रोमियों 10:10
पाठ
पौलुस एक ही वाक्य में मनुष्य के दो छोरों को जोड़ देता है: भीतर का मन और बाहर का मुँह। "क्योंकि धार्मिकता के लिये मन से विश्वास किया जाता है, और उद्धार के लिये मुँह से अंगीकार किया जाता है।" यह पिछली आयत की व्याख्या है, जहाँ उन्होंने कहा था कि यदि कोई मुँह से यीशु को प्रभु मानकर अंगीकार करे और मन से विश्वास करे कि परमेश्वर ने उन्हें मरे हुओं में से जिलाया, तो वह उद्धार पाएगा। आयत 10 उसी बात को उलटकर, क्रम बदलकर दोहराती है, मानो पौलुस कह रहे हों: यह कोई दो-चरणों वाली विधि नहीं, यह एक ही व्यक्ति का पूरा उत्तर है, भीतर से भी और बाहर से भी।
मर्म
ध्यान दीजिए कि इस आयत में मनुष्य कुछ भी "करता" नहीं, वह केवल प्राप्त करता है और स्वीकारता है। तीसरी आयत में पौलुस ने इस्राएल की पीड़ा रखी थी: वे "अपनी धार्मिकता स्थापित करने का यत्न" करते रहे। धार्मिकता, यानी परमेश्वर के सामने सही ठहरना, कोई ऐसी वस्तु नहीं जिसे हम गढ़ सकें; वह दी जाती है, और मन उसे विश्वास से ले लेता है। और जो चीज़ मन में ली जाती है, वह मुँह तक पहुँचे बिना नहीं रहती। यहाँ "अंगीकार" का अर्थ केवल एक धार्मिक वाक्य दोहराना नहीं, बल्कि सार्वजनिक रूप से उस व्यक्ति के साथ खड़ा होना है जिसे परमेश्वर ने जिलाया। विश्वास का केंद्र कोई विचार नहीं, बल्कि एक जीवित प्रभु है, और इसीलिए वह छिपा नहीं रह सकता।
सूत्र
आयत 6 से 8 में पौलुस व्यवस्थाविवरण के उन शब्दों को उठाते हैं जो मूसा ने इस्राएल से कहे थे, और उन्हें सीधे मसीह पर लागू कर देते हैं। कोई स्वर्ग पर चढ़कर उन्हें उतार नहीं लाएगा, कोई अधोलोक में उतरकर उन्हें जिला नहीं लाएगा, क्योंकि यह काम हो चुका है। परमेश्वर स्वयं नीचे आए, और परमेश्वर ने ही उन्हें मृतकों में से उठाया। इसलिए "वचन तेरे निकट है, तेरे मुँह में और तेरे मन में है"। यही पूरे उद्धार-इतिहास का सूत्र है: जो दूरी मनुष्य कभी पार नहीं कर सका, उसे परमेश्वर ने पार किया। आयत 4 इसे एक वाक्य में बाँध देती है, "मसीह व्यवस्था का अन्त है"; अन्त, यानी वह लक्ष्य जहाँ व्यवस्था हमेशा से इशारा कर रही थी। मन और मुँह अब केवल उस पूर्ण हो चुके काम का उत्तर देते हैं।
दर्पण
हम में से अधिकांश मन से विश्वास करने में उतनी कठिनाई नहीं पाते जितनी मुँह से कहने में। दफ्तर की चाय के समय जब बातचीत धर्म पर मुड़ती है, हम चुप रह जाते हैं और उसे "समझदारी" कह देते हैं। परिवार के जिस सदस्य ने कभी ताना मारा था, उसके सामने हम अपना विश्वास हल्का करके रख देते हैं। कभी डर होता है कि नौकरी, रिश्ता या इज़्ज़त चली जाएगी; कभी यह गर्व कि "मेरा विश्वास मेरे और परमेश्वर के बीच की निजी बात है"। पौलुस इस बँटवारे को स्वीकार नहीं करते। जो मन में है, वह मुँह तक आता है, वरना वह शायद मन में भी नहीं है। आज ही, अकेले में, खड़े होकर ऊँची आवाज़ में कहिए: "यीशु प्रभु हैं, और परमेश्वर ने उन्हें मरे हुओं में से जिलाया।" अपने कानों से अपनी आवाज़ सुनिए।
पृष्ठभूमि
पौलुस रोम की उस कलीसिया को लिख रहे हैं जिसे उन्होंने देखा भी नहीं था, जिसमें यहूदी और गैर-यहूदी विश्वासी एक ही मेज़ पर बैठने का अभ्यास कर रहे थे, और जिसमें तनाव था। कुछ ही वर्ष पहले यहूदियों को रोम से निकाला गया था, और वे लौट रहे थे। साम्राज्य की भाषा में "प्रभु" एक राजनीतिक शब्द था; कैसर को यह पदवी दी जाती थी। इस माहौल में "यीशु प्रभु हैं" कहना केवल आत्मिक स्वीकारोक्ति नहीं, एक सार्वजनिक निष्ठा-परिवर्तन था। साथ ही आराधनालय के लिए यह वाक्य विद्रोह जैसा लगता था। इसीलिए पौलुस आयत 12 में ज़ोर देते हैं, "यहूदियों और यूनानियों में कुछ भेद नहीं", और अपने ही लोगों के लिए आयत 1 में प्रार्थना करते हैं।
