जकर्याह 4
पाठ
आधी रात को, जैसे किसी को गहरी नींद से झकझोरकर उठाया जाए, वैसे ही स्वर्गदूत ज़कर्याह को जगाता है। आँखें खुलती हैं और सामने एक दृश्य है: ठोस सोने की दीवट, उसकी चोटी पर तेल का कटोरा, सात दीपक, और हर दीपक तक तेल पहुँचाने वाली नालियाँ; दीवट के दोनों ओर जैतून के दो वृक्ष खड़े हैं। ज़कर्याह पूछता है, "ये क्या हैं?" और उत्तर में एक दृश्य-व्याख्या नहीं, बल्कि एक वचन आता है, जो सीधे राज्यपाल ज़रुब्बाबेल के लिए है: "न तो बल से, और न शक्ति से, परन्तु मेरे आत्मा के द्वारा होगा।" पहाड़ मैदान बनेगा, चोटी का पत्थर लगेगा, और भीड़ पुकारेगी: अनुग्रह हो, अनुग्रह।
मर्म
यह वचन उन लोगों को मिला जिनके पास साधन नहीं थे। निर्वासन से लौटी एक छोटी-सी बस्ती, टूटी दीवारें, मंदिर की अधूरी नींव, फ़ारसी साम्राज्य की छाया, और पड़ोसियों की शिकायतें। ऐसे लोगों से परमेश्वर यह नहीं कहते कि "हिम्मत रखो, तुम कर सकते हो।" वे कहते हैं: यह तुम्हारे बल से होगा ही नहीं। इब्रानी शब्द रूआख, जिसका अर्थ आत्मा, श्वास और हवा तीनों है, यहाँ निर्णायक है। जो काम परमेश्वर के घर का है, वह उनकी साँस से चलता है, न कि हमारी मांसपेशियों से। यह आराम देने वाला वचन है, पर साथ ही अपमानजनक भी: हमारी गिनती, हमारा चंदा, हमारी रणनीति, कुछ भी निर्णायक नहीं। दीवट खुद नहीं जलती; उसे तेल दिया जाता है।
जोड़ने वाला सूत्र
ज़रुब्बाबेल दाऊद के घराने का वंशज था, बिना मुकुट का राजकुमार, फ़ारस का नियुक्त अधिकारी। उसके हाथ में साहुल है, सिंहासन नहीं। और फिर भी परमेश्वर उसी के हाथों से मंदिर पूरा कराते हैं। यह वह रेखा है जो आगे चलकर मत्ती के वंशावली में ज़रुब्बाबेल के नाम से होकर यीशु मसीह तक पहुँचती है: दाऊद का घराना, जो राख में बैठा है, पर मिटा नहीं। "अनुग्रह हो, अनुग्रह!" का नारा भी आगे की ओर इशारा करता है, क्योंकि परमेश्वर का अंतिम भवन भी पत्थर-पत्थर जोड़कर कमाया नहीं जाता, वह दिया जाता है। जो बड़ा पहाड़ मसीह के सामने मैदान हुआ, वह मृत्यु थी, और वहाँ भी बल नहीं, आत्मा का काम था।
आइना
आपके जीवन में भी कोई बड़ा पहाड़ है। वह किसी सहकर्मी का विरोध हो सकता है, घर का कर्ज़, बीमार शरीर, या वह बच्चा जो बातचीत बंद कर चुका है। और इस पहाड़ के सामने हम दो में से एक काम करते हैं: या तो दाँत भींचकर और ज़ोर लगाते हैं, या हार मानकर कहते हैं कि यह काम बहुत छोटा और बेमानी है। ज़कर्याह का वचन दोनों को काटता है। "किसने छोटी बातों का दिन तुच्छ जाना है?" परमेश्वर की सातों आँखें उस दिन पर टिकी हैं जिसे आप शर्म से छिपाते हैं: आधी बनी दीवार, आधी सुधरी आदत, आधी निभाई ज़िम्मेदारी। आज वह एक छोटा, बिना तारीफ़ वाला काम कागज़ पर लिखिए जो आपने इस हफ़्ते किया, और उसे ज़ोर से पढ़कर कहिए: "अनुग्रह हो, अनुग्रह।"
एक बारीकी
ध्यान दीजिए कि इस दीवट के पास कोई पुरोहित नहीं खड़ा है। मंदिर की असली दीवट को हर शाम तेल से भरना पड़ता था; किसी को जैतून कूटने थे, तेल छानना था, बत्तियाँ सँवारनी थीं। ज़कर्याह के दर्शन में वह सारा मानवीय श्रम गायब है। जैतून के वृक्ष सीधे खड़े हैं और डालियाँ "सुनहरा तेल उण्डेलती हैं" नालियों के द्वारा, अपने आप। यही बारीकी पूरे दर्शन की कुंजी है। परमेश्वर के लोग प्रकाश हैं, पर उनके पास अपना ईंधन नहीं है। जब भी कलीसिया सोचती है कि वह अपनी ऊर्जा से जल रही है, वह इस दर्शन को भूल चुकी है। और जब वह थककर बुझने लगती है, तब भी यह दर्शन कहता है: तेल कहीं और से आता है।
