यहोशू 24
पाठ
शेकेम में यहोशू पूरे इस्राएल को इकट्ठा करता है, और परमेश्वर की ओर से उनके पूरे इतिहास की कहानी सुनाता है, तेरह से लेकर उस दिन तक जब वे उस देश में बस गए जो उन्होंने खुद नहीं बनाया था। फिर वह चुनाव सामने रखता है, "आज चुन लो कि तुम किसकी सेवा करोगे।" लोग वाचा बाँधते हैं, एक पत्थर साक्षी के रूप में खड़ा किया जाता है, और यहोशू मर जाता है।
मर्म
यह अध्याय अनुग्रह के व्याकरण पर टिका है। परमेश्वर पहले तेरह वचनों में केवल एक क्रिया दोहराते हैं, "मैंने"। मैंने अब्राहम को लिया, मैंने वंश बढ़ाया, मैंने निकाल लाया, मैंने डुबा दिया, मैंने वश में कर दिया, मैंने दिया। और तब, वचन 13 में, वह चोट पहुँचाने वाला वाक्य आता है, "मैंने तुम्हें ऐसा देश दिया जिसमें तुम ने परिश्रम न किया था।" इसके बाद ही मानवीय प्रतिक्रिया की माँग आती है, "इसलिए अब यहोवा का भय मानकर उसकी सेवा करो।" यह क्रम महत्वपूर्ण है। सेवा प्रेम की पहली हरकत नहीं है, वह दूसरी है। परमेश्वर पहले काम करते हैं, फिर मनुष्य उत्तर देता है। जो इसे उलटता है, वह बाइबल को उलट देता है।
साझा सूत्र
यह अध्याय एक बड़े यहोशू की ओर उँगली उठाता है। नाम एक ही है, यहोशू और यीशु, "यहोवा उद्धार है।" यहाँ यहोशू लोगों को उस देश में लाता है और उन्हें विश्राम देता है, पर वचन 19 में वह स्वयं कहता है, "तुम से यहोवा की सेवा नहीं हो सकती।" वह वाचा बाँधता है यह जानते हुए कि लोग टूटेंगे। यही वह दरार है जिसमें मसीह खड़े होते हैं। इब्रानियों की पत्री कहती है कि यदि यहोशू ने उन्हें सच्चा विश्राम दिया होता, तो परमेश्वर बाद में किसी और दिन की चर्चा न करते। शेकेम का पत्थर साक्षी है, पर वह अभियोग लगाने वाला साक्षी है। मसीह का क्रूस भी एक साक्षी है, पर वह हमारे विरुद्ध नहीं, हमारे पक्ष में गवाही देता है। जहाँ यहोशू केवल विकल्प रख सकता है, वहाँ मसीह वह हृदय देते हैं जो चुन सके।
दर्पण
वचन 15 का वाक्य हर सभा में सजावट की तरह लटकाया जाता है, "मैं तो अपने घराने समेत यहोवा ही की सेवा करूँगा।" पर उसके ठीक पहले यहोशू कहता है, "उन देवताओं को दूर करो जिनकी सेवा तुम्हारे पुरखा फरात के उस पार करते थे।" यानी, ये लोग वादा किए हुए देश में बस चुके हैं, युद्ध जीत चुके हैं, और उनकी गठरियों में अब भी पुराने देवता छिपे हैं। यह हमारी कहानी है। हम मसीह को स्वीकार कर चुके हैं, पर पैसे की सुरक्षा, बच्चों की सफलता, अपनी प्रतिष्ठा, ये अब भी हमारे तंबू में मूर्तियाँ हैं। यहोशू यह नहीं मानता कि विश्वासी अपने आप शुद्ध हैं। वह कहता है, आज, अभी, दूर करो। कल का उद्धार आज की भक्ति को स्वतः जन्म नहीं देता।
प्रश्न
वचन 19 में यहोशू कुछ ऐसा कहता है जो सुनने में कठोर है, "तुम से यहोवा की सेवा नहीं हो सकती।" लोग अभी-अभी हाँ कह चुके हैं, और वह उनके उत्साह पर ठंडा पानी डालता है। क्यों? क्या वह उन्हें हतोत्साहित करना चाहता है? नहीं, वह उन्हें भ्रम से बचाना चाहता है। सतही हाँ खतरनाक होती है, क्योंकि वह टूटने पर कड़वाहट में बदल जाती है। यहोशू जानता है कि मानवीय संकल्प अपर्याप्त है, फिर भी वह वाचा बाँधता है। यह विरोधाभास खुला रहता है। शायद यही सत्य है, कि परमेश्वर हमारे साथ वाचा बाँधते हैं यह जानते हुए कि हम असमर्थ हैं, ताकि अंततः एक ऐसा आए जो हमारी ओर से इसे पूरा करे।
