बाइबल व्याख्या

प्रकाशितवाक्य 3:13

बाइबल
यह वचन Panijhora northern evangelical Lutheran church द्वारा समर्पित है

पाठ

फिलदिलफिया की कलीसिया को लिखी चिट्ठी एक चेतावनी और एक वादे के बाद अचानक थम जाती है, और उसके अन्त में वही एक वाक्य आता है जो हर चिट्ठी के अन्त में आता है: "जिसके कान हों, वह सुन ले कि आत्मा कलीसियाओं से क्या कहता है।" यह कोई नई जानकारी नहीं देता। यह पिछली बारह आयतों को उठाकर पाठक की गोद में रख देता है और पूछता है: तुमने सुना या केवल पढ़ा? ध्यान दीजिए, बात एक कलीसिया को कही गई है, पर सुनने के लिए "कलीसियाओं" को कहा गया है, बहुवचन में। जो फिलदिलफिया से कहा गया, वह सरदीस को भी सुनना है, और लौदीकिया को भी, और आपको भी।

मूल बात

यह छोटा वाक्य दो बड़ी बातें एक साथ कहता है। पहली: जो मसीह बोलते हैं, वही आत्मा कहता है। आयत 7 में बोलनेवाला "जो पवित्र और सत्य है" कहलाता है, और आयत 13 में वही शब्द "आत्मा" के शब्द बन जाते हैं। परमेश्वर की वाणी किसी पुरानी चिट्ठी में बन्द नहीं है; वह आज, इस क्षण, जीवित रूप में बोल रही है। दूसरी: सुनना निष्क्रिय नहीं है। बाइबल में सुनना और मानना एक ही क्रिया है; जो सुनकर नहीं करता, उसने सुना ही नहीं। इसलिए यहाँ ज़िम्मेदारी वक्ता से हटकर श्रोता पर आ जाती है। कान होना एक वरदान है, पर उसे खुला रखना एक निर्णय है, जो हर सुबह नए सिरे से लेना पड़ता है।

सूत्र

"जिसके कान हों, वह सुन ले" यह वाक्य यीशु के होंठों पर नया नहीं था। गलील की पहाड़ियों में बीज बोनेवाले का दृष्टान्त सुनाने के बाद उन्होंने यही कहा था, और वहाँ भी बात यही थी: एक ही वचन गिरता है, पर मिट्टी अलग-अलग होती है। पुराने नियम में इस्राएल की सबसे बड़ी आज्ञा भी सुनने से ही शुरू होती है, "सुन, हे इस्राएल", और उनकी सबसे बड़ी विफलता भी सुनने की विफलता थी: भविष्यद्वक्ताओं ने चिल्लाया, लोगों ने कान भारी कर लिए। अब, स्वर्ग से बोलनेवाला जी उठा मसीह वही पुकार दोहराता है, इस बार आत्मा के द्वारा, कलीसिया के भीतर से। पूरी बाइबल की कहानी एक बोलनेवाले परमेश्वर और एक ऊँघते हुए श्रोता के बीच का संघर्ष है, और यीशु मसीह इस कहानी में वह पहला मनुष्य हैं जिन्होंने पूरी तरह सुना और पूरी तरह मान लिया।

आयना

आपके पास बाइबल पढ़ने की आदत है। आप अध्ययन समूह चलाते होंगे, रविवार की तैयारी करते होंगे, कठिन आयतों पर सोचते होंगे। और ठीक यहीं यह वाक्य चुभता है, क्योंकि यह पढ़ने और सुनने के बीच अन्तर करता है। हम सूचना इकट्ठा करने में इतने कुशल हो जाते हैं कि आज्ञा मानने की ज़रूरत ही महसूस नहीं होती। आयत 8 में मसीह कहते हैं, "तेरी सामर्थ्य थोड़ी सी तो है", और हमारा असली डर यही है: थोड़ी सामर्थ्यवाला दिखना, दफ़्तर में, परिवार में, कलीसिया में। इसलिए हम वचन को समझने की परत के नीचे छिपा देते हैं, ताकि वह हमसे कुछ माँग न सके। आयत 11 का चेतावनी भरा वाक्य, "जो कुछ तेरे पास है उसे थामे रह", उन लोगों से कहा गया है जो पहले से जानते हैं, फिर भी ढीले पड़ सकते हैं।

आज यह करें: कल की या आज की पढ़ाई से एक बात चुनिए जो आप जानते हैं कि परमेश्वर ने आपसे कही थी और आपने टाल दी। उसे एक वाक्य में काग़ज़ पर लिखिए, और नीचे वह तारीख़ लिखिए जब तक आप उसे करेंगे। दस मिनट, बस।

