रोमियों 14
पाठ
पौलुस रोमी कलीसिया से कहते हैं कि जो विश्वास में निर्बल है उसे संगति में ले लो, पर उसकी शंकाओं पर बहस करने के लिये नहीं। कुछ लोग सब कुछ खाते हैं, कुछ केवल साग-पात; कुछ एक दिन को विशेष मानते हैं, कुछ सब दिन एक सा। पौलुस दोनों पक्षों को रोकते हैं: खानेवाला तुच्छ न जाने, न-खानेवाला दोष न लगाए, क्योंकि "परमेश्वर ने उसे ग्रहण किया है।" फिर वे तर्क को ऊपर उठाते हैं: हम सब प्रभु के हैं, जीते-मरते उन्हीं के, और सब परमेश्वर के न्याय सिंहासन के सामने खड़े होंगे। इसलिए दोष लगाने के बजाय ऐसा जीवन चुनो जिससे भाई को ठोकर न लगे, क्योंकि परमेश्वर का राज्य खाना-पीना नहीं, धार्मिकता, मिलाप और पवित्र आत्मा से मिलनेवाला आनन्द है।
मर्म
इस अध्याय का धार्मिक केन्द्र पद 4 में छिपा है: "तू कौन है जो दूसरे के सेवक पर दोष लगाता है?" पौलुस खान-पान के झगड़े को एक ही प्रश्न पर ला खड़ा करते हैं: यह व्यक्ति किसका है? जहाँ कृपा ने किसी को ग्रहण कर लिया है, वहाँ मेरा न्याय एक अनधिकृत घुसपैठ है। ध्यान दीजिए, पौलुस यह नहीं कहते कि दोनों पक्ष समान रूप से सही हैं; वे स्पष्ट कहते हैं "कोई वस्तु अपने आप से अशुद्ध नहीं।" पर सत्य जानना और सत्य से प्रेम करना दो अलग बातें हैं। कृपा केवल मुझे बचाती नहीं, वह मुझसे मेरे भाई पर अधिकार जताने का हक छीन लेती है। जिसे मसीह ने अपने लहू से खरीदा, उसे मैं अपनी सही समझ से नहीं तौल सकता।
सूत्र
पद 9 इस अध्याय की रीढ़ है: "मसीह इसलिए मरा और जी भी उठा कि वह मरे हुओं और जीवितों, दोनों का प्रभु हो।" क्रूस और पुनरुत्थान यहाँ व्यक्तिगत मुक्ति से आगे बढ़कर प्रभुता की घोषणा बनते हैं। और पौलुस इसे यशायाह 45 से जोड़ते हैं, जहाँ परमेश्वर अपनी सौगन्ध खाकर कहते हैं कि हर घुटना उनके सामने टिकेगा। पुराने नियम में यह वचन परमेश्वर की अद्वितीय प्रभुता का सबसे ऊँचा दावा था, और पौलुस उसे मसीह के न्याय सिंहासन पर लागू करते हैं। यही वह सूत्र है जो व्यवस्था की शुद्धता-अशुद्धता की सीमाओं से होकर उस राज्य तक पहुँचता है जहाँ भोजन नहीं, बल्कि धार्मिकता और मिलाप सीमा-रेखा खींचते हैं। वाचा का परमेश्वर अब भी अपनी प्रजा को इकट्ठा कर रहे हैं, पर अब मेज़ पर यहूदी और अन्यजाति साथ बैठते हैं।
दर्पण
हमारे झगड़े साग-पात के नहीं हैं, पर सूची लम्बी है: बच्चों की पढ़ाई और मोबाइल, शादी में कितना खर्च, कौन सा संगीत कलीसिया में चले, उपवास कौन रखे, किस त्योहार से दूरी रखी जाए। और भीतर जो चलता है वह और नंगा है: मुझे अच्छा लगता है कि मैं उससे ज़्यादा समझदार हूँ। पौलुस दोनों रोगों का नाम लेते हैं, तुच्छ जानना और दोष लगाना, क्योंकि दोनों में एक ही गर्व बोलता है। और जब वे कहते हैं "जिसके लिये मसीह मरा उसको तू अपने भोजन के द्वारा नाश न कर," तो वे आपकी आज़ादी को क्रूस के सामने तौलते हैं। आज एक काम कीजिए: उस एक व्यक्ति का नाम काग़ज़ पर लिखिए जिसकी "कमज़ोर" आस्था पर आप भीतर ही भीतर हँसते हैं, और उसके नाम के आगे लिखिए "परमेश्वर ने उसे ग्रहण किया है", फिर उसे ज़ोर से पढ़िए।
प्रश्न
पद 23 में एक काँटा है: "जो कुछ विश्वास से नहीं, वह पाप है।" यानी वह व्यक्ति जो सही काम करता है पर सन्देह के साथ, वह दोषी ठहरता है, जबकि जो वही काम धन्यवाद के साथ करता है वह निर्दोष है। इससे एक असहज निष्कर्ष निकलता है: पाप केवल कर्म में नहीं, कर्म और अन्तःकरण के बीच की दरार में भी बसता है। पर तब क्या अन्तःकरण ही अन्तिम अधिकारी बन जाता है? नहीं, क्योंकि पौलुस सत्य को नहीं छोड़ते; वे जानते हैं कि निर्बल भाई गलत समझता है। फिर भी वे उसे ज़बरदस्ती सही नहीं करवाते। इसे वे खुला छोड़ देते हैं, और यह खुलापन असुविधाजनक है: परमेश्वर एक साथ सत्य की माँग करते हैं और धीमे विवेक के साथ धैर्य रखते हैं। हमें इसी तनाव में जीना सीखना है।
श्रोता