संदर्भ
शेकेम कोई तटस्थ स्थान नहीं है। यहीं अब्राहम पहली बार कनान में रुके थे, यहीं याकूब ने पराए देवताओं को बांज वृक्ष के नीचे गाड़ा था। यहोशू जानबूझकर इसी जगह लोगों को इकट्ठा करता है, ताकि भूगोल स्वयं गवाही दे। ऐतिहासिक क्षण भी गंभीर है, विजय समाप्त हो चुकी है, गोत्र अपनी-अपनी भूमि में बस चुके हैं, नेतृत्व बदलने वाला है। यह वह क्षण है जब समृद्धि विश्वास का सबसे बड़ा शत्रु बनने वाली है। कनान के देवता कृषि और उर्वरता से जुड़े थे, यानी जब खेत में फसल उगती, तो पड़ोसी कहते, बाल की कृपा से। यहोशू पहले ही खतरा भाँप लेता है, इसलिए वह वाचा को दोहराता है।
अंतर-पाठ
प्रेरितों के काम 7:45 में स्तिफनुस इसी यहोशू का उल्लेख करता है, पर उसकी सारी कहानी मसीह पर आकर टिकती है। यूहन्ना 4:5 में यीशु उसी शेकेम के पास कुएँ पर बैठते हैं, जहाँ यूसुफ की हड्डियाँ गाड़ी गई थीं, और एक सामरी स्त्री से कहते हैं कि सच्ची आराधना न इस पर्वत पर होगी, न यरूशलेम में, बल्कि आत्मा और सच्चाई से। शेकेम की वाचा वहीं पूरी होती है, जहाँ मसीह जल देते हैं जो अनन्त जीवन तक उमड़ता रहे। और व्यवस्थाविवरण 30 की गूँज यहाँ प्रबल है, "आज मैंने जीवन और मृत्यु तुम्हारे सामने रखी है, जीवन को चुन लो।"
चिंतन
*आज मेरे तंबू में कौन से "फरात के उस पार के देवता" अ
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इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
शेकेम में यहोशू ने लोगों की भावना पर भरोसा नहीं किया, उसने वाचा बाँधी: "उसी दिन यहोशू ने लोगों के साथ वाचा बाँधी, और शेकेम में उनके लिये विधि और नियम ठहराए।" भीड़ ने कहा था, हम यहोवा की सेवा करेंगे। पर कहना आसान है, बँधना कठिन। तेरे मन का वादा कहीं लिखा गया है, या बस उस दिन की भावना में बह गया?
पिता, यहोशू का जीवन पूरा हुआ और वह आपका सेवक कहलाया। मेरे दिन भी गिने हुए हैं। मुझे सिखा कि मैं इन्हें बर्बाद न करूँ, बल्कि हर दिन ईमानदारी से आपके पीछे चलूँ। जब मेरा समय पूरा हो, तो पीछे कुछ ऐसा रह जाए जो दूसरों को आपकी ओर ले जाए।
हे प्रभु, जैसे तूने अपने लोगों को शत्रुओं के सामने विजय दी और उनकी भूमि उन्हें सौंपी, वैसे ही आज मेरे जीवन की लड़ाइयों में भी तू ही मेरा सहारा बन। मैं अपनी शक्ति पर नहीं, तेरे हाथों पर भरोसा रखता हूँ। तू ही मुझे आगे बढ़ा।
हे प्रभु, धन्यवाद कि तूने उस पत्थर की तरह हमारे बीच भी गवाह ठहराए हैं जो तेरे हर वचन को सुनते और याद दिलाते हैं। तेरी बातें कभी मिटती नहीं, वे हमारे विश्वासघात के विरुद्ध साक्षी बनकर हमें तेरी ओर लौटाती रहती हैं। तेरी सच्चाई के लिए तुझे धन्यवाद।
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