मुख्य पात्र
इस अध्याय का मुख्य पात्र न ज़कर्याह है, न ज़रुब्बाबेल, बल्कि "सेनाओं का यहोवा" हैं, और उनका चित्रण चौंकाने वाला है। वे सातों आँखों से सारी पृथ्वी पर दृष्टि करते हैं, यानी कुछ भी उनकी नज़र से बाहर नहीं; साम्राज्यों की चालें भी नहीं, यहूदा की निराशा भी नहीं। पर यह सर्वदर्शी परमेश्वर अंत में कहीं और देखते हैं: ज़रुब्बाबेल के हाथ में पकड़े गए साहुल पर। और प्रतिक्रिया? वे "आनन्दित होगा।" सारी पृथ्वी के स्वामी एक आदमी के हाथ में पकड़ी नापने की रस्सी देखकर खुश होते हैं। यही परमेश्वर का स्वभाव है: वे बड़े को तोलते हैं और छोटे पर मुस्कुराते हैं।
अंतर्पाठ
एज़्रा की पुस्तक बताती है कि जब नींव डाली गई, तो बुज़ुर्ग, जिन्होंने सुलैमान का मंदिर देखा था, रोने लगे, क्योंकि यह नया मंदिर उसके सामने कुछ भी नहीं था। उनके आँसू और ज़कर्याह का "छोटी बातों का दिन" एक ही घाव से निकलते हैं। दूसरी ओर, प्रकाशितवाक्य 11 में यूहन्ना "जैतून के दो वृक्ष" को फिर देखता है, अब दो गवाहों के रूप में, जो विरोध के बीच गवाही देते हैं। ज़कर्याह के दर्शन में वे दो "ताजे तेल से भरे हुए" पुरुष थे, राज्यपाल और महापुरोहित; अब वे परमेश्वर की गवाह कलीसिया बन जाते हैं। तेल की नाली बंद नहीं हुई, उसका मुँह चौड़ा हो गया।
चिंतन के प्रश्न
आपके जीवन में वह कौन-सा काम है जिसे आप "बल और शक्ति" से पूरा करने की कोशिश में थक चुके हैं, और उसमें आत्मा के द्वारा होने का क्या अर्थ होगा?
अगर परमेश्वर आज आपके हाथ के छोटे, अधूरे काम को देखकर आनन्दित होते हैं, तो आपको अपने बारे में कौन-सी बात बदलकर सोचनी पड़ेगी?
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Zechariah 4 के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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Zechariah 4 पर समुदाय क्या साझा करता है
इस अंश पर पाठकों और संपादकीय टीम से अंतर्दृष्टि, प्रार्थनाएँ और धन्यवाद।
पिता, मेरे मन में भी बहुत से सवाल हैं जिनके जवाब मुझे अभी नहीं मिलते। जैसे उस नबी ने पूछा था, वैसे ही मैं भी पूछता हूँ, और तू नाराज़ नहीं होता। मुझे धीरज दे कि मैं पूछता रहूँ और तेरे समय का इंतज़ार करूँ, यह जानकर कि तेरी रोशनी बुझती नहीं।
और उसके पास जैतून के दो वृक्ष हैं, एक कटोरे की दाहिनी ओर, और दूसरा उसकी बाईं ओर।" दीवट को जलते रहने के लिए किसी इंसान को तेल भरने नहीं आना पड़ता, पेड़ खुद उसमें तेल उँडेलते रहते हैं। जकर्याह थके हुए लोगों के बीच था, मन्दिर अधूरा था। परमेश्वर ने कहा, तेरी रोशनी तेरी मेहनत पर नहीं टिकी। आज भी वही सच है: तू जलता रह, तेल भरना मेरा काम है।
प्रभु, तेरा वचन आज भी मेरे भीतर आता है और हिम्मत देता है। जिस काम की नींव तूने मेरे जीवन में रखी है, उसे तू ही पूरा करेगा, यह भरोसा मुझे थामे रहे। जब काम अधूरा दिखे, तब मुझे तेरी आवाज़ सुनने की सुनने की शक्ति दे।
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