जकर्याह 12
पाठ
जकर्याह 12 की सबसे चुभती हुई पंक्ति बीच में छिपी है: "तब वे मुझे ताकेंगे अर्थात् जिसे उन्होंने बेधा है।" परमेश्वर स्वयं बोल रहे हैं, और वे अपने ही विषय में कहते हैं कि उनके लोगों ने उन्हें बेधा। अध्याय यरूशलेम की घेराबंदी से शुरू होता है, जहाँ परमेश्वर नगर को जातियों के लिए "लड़खड़ा देने के नशा का कटोरा" और "इतना भारी पत्थर" बना देते हैं कि उठानेवाले घायल हो जाएँ। फिर अचानक युद्ध का शोर थम जाता है और उसकी जगह रोना आ जाता है: परिवार दर परिवार, अलग-अलग, पुरुष अलग और स्त्रियाँ अलग, पूरे देश में एक ऐसा विलाप जैसा इकलौते पुत्र की मृत्यु पर होता है।
मर्म
यह अध्याय दो चीज़ों को एक साथ रखता है जिन्हें हम आमतौर पर अलग रखते हैं: विजय और शोक। परमेश्वर अपने लोगों की रक्षा करते हैं, घोड़ों को अंधा कर देते हैं, लड़खड़ाते हुए को दाऊद जैसा बना देते हैं। पर जब सारा खतरा टल जाता है, तब वे आँसू भेजते हैं। और ये पश्चात्ताप के आँसू हैं, जो हार से नहीं, अनुग्रह से उपजते हैं: "मैं… अपना अनुग्रह करनेवाली और प्रार्थना सिखानेवाली आत्मा उण्डेलूँगा।" पहले आत्मा, फिर दर्शन, फिर विलाप। यानी मनुष्य अपने आप अपने पाप को नहीं देख पाता; उसे देखने की दृष्टि भी दान में मिलती है। परमेश्वर जिन्हें बचाते हैं, उन्हें वे यह भी दिखाते हैं कि उनकी रक्षा की कीमत किसने चुकाई।
सूत्र
यूहन्ना ने क्रूस के नीचे खड़े होकर यही वचन उद्धृत किया, जब सैनिक ने यीशु की पसली बेधी। उसने जकर्याह की पंक्ति को ज्यों का त्यों उठा लिया, क्योंकि उसने देखा कि जिसे बेधा गया वह कोई और नहीं, परमेश्वर ही थे, देह में। यहीं वह उलझन सुलझती है जो मूल पाठ में बनी रहती है: परमेश्वर कहते हैं "मुझे ताकेंगे", फिर "उसके लिये ऐसे रोएँगे जैसे एकलौते पुत्र के लिये"। मैं और वह, एक ही वाक्य में। पुराना नियम यहाँ ऐसी बात कह रहा है जिसे वह स्वयं पूरी तरह नहीं खोल सकता, और गुड फ्राइडे उसे खोल देता है। बचाव और बेधा जाना एक ही घटना के दो पहलू हैं। यरूशलेम उस भारी पत्थर की तरह है जिस पर जातियाँ ठोकर खाती हैं, और यीशु ने वही छवि अपने ऊपर लागू की।
दर्पण
हम में से अधिकांश उद्धार को राहत की तरह लेते हैं: संकट टला, नौकरी बची, जाँच की रिपोर्ट ठीक आई, बच्चा सँभल गया। धन्यवाद देते हैं और आगे बढ़ जाते हैं। जकर्याह कहता है कि असली उद्धार हमें आगे नहीं, भीतर ले जाता है। वह हमें उस पर ताकने को विवश करता है जिसे हमने बेधा, और यह "हमने" हमसे वह दूरी छीन लेता है जिसमें हम पाप को दूसरों की समस्या मानकर जी लेते हैं। ध्यान दीजिए कि विलाप सामूहिक नहीं, पारिवारिक और व्यक्तिगत है: हर परिवार अलग, स्त्रियाँ अलग। भीड़ में छिपकर पश्चात्ताप नहीं होता। आज दस मिनट निकालकर अकेले बैठिए, यूहन्ना 19 का क्रूस का दृश्य धीरे-धीरे पढ़िए, और ज़ोर से एक वाक्य में वह एक काम कहिए जिसके लिए आपको क्षमा चाहिए, बिना सफ़ाई जोड़े।
संदर्भ
जकर्याह बेबीलोन से लौटे हुए उस छोटे-से समुदाय से बोलता है जिसने मंदिर दोबारा बनाया, पर जिसके पास न राजा था, न सेना, न दीवारें जैसी पहले थीं। यहूदा फारसी साम्राज्य का एक मामूली प्रांत था, यरूशलेम एक कस्बा जिसमें आबादी कम और उत्साह और भी कम। ऐसे लोगों को कहा जा रहा है कि एक दिन पृथ्वी की सारी जातियाँ उनके विरुद्ध इकट्ठी होंगी और टूट जाएँगी। वचन की शुरुआत ही इस दावे को टिकाने के लिए है: यहोवा "आकाश का ताननेवाला, पृथ्वी की नींव डालनेवाला और मनुष्य की आत्मा का रचनेवाला है"। जो सृष्टि रच सकते हैं, वे इतिहास भी मोड़ सकते हैं, चाहे वर्तमान कितना ही छोटा दिखे।
