर की स्मृति के सामने रख देता है। आज एक कागज़ पर उस एक रात की तारीख लिखिए जब आप रोए थे और किसी को पता नहीं चला, और उसके नीचे लिखिए: "यह परमेश्वर की पुस्तक में दर्ज है।"
प्रश्न
अगर परमेश्वर हर आँसू गिनते हैं, तो उन्हें रोकते क्यों नहीं? कुप्पी में आँसू सँभालना सुंदर लगता है, पर आँसू फिर भी बहे। दाऊद की घेराबंदी पद 8 के बाद खत्म नहीं हुई; वह अब भी "मारे-मारे" फिर रहा था। यह पद दर्द को मिटाता नहीं, उसे अर्थ देता है, और यह दोनों एक चीज़ नहीं हैं। पद 13 में दाऊद कह पाता है कि परमेश्वर ने उसे मृत्यु से बचाया, पर हर कहानी वहाँ नहीं पहुँचती; कुछ लोग रोते हुए ही मरते हैं। बाइबल इस खाई को जल्दबाज़ी से नहीं पाटती। वह केवल इतना कहती है कि सहेजे गए आँसू व्यर्थ नहीं थे, और जिसने उन्हें सहेजा वह स्वयं रोया है। यह सांत्वना कम है जितनी हम चाहते हैं, पर टिकने के लिए काफ़ी है।
बारीकी
इब्रानी में यहाँ एक ऐसा खेल है जो अनुवाद में छिप जाता है। "मारे-मारे फिरना" के लिए शब्द है नोद, और "कुप्पी" के लिए लगभग वही ध्वनि, नोद। भटकना और चमड़े की मशक, दो शब्द जो कान में एक जैसे बजते हैं। दाऊद का भटकना और उसके आँसुओं का पात्र एक ही सुर में बँधे हैं: जहाँ-जहाँ वह बेघर होकर फिरा, वहाँ-वहाँ की नमी परमेश्वर ने इकट्ठी की। मशक उस ज़माने में यात्रा का सबसे ज़रूरी सामान थी, पानी की थैली जो रेगिस्तान में जान बचाती थी। दाऊद कह रहा है कि परमेश्वर उसके आँसुओं को उतनी ही सावधानी से ढोते हैं जितनी सावधानी से कोई भगोड़ा अपना पानी ढोता है। बर्बाद होने लायक कुछ भी नहीं, एक बूँद भी नहीं।
मुख्य पात्र
इस पद का मुख्य पात्र दाऊद नहीं, परमेश्वर हैं। और उनका चित्रण चौंकाने वाला है: वे हिसाब रखने वाले हैं, पुस्तक लिखने वाले हैं, कुप्पी भरने वाले हैं। ये तीनों काम धीमे, धैर्य वाले, लगभग मातृसुलभ काम हैं। जिस अध्याय में शत्रु "घात में ताक लगाए" बैठे हैं और दाऊद परमेश्वर के क्रोध की माँग करता है, उसी अध्याय के बीच में परमेश्वर झुककर आँसू बटोरते दिखते हैं। न्याय और कोमलता एक ही हाथ के दो काम हैं। और यही दाऊद के डर को तोड़ता है: वह दो बार कहता है कि मनुष्य उसका क्या कर सकता है, पर यह दावा हवा में नहीं टिका; यह उस परमेश्वर पर टिका है जो उसके हर कदम और हर बूँद को जानते हैं। जिसे इस तरह गिना गया हो, उसे भीड़ डरा नहीं सकती।
मनन के प्रश्न
आपके जीवन का कौन-सा दुःख आपको "बेहिसाब" लगता है, जिसे किसी ने गिना नहीं; और उसे परमेश्वर की पुस्तक में दर्ज मानना आपके आज के दिन को कैसे बदलेगा?
दाऊद शत्रुओं के बीच परमेश्वर की स्मृति पर टिका रहा। आप किस चीज़ पर टिकते हैं जब सफ़ाई देने से कुछ नहीं बदलता?
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