संदर्भ

फिलदिलफिया आज के पश्चिमी तुर्की में एक व्यापारिक शहर था, भूकम्पों की पट्टी पर बसा हुआ, जहाँ इमारतें कई बार गिरीं और लोग शहर के बाहर डर के साथ जीते थे। इसलिए "मन्दिर में एक खम्भा" और "वह फिर कभी बाहर न निकलेगा" जैसे वादे उन कानों में जो सुनाई देते थे, वह हम शायद पूरी तरह नहीं पकड़ पाते। कलीसिया छोटी थी, आर्थिक रूप से कमज़ोर, और आयत 9 के अनुसार आराधनालय से बहिष्कार का दबाव झेल रही थी। यूहन्ना यह चिट्ठी पतमोस द्वीप से लिख रहे थे, निर्वासन में। यह चिट्ठी कलीसिया की सभा में ऊँची आवाज़ में पढ़ी जाती थी, और अन्त में यह वाक्य आता था, जब सब चुप बैठे होते थे और हवा में शब्द ठहरे रहते थे।

कठिन प्रश्न

पर "जिसके कान हों" का अर्थ क्या यह है कि कुछ लोगों के पास कान नहीं हैं? यह वाक्य आराम नहीं देता। यीशु ने बीज के दृष्टान्त के साथ यही शब्द बोले थे, और उसके बाद कहा था कि कुछ लोग सुनकर भी नहीं समझते। तो क्या सुनने की क्षमता एक भेंट है जो किसी को मिलती है और किसी को नहीं? पवित्रशास्त्र इसे खुला छोड़ देता है, और मैं इसे बन्द नहीं करूँगा। मगर इतना साफ़ है: यह चेतावनी उन्हीं को दी गई है जो इसे सुन रहे हैं, और चेतावनी देने का कोई अर्थ ही नहीं अगर कोई द्वार खुला न हो। जिस मसीह के पास दाऊद की कुँजी है, वे बन्द कान भी खोल सकते हैं। पर उस माँग को माँगना पड़ता है, और वहीं हमारी असली अनिच्छा दिखती है।

पहले श्रोता

कल्पना कीजिए: एक छोटा कमरा, तीस-चालीस लोग, कुछ दास, कुछ कारीगर, कोई अमीर नहीं। उन्होंने अभी सुना है कि उनकी सामर्थ्य थोड़ी है, फिर भी उनके सामने एक खुला द्वार है जिसे कोई बन्द नहीं कर सकता। उन्होंने सुना है कि जिन्होंने उन्हें बाहर निकाला, वे एक दिन जान लेंगे कि मसीह ने इन्हीं छोटे लोगों से प्रेम रखा। और अब अन्तिम वाक्य: यह सिर्फ़ फिलदिलफिया के लिए नहीं, "कलीसियाओं" के लिए है। यानी उनकी छोटी, कमज़ोर, धमकाई हुई मंडली एशिया की पूरी कलीसिया के लिए एक शिक्षा बन गई है। उनकी वफ़ादारी दूसरों के लिए वचन बन गई है। यह उन्हें अकेलेपन से बाहर खींचता है, और साथ ही एक ज़िम्मेदारी भी सौंपता है जो हम अक्सर सुनना भूल जाते हैं।

चिन्तन

पिछले महीने परमेश्वर के वचन से कोई एक बात आपने सुनी और मानी, या केवल समझी और रख दी?

अगर आपकी कलीसिया की वफ़ादारी दूसरी कलीसियाओं के लिए एक चिट्ठी होती, तो उसमें क्या लिखा जाता?

Revelation में और गहराई से जानें

चुनी हुई पुस्तकें जो इस बाइबल पुस्तक को और गहराई से समझाती हैं।

The Message of Revelation

Michael Wilcock

A steady, sane guide through the visions to the throne of the Lamb.