श्रोता
उन लौटे हुए लोगों के कानों में "दाऊद का घराना" शब्द दर्द से भरा था। दाऊद का वंश अब सिंहासन पर नहीं था; जरुब्बाबेल एक राज्यपाल भर था। और यहाँ परमेश्वर कहते हैं कि दाऊद का घराना "परमेश्वर के समान होगा"। यह अतिशयोक्ति नहीं, प्रतिज्ञा थी: वह वंश मरा नहीं। साथ ही वे सुनते हैं कि यहोवा "पहले यहूदा के तम्बुओं का उद्धार करेगा", यानी गाँव के किसान पहले, राजधानी के प्रतिष्ठित लोग बाद में, ताकि कोई "अपने-अपने वैभव के कारण" डींग न मारे। जिन्हें शक्ति का कोई हिस्सा नहीं मिला था, उनके लिए यह वाक्य सोने जैसा था।
बारीकी
"प्रार्थना सिखानेवाली आत्मा" वाले वाक्य में जो इब्रानी शब्द है, हेन, उसका अर्थ है अनुग्रह, कृपा, मुफ़्त में दी गई दया। परमेश्वर दया माँगने की क्षमता भी दया में ही देते हैं। यह छोटी-सी बात पूरे अध्याय का ताला खोल देती है: विलाप परमेश्वर के क्रोध का परिणाम नहीं, उनके वरदान का परिणाम है। पश्चात्ताप कोई शुल्क नहीं जो हम चुकाकर क्षमा खरीदें; वह क्षमा का पहला फल है। इसीलिए यह अध्याय आँसुओं पर खत्म होता है और अगला अध्याय तुरंत एक खुले सोते से शुरू होता है। जो रोना परमेश्वर स्वयं जगाते हैं, वह कभी बिना धुलाई के नहीं छोड़ा जाता।
चिंतन
आपके जीवन में वह कौन-सी बचाई हुई परिस्थिति है जिसके लिए आपने धन्यवाद तो दिया, पर कभी यह नहीं पूछा कि उसकी कीमत किसने चुकाई?
क्या आपका पश्चात्ताप भय से आता है या उस अनुग्रह से जो पहले ही उण्डेला जा चुका है, और यह अंतर आपकी प्रार्थना में कैसे सुनाई देता है?
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Zechariah 12 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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Zechariah 12 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
यहोवा जो आकाश का ताननेवाला, पृथ्वी की नींव डालनेवाला, और मनुष्य की आत्मा का रचनेवाला है।" ध्यान दे, जिन हाथों ने आकाश फैलाया, उन्हीं हाथों ने तेरे भीतर की आत्मा गढ़ी। तू उसके लिए कोई छोटी चीज़ नहीं। जब भीतर सब टूटा सा लगे, याद रख, वह तेरे मन की बनावट जानता है, क्योंकि उसी ने उसे बनाया।
पिता, धन्यवाद कि आप स्वयं कहते हैं, "मैं उन सब जातियों को नाश करने का यत्न करूँगा जो यरूशलेम पर चढ़ाई करेंगी।" मुझे अपनी रक्षा आप ही करने की ज़रूरत नहीं, क्योंकि आप अपने लोगों के लिए लड़ते हैं। जो शक्तियाँ मुझे डराती हैं, वे आपके सामने टिक नहीं सकतीं। इस सुरक्षा के लिए मेरा मन आभारी है।
और देश के सब कुल अलग-अलग विलाप करेंगे, दाऊद का घराना अलग, और उनकी स्त्रियाँ अलग।" ध्यान दे, यह शोक भीड़ का नहीं है। हर घराना अलग, हर पति अलग, हर पत्नी अलग। जिसे उन्होंने बेधा था, उसे देखकर हर दिल अपने हिस्से का पश्चाताप करता है। किसी दूसरे के आँसू उधार नहीं मिलते। तेरा अकेलापन परमेश्वर के सामने खाली नहीं, वहीं तो उसकी क्षमा तुझसे मिलती है।
यरूशलेम कोई ताकतवर नगर नहीं था। घिरा हुआ, छोटा, बेबस। फिर भी परमेश्वर कहता है, "देखो, मैं यरूशलेम को चारों ओर की सब जातियों के लिये लड़खड़ा देनेवाला कटोरा ठहराऊँगा।" जो कुचलने आए, वही डगमगाकर गिरे। तेरी सुरक्षा तेरी दीवारों में नहीं, उसके इस "मैं" में है। आज तू घिरा हुआ महसूस करता है? वह घेरनेवालों को देख रहा है।
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