रोम की कलीसिया में यहूदी विश्वासी वे लोग थे जो सम्राट क्लौदियुस के आदेश से शहर से निकाले गए थे और लौटकर पाया कि कलीसिया अब मुख्यतः अन्यजाति है, जिनके लिए कोशर नियम और सब्त का कोई अर्थ नहीं। सोचिए उस यहूदी की पीड़ा जिसके पुरखों ने सूअर का माँस खाने से इनकार कर जान दी थी, और अब उसे "निर्बल" कहा जा रहा है। और उधर अन्यजाति विश्वासी, जो अभी-अभी मूर्तियों से मुड़े थे, उनके लिए बाज़ार का माँस खाना आज़ादी का प्रमाण था। "परमेश्वर ने उसे ग्रहण किया है" उनके कानों में सामाजिक विस्फोट जैसा लगा होगा, क्योंकि इसका अर्थ था कि मेज़ पर बैठने का अधिकार परम्परा से नहीं, कृपा से मिलता है।
मुख्य पात्र
इस अध्याय में असली केन्द्र वह प्रभु है जो स्वामी भी है और न्यायी भी। पौलुस उन्हें दो चित्रों में दिखाते हैं। पहला, एक स्वामी जो अपने सेवक को थामे रखता है: "वह स्थिर ही कर दिया जाएगा; क्योंकि प्रभु उसे स्थिर रख सकता है।" यह कृपा का सबसे कोमल रूप है, वह हाथ जो गिरते हुए को पकड़ लेता है। दूसरा, एक न्यायी जिसके सिंहासन के सामने हम सब खड़े होंगे और अपना-अपना लेखा देंगे। ये दोनों चित्र एक-दूसरे को काटते नहीं। जो मेरे भाई को थामे हुए है, वही एक दिन मुझसे पूछेगा कि मैंने उसे क्यों धकेला। परमेश्वर की पवित्रता यहाँ ठण्डी सख्ती नहीं, बल्कि अपने लोगों के प्रति जलन भरा संरक्षण है, और उसी में हमारी शान्ति और हमारी चेतावनी दोनों छिपी हैं।
चिंतन
मेरी किस "सही समझ" ने हाल ही में किसी भाई या बहन को चुप करा दिया, और क्या मैं उसे प्रेम के लिये अपने मन में रखने को तैयार हूँ?
यदि परमेश्वर का राज्य "धार्मिकता और मिलाप और वह आनन्द है जो पवित्र आत्मा से होता है", तो मेरे घर और मेरी कलीसिया की किस बहस को मुझे आज ही छोड़ देना चाहिए?
Romans में और गहराई से जानें
चुनी हुई पुस्तकें जो इस बाइबल पुस्तक को और गहराई से समझाती हैं।
Keller opens Paul's masterpiece with clarity and pastoral warmth.
The second half: assurance, election and everyday Christian living.
A modern classic on the letter that has changed history more than once.
Romans: An Introduction and Commentary
A trusted Tyndale commentary: compact, careful and clear on every passage.
Faith.network earns a small commission on Kobo purchases made through these links, at no extra cost to you. It helps keep the studies free.
Romans 14 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस बाइबल अंश के बारे में सामान्य प्रश्नों के त्वरित उत्तर।
रोमियों 14 का क्या अर्थ है?
रोमियों 14 किस विषय में है?
रोमियों 14 का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
रोमियों 14 हमें परमेश्वर के स्वभाव के बारे में क्या सिखाता है?
रोमियों 14 आज भी कैसे प्रासंगिक है?
Romans 14 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पौलुस यह नहीं कहता कि तेरा भोजन गलत है। वह कहता है कि तेरा भाई ज़्यादा कीमती है। "जिसके लिये मसीह मरा उसको तू अपने भोजन के द्वारा नाश न कर।" ज़रा सोच, जिस व्यक्ति को तू अपनी आज़ादी से ठेस पहुँचा रहा है, उसी के लिए मसीह ने लहू बहाया। क्या तेरी थाली उस लहू से भारी है?
जो विश्वास में निर्बल है, उसे अपनी संगति में ले लो, परन्तु उसकी शंकाओं पर विवाद करने के लिए नहीं।" ध्यान दो, पौलुस यह नहीं कहता कि पहले उसे सुधारो, फिर अपनाओ। पहले संगति, फिर सब कुछ। हम अक्सर उल्टा करते हैं, बहस जीतकर दिल जीतना चाहते हैं। किसी के विश्वास की कमज़ोरी तुम्हारे लिए चर्चा का विषय है या प्रेम का?
तू जिस भाई को खाने पीने की बात पर तुच्छ समझ रहा है, उसका घुटना भी एक दिन उसी सिंहासन के सामने टिकेगा जिसके सामने तेरा टिकेगा। "हर एक घुटना मेरे सामने टिकेगा, और हर एक जीभ परमेश्वर को अंगीकार करेगी।" जब सब कुछ उसी के सामने खुलना है, तो मैं दूसरे का न्याय करने की जल्दी क्यों करूँ? आज उसी घुटने को झुकाकर देख, फिर भाई का चेहरा अलग दिखेगा।
इस अंश को किसी और स्तर पर देखें
शुरुआती, धर्मशास्त्री, या कोई अलग लंबाई? सेटिंग्स बदलें और अपना संस्करण बनाएँ।
अध्ययन टूल में खोलें
