प्रकाशितवाक्य 3:20
पाठ
लौदीकिया की कलीसिया को कही गई फटकार के ठीक बाद, जहाँ प्रभु ने कहा था कि वे इस गुनगुनी कलीसिया को अपने मुँह से उगलने पर हैं, अचानक स्वर बदल जाता है। धमकी की जगह एक दस्तक आ जाती है: "देख, मैं द्वार पर खड़ा हुआ खटखटाता हूँ; यदि कोई मेरा शब्द सुनकर द्वार खोलेगा, तो मैं उसके पास भीतर आकर उसके साथ भोजन करूँगा, और वह मेरे साथ।" जो सृष्टि का मूल कारण है, वही अपनी ही कलीसिया के दरवाज़े के बाहर खड़ा है, भीतर आने की अनुमति माँगता हुआ। वह दरवाज़ा तोड़ता नहीं, ताला नहीं खोलता, बस खटखटाता है और बोलता है। और जो वह भीतर आकर करना चाहते हैं, वह उपदेश नहीं, न्याय नहीं, बल्कि साथ बैठकर भोजन है।
मूल बात
यहाँ अनुग्रह की सबसे विचित्र तस्वीर है: सर्वसमर्थ प्रभु स्वयं को याचक की स्थिति में रख देते हैं। यह कमज़ोरी नहीं, यह अनुग्रह का स्वभाव है। परमेश्वर संबंध को ज़बरदस्ती नहीं बनाते; वे बुलाते हैं, और बुलाहट में ही उनकी सामर्थ्य छिपी है। ध्यान दीजिए, यह पद खोए हुए संसार से नहीं, एक कलीसिया से कहा गया है जो अपने को धनी समझती है। यानी मसीह के नाम की सारी व्यवस्था भीतर चलती रह सकती है और मसीह स्वयं बाहर खड़े हों। दूसरी बात भोजन की है। बाइबल में साथ खाना वाचा की भाषा है: मेज़ पर बैठना यानी अपनाया जाना, सुरक्षित होना, अपना कहलाना। इसलिए यह निमंत्रण केवल क्षमा का नहीं, संगति का है। न्याय की चेतावनी और यह दस्तक एक ही मुँह से आती हैं, क्योंकि पद उन्नीस के अनुसार ताड़ना उन्हीं को मिलती है जिनसे वे प्रेम रखते हैं।
जोड़नेवाला सूत्र
यह दस्तक अचानक नहीं आई। पूरे पवित्रशास्त्र में परमेश्वर वही करते हैं: अदन में वे उस मनुष्य को पुकारते हैं जो छिप गया है, और पूछते हैं, तू कहाँ है। वहाँ भी दरवाज़ा मनुष्य ने बंद किया था, परमेश्वर ने नहीं। वाचा का इतिहास इसी ढर्रे पर चलता है, बुलाहट के बाद बुलाहट, भविष्यद्वक्ता के बाद भविष्यद्वक्ता, और अंत में स्वयं पुत्र जो देह लेकर दरवाज़े तक आते हैं। यीशु मसीह का पूरा जीवन ही यह दस्तक है, और क्रूस वह क्षण जब खटखटानेवाले हाथ में कील ठोकी गई। और आगे देखिए तो यह भोजन प्रकाशितवाक्य के अंत की मेम्ने के विवाह भोज की ओर इशारा करता है। आज के दरवाज़े की छोटी सी मेज़ उस अंतिम मेज़ का पहला स्वाद है।
दर्पण
लौदीकिया की सबसे बड़ी समस्या पाप की सूची नहीं थी, आत्मसंतुष्टि थी। और यही हमारे लिए सबसे कठिन आईना है, क्योंकि आत्मसंतुष्टि चुभती नहीं। जिस महीने वेतन ठीक आया, बच्चे स्वस्थ रहे, कलीसिया में सेवा भी चलती रही, उसी महीने आपने शायद प्रभु से एक भी सच्ची बात नहीं कही। हम दरवाज़ा गुस्से में बंद नहीं करते; हम बस व्यस्तता में सुनना बंद कर देते हैं। दस्तक कोमल है, और कोमल आवाज़ शोर में सबसे पहले दबती है। पूछिए अपने आप से कि पिछली बार आपने प्रभु के साथ बिना माँगे, बिना एजेंडा के, केवल संगति में समय कब बिताया था। आज यह कीजिए: दस मिनट के लिए फ़ोन दूसरे कमरे में रखकर बैठिए और ज़ोर से कहिए, "प्रभु, भीतर आइए," फिर चुप रहकर सुनिए।
मुख्य पात्र