बारीकी
"अंगीकार" के लिए पौलुस जो यूनानी शब्द चुनते हैं, वह है होमोलोगेओ, जिसका शाब्दिक अर्थ है "वही बात कहना"। अंगीकार का मतलब कोई नई राय व्यक्त करना नहीं, बल्कि परमेश्वर ने अपने पुत्र के विषय में जो कहा है, उसे दोहरा देना। परमेश्वर ने पुनरुत्थान के द्वारा यीशु को प्रभु घोषित किया; विश्वासी केवल उस घोषणा पर अपना हस्ताक्षर करता है। यह बात अंगीकार से हमारा सारा दबाव हटा देती है। आपको कुछ गढ़ना नहीं, कुछ सिद्ध नहीं करना; आपको केवल सहमत होना है, और उस सहमति को सुनाई देने देना है। इसीलिए आयत 13 इतनी सरल लगती है, "जो कोई प्रभु का नाम लेगा, वह उद्धार पाएगा।"
मुख्य पात्र
इस आयत का असली नायक वह है जिसका नाम इसमें लिया ही नहीं गया, पर जिसके बिना यह वाक्य खोखला है: वह प्रभु जिसे परमेश्वर ने जिलाया। पूरे अध्याय में मसीह ही गति करते हैं, हम नहीं। वे नीचे आते हैं, वे मृत्यु में उतरते हैं, वे उठाए जाते हैं, और फिर वे प्रचार किए गए वचन के रूप में हमारे इतने निकट आ जाते हैं कि हमारे मुँह में और मन में बस जाते हैं। यह कोई दूर बैठा न्यायी नहीं जो हमारे चढ़ने की प्रतीक्षा करता हो। अध्याय के अंत में परमेश्वर की तस्वीर यही है: "मैं सारे दिन अपने हाथ एक आज्ञा न माननेवाली और विवाद करनेवाली प्रजा की ओर पसारे रहा।" फैले हुए हाथ, सारे दिन। यही वह परमेश्वर हैं जिनके सामने मन विश्वास करता है और मुँह खुलता है।
चिंतन
आपके जीवन में वह कौन-सा स्थान है जहाँ आपका मन विश्वास करता है पर आपका मुँह चुप रहता है, और उस चुप्पी की असली वजह डर है या सुविधा?
यदि अंगीकार का अर्थ "परमेश्वर की कही बात को दोहराना" है, तो इस सप्ताह आपको किस बात पर परमेश्वर से सहमत होना बाकी है?
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Romans 10:10 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
रोमियों 10:10 का क्या अर्थ है?
रोमियों 10:10 किस विषय में है?
रोमियों 10:10 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
रोमियों 10:10 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
रोमियों 10:10 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Romans 10 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पिता, मेरे भीतर तेरे लिए जोश तो है, पर कई बार वह समझ से खाली रह जाता है। मुझे सिखा कि तुझे सच में जानूँ, ताकि मेरी भक्ति सिर्फ जज़्बात न हो, बल्कि तेरी सच्चाई पर टिकी रहे। मेरा दिल और मेरी सोच, दोनों तेरे हाथ में सौंपता हूँ।
पिता, धन्यवाद कि आपने मुझे अपनी धार्मिकता से अनजान नहीं रहने दिया, बल्कि मसीह में उसे प्रगट किया। धन्यवाद कि अब मुझे अपनी धार्मिकता स्थापित करने के थकाने वाले प्रयत्न नहीं करने पड़ते, क्योंकि आपने मुझे अपनी धार्मिकता के अधीन होना सिखाया है।
पिता, तेरा वचन कहीं दूर नहीं, वह मेरे बहुत पास है, मेरे मन में और मेरे होंठों पर। कई बार मैं तुझे ढूँढ़ने के लिए दूर भागता हूँ, जबकि तू पहले से ही यहीं है। मुझे विश्वास दे कि मैं जो मानता हूँ, वही सच्चाई से बोलूँ और जीऊँ।
वह सब का प्रभु है और अपने सब नाम लेनेवालों के लिये उदार है।" पौलुस यह उन लोगों से कह रहा था जो जाति और परंपरा के आधार पर खुद को दूसरों से ऊँचा समझते थे। परमेश्वर के पास कोई ऊँची पंक्ति नहीं है, कोई पिछड़ी कतार नहीं। तेरी जाति, तेरा गाँव, तेरा बीता हुआ जीवन उसकी उदारता की सीमा तय नहीं करते। तू पुकार, वह सुनता है। सवाल यह है कि जिन्हें तू अपने से छोटा मानता है, उनके लिए भी तेरा दिल इतना ही खुला है?
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