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Revelation 3:13 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।

प्रकाशितवाक्य 3:13 का क्या अर्थ है?
फिलदिलफिया की कलीसिया को लिखी चिट्ठी एक चेतावनी और एक वादे के बाद अचानक थम जाती है, और उसके अन्त में वही एक वाक्य आता है जो हर चिट्ठी के अन्त में आता है: "जिसके कान हों, वह सुन ले कि आत्मा कलीसियाओं से क्या कहता है।" यह कोई नई जानकारी नहीं देता। यह पिछली बारह आयतों को उठाकर पाठक की गोद में रख देता है और पूछता है: तुमने सुना या केवल पढ़ा?
प्रकाशितवाक्य 3:13 किस विषय में है?
"जिसके कान हों, वह सुन ले" यह वाक्य यीशु के होंठों पर नया नहीं था। गलील की पहाड़ियों में बीज बोनेवाले का दृष्टान्त सुनाने के बाद उन्होंने यही कहा था, और वहाँ भी बात यही थी: एक ही वचन गिरता है, पर मिट्टी अलग-अलग होती है। पुराने नियम में इस्राएल की सबसे बड़ी आज्ञा भी सुनने से ही शुरू होती है, "सुन, हे इस्राएल", और उनकी सबसे बड़ी विफलता भी सुनने की विफलता थी: भविष्यद्वक्ताओं ने चिल्लाया, लोगों ने कान भारी कर लिए। अब, स्वर्ग से बोलनेवाला जी उठा मसीह वही पुकार दोहराता है, इस बार आत्मा के द्वारा, कलीसिया के भीतर से। पूरी बाइबल की कहानी एक बोलनेवाले परमेश्वर और एक ऊँघते हुए श्रोता के बीच का संघर्ष है, और यीशु मसीह इस कहानी में वह पहला मनुष्य हैं जिन्होंने पूरी तरह सुना और पूरी तरह मान लिया।
प्रकाशितवाक्य 3:13 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
आज यह करें: कल की या आज की पढ़ाई से एक बात चुनिए जो आप जानते हैं कि परमेश्वर ने आपसे कही थी और आपने टाल दी। उसे एक वाक्य में काग़ज़ पर लिखिए, और नीचे वह तारीख़ लिखिए जब तक आप उसे करेंगे। दस मिनट, बस।
प्रकाशितवाक्य 3:13 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
पर "जिसके कान हों" का अर्थ क्या यह है कि कुछ लोगों के पास कान नहीं हैं? यह वाक्य आराम नहीं देता। यीशु ने बीज के दृष्टान्त के साथ यही शब्द बोले थे, और उसके बाद कहा था कि कुछ लोग सुनकर भी नहीं समझते। तो क्या सुनने की क्षमता एक भेंट है जो किसी को मिलती है और किसी को नहीं? पवित्रशास्त्र इसे खुला छोड़ देता है, और मैं इसे बन्द नहीं करूँगा। मगर इतना साफ़ है: यह चेतावनी उन्हीं को दी गई है जो इसे सुन रहे हैं, और चेतावनी देने का कोई अर्थ ही नहीं अगर कोई द्वार खुला न हो। जिस मसीह के पास दाऊद की कुँजी है, वे बन्द कान भी खोल सकते हैं। पर उस माँग को माँगना पड़ता है, और वहीं हमारी असली अनिच्छा दिखती है।
प्रकाशितवाक्य 3:13 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
पिछले महीने परमेश्वर के वचन से कोई एक बात आपने सुनी और मानी, या केवल समझी और रख दी?
हमारे साझेदारों के सहयोग से संभव

Revelation 3 पर समुदाय क्या साझा करता है

इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।

धन्यवाद संपादकीय पर पद 21

पिता, धन्यवाद कि यीशु ने जय पाकर आपके सिंहासन पर स्थान लिया, और उसी जीत में मुझे भी हिस्सा देने का वादा किया। धन्यवाद कि मेरी छोटी सी लड़ाइयाँ व्यर्थ नहीं, क्योंकि जय पानेवाले को वह अपने साथ अपने सिंहासन पर बैठाएगा।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 1

सरदीस की कलीसिया के बारे में मसीह कहते हैं, "मैं तेरे कामों को जानता हूँ, कि तू जीवित तो कहलाता है, पर है मरा हुआ।" लोगों के बीच नाम जीवित था, भीतर सब ठंडा पड़ चुका था। सोच, क्या तेरी सेवकाई, तेरी प्रार्थना, तेरी भक्ति अब सिर्फ आदत बन गई है? जो तुझे जानता है, वह तेरे नाम से नहीं, तेरे दिल से तुझे पहचानता है।

अंतर्दृष्टि संपादकीय पर पद 4

सरदीस की कलीसिया का नाम तो जीवित होने का था, पर वह मरी हुई थी। ऐसी जगह में भी यीशु कहते हैं, "पर सरदीस में तेरे यहाँ कुछ ऐसे लोग हैं, जिन्होंने अपने वस्त्र दूषित नहीं किए।" कुछ ही लोग, बिना नाम के, बिना तालियों के। पर उसकी नज़र उन पर थी। जहाँ तुम्हारी वफ़ादारी कोई नहीं देखता, वहाँ वह देख रहा है।

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