इस पद में मसीह का चित्र चौंकानेवाला है। जो पद चौदह में "परमेश्वर की सृष्टि का मूल कारण" कहलाते हैं, वही अब बाहर खड़े हैं, इंतज़ार करते हुए। सिंहासन पर बैठनेवाला अपनी ही रचना की देहरी पर धैर्य के साथ रुका है। यह वही स्वभाव है जो सुसमाचारों में दिखता है: वे ज़क्कई के घर में बिन बुलाए घुसते नहीं, बुलावे की जगह बनाते हैं। और उनका धैर्य उदासीनता नहीं है, वह प्रेम है जो ताड़ना भी देता है। ध्यान दीजिए कि वे नाराज़ होकर मुड़े नहीं। जिस कलीसिया को उगलने की बात की गई थी, उसी के दरवाज़े पर वे अब भी खड़े हैं। परमेश्वर की पवित्रता और परमेश्वर की करुणा यहाँ आपस में लड़ती नहीं, एक ही दस्तक में मिलती हैं।
शास्त्र की गूँज
श्रेष्ठगीत में दूल्हा रात को आकर दरवाज़ा खटखटाता है और दुल्हन देर कर देती है, और जब वह उठती है, वह जा चुका होता है। वह विरह की तस्वीर इस पद के पीछे साँस लेती है और चेतावनी देती है कि देर करना निर्दोष नहीं होता। दूसरी ओर, इसी अध्याय में फिलदिलफिया से कहा गया है कि "मैंने तेरे सामने एक द्वार खोल रखा है, जिसे कोई बन्द नहीं कर सकता।" दोनों दरवाज़ों को साथ रखिए। एक दरवाज़ा मसीह खोलते हैं और कोई बंद नहीं कर सकता; दूसरा दरवाज़ा हमें खोलना है और मसीह उसे तोड़ते नहीं। अनुग्रह की संप्रभुता और मनुष्य की ज़िम्मेदारी एक ही पत्र में, बिना किसी विरोधाभास के, साथ खड़ी हैं।
पहले सुननेवाले
लौदीकिया धनी शहर था, बैंकिंग का केंद्र, आँख के मरहम और काले ऊन के कपड़ों के लिए मशहूर। भूकंप के बाद उन्होंने रोम की सहायता ठुकराकर अपने पैसे से शहर दोबारा बनाया था। यही आत्मनिर्भरता कलीसिया की हवा में घुल गई थी, इसलिए सोना, वस्त्र और सुरमा खरीदने की सलाह उन्हें सीधे उनकी अपनी भाषा में चुभी होगी। और भोजन का निमंत्रण? उस संस्कृति में किसी को अपनी मेज़ पर बिठाना सामाजिक बराबरी की घोषणा थी। एक छोटी, गुनगुनी, आलोचना खाई हुई कलीसिया को यह सुनना कि प्रभु उनके साथ बैठकर खाना चाहते हैं, अपमान के बाद अप्रत्याशित सम्मान था। फटकार का लक्ष्य कभी दूरी नहीं था, हमेशा मेज़ थी।
मनन के प्रश्न
आपके जीवन का कौन सा कमरा ऐसा है जहाँ आपने प्रभु को अब तक केवल दरवाज़े तक ही आने दिया है, भीतर नहीं?
यदि प्रभु आज आपके साथ भोजन की मेज़ पर बैठें, तो पहली बात जो वे कहेंगे, आपके अनुमान में क्या होगी, और आप उसे सुनने से क्यों कतराते हैं?
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Revelation 3:20 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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प्रकाशितवाक्य 3:20 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Revelation 3 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
सरदीस की कलीसिया का नाम तो जीवित होने का था, पर वह मरी हुई थी। ऐसी जगह में भी यीशु कहते हैं, "पर सरदीस में तेरे यहाँ कुछ ऐसे लोग हैं, जिन्होंने अपने वस्त्र दूषित नहीं किए।" कुछ ही लोग, बिना नाम के, बिना तालियों के। पर उसकी नज़र उन पर थी। जहाँ तुम्हारी वफ़ादारी कोई नहीं देखता, वहाँ वह देख रहा है।
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