धैर्य और मौन में परमेश्वर पर भरोसा
धैर्य और भरोसा
शांत मन से मनन करने योग्य छोटे विचार, इन बाइबल अंशों से लिए गए भजन संहिता 90:17, नीतिवचन 19:11, अय्यूब 23:3-4 and भजन संहिता 4:4.
☀ सुबह का पल
हमारे परमेश्वर यहोवा की मनोहरता हम पर प्रगट हो, तू हमारे हाथों का काम हमारे लिये दृढ़ कर, हमारे हाथों के काम को दृढ़ कर।
भजन संहिता 90:17
हथेली पर अभी तक रात की नींद की गर्माहट है, और पहला औज़ार, पहली किताब, पहला बर्तन उठाने से पहले हाथ थोड़े भारी लगते हैं। यही वह क्षण है जिसमें भजनकार खड़ा है, अपने काम की शुरुआत में, यह जानते हुए कि उसके हाथ कमज़ोर हैं पर काम असली है।
वह यह नहीं कहता कि काम आसान होगा। वह सिर्फ यह माँगता है कि परमेश्वर का अनुग्रह उस पर टिका रहे, और यह कि जो हाथ आज उठेंगे, उनका काम स्थिर हो, बेकार न जाए। यह प्रार्थना किसी बड़े काम की नहीं है, रोज़ की मेहनत की है, जैसी आज तुम्हारे सामने भी है।
सुबह जब मन में यह डर हो कि आज का दिन बोझिल निकलेगा, तो यही शब्द याद रखने लायक हैं। परमेश्वर तुम्हारे हाथों को देखता है, चाहे वे कीबोर्ड पर हों, बर्तन पर हों, या किताब के पन्नों पर। वह उन्हें स्थिर करने का वादा करता है।
यह भरोसा थकान को नहीं मिटाता, पर उसमें एक ठहराव जोड़ देता है। तुम अकेले काम नहीं करते, उसका अनुग्रह पहले से तुम पर है।
आज
एक कागज़ के टुकड़े पर आज का सबसे पहला काम लिख लो, और लिखते ही धीरे से कह दो, प्रभु, इस काम को स्थिर कर।
✦ दोपहर का पल
जो मनुष्य बुद्धि से चलता है वह विलम्ब से क्रोध करता है, और अपराध को भुलाना उसको शोभा देता है।
नीतिवचन 19:11
तुम्हारा गुस्सा तुम्हारी ताकत नहीं है।
सुबह से जो बात मन में कहीं फँसी रह गई है, वह अभी भी वहीं है। किसी ने मीटिंग में तुम्हारी बात काट दी, किसी ईमेल का लहजा कड़वा लगा, या किसी सहकर्मी की लापरवाही ने तुम्हारा दिन बिगाड़ दिया। दोपहर का यह छोटा-सा ठहराव अक्सर वही जगह है जहाँ यह सब भीतर उबलता है।
नीतिवचन कहता है कि समझदारी आदमी को गुस्सा करने में धीमा बनाती है। यह कमज़ोरी नहीं, बुद्धि है। जो जल्दी भड़क उठता है, वह अपने आप को खो देता है। जो रुक जाता है, वह अपने ऊपर काबू रखता है।
और फिर यह चौंकाने वाली बात, अपमान को नज़रअंदाज़ करना शर्म की बात नहीं, महिमा की बात है। दुनिया सिखाती है कि हर बात का जवाब देना ज़रूरी है, हर चोट का बदला लेना पड़ता है। पर परमेश्वर का वचन कुछ और कहता है, हर लड़ाई तुम्हारी नहीं है।
दोपहर के इस छोटे-से क्षण में यह याद रखने लायक है। तुम्हें हर बात का जवाब देने की ज़रूरत नहीं। कभी-कभी सबसे बुद्धिमान काम है, चुप रहना और आगे बढ़ जाना।
आज
अभी उस बात या व्यक्ति का नाम मन में लाओ जिसने आज सुबह तुम्हें चोट पहुँचाई। एक गहरी साँस लो, चुपचाप कहो, "मैं इसे छोड़ता हूँ," और फिर बिना जवाब भेजे अपने काम पर लौट जाओ।
◐ दोपहर का पल
भला होता, कि मैं जानता कि वह कहाँ मिल सकता है, तब मैं उसके विराजने के स्थान तक जा सकता! मैं उसके सामने अपना मुकद्दमा पेश करता, और बहुत से प्रमाण देता।
अय्यूब 23:3-4
अय्यूब जो शब्द चुनता है वह अनजाने में मार्के का है: वह गले लगाने की जगह नहीं ढूँढ़ता, वह 'गद्दी' ढूँढ़ता है। गद्दी माने न्याय की कुर्सी, वह जगह जहाँ मुकद्दमे सुने जाते हैं और फैसले दिए जाते हैं। यह शब्द जितना छोटा है उतना ही भारी है। अय्यूब को किसी की गोद नहीं चाहिए जहाँ वह बस रो सके; उसे एक अदालत चाहिए जहाँ वह बोल सके।
इसलिए वह आगे कहता है कि वह अपना मुकद्दमा ठीक से सजाकर रखेगा और अपना मुँह दलीलों से भर लेगा। यह किसी टूटे हुए इंसान की भाषा नहीं है, यह एक वकील की भाषा है जो अपनी फ़ाइल तैयार करता है। दर्द में भी अय्यूब बेतरतीब नहीं रोता, वह सोचकर, तर्क जोड़कर परमेश्वर के सामने आना चाहता है।
क्या यह ठीक है, परमेश्वर से इस तरह बात करना? हमें अक्सर सिखाया जाता है कि विश्वास माने चुप रहना, सवाल न पूछना। पर यहाँ अय्यूब की किताब खुद यह चुप्पी तोड़ती है, और परमेश्वर उसे रोकता नहीं। यह सवाल अभी अनुत्तरित रहता है, और शायद अभी रहना ही चाहिए।
बुधवार की इस दोपहर में, जब काम का बोझ अधूरा पड़ा है और मन थका हुआ है, यह आसान है सिर्फ शांत हो जाने की कोशिश करना, जैसे शांति ही उत्तर हो। पर कभी-कभी जो चाहिए वह चुप्पी नहीं, स्पष्टता है, अपने दर्द को नाम देने की, उसे तर्क में बदलने की हिम्मत।
आज
अभी दस मिनट निकालो और एक कागज़ पर लिखो, 'परमेश्वर, मेरी दलील यह है...' और उसे पूरे, सोचे-समझे वाक्यों में लिखो, जैसे किसी अदालत में पेश करना हो। इसे छिपाओ मत, लिखने के बाद उस कागज़ को अपनी बाइबल के भीतर रख दो।
☾ संध्या का क्षण
काँपते रहो और पाप मत करो; अपने-अपने बिछौने पर मन ही मन में ध्यान करो और चुपचाप रहो। (सेला) (इफि. 4:26)
भजन संहिता 4:4
दिन भर की बातें जब बिस्तर तक पीछा करती हैं, तो लगता है कि उन्हें सुलझाए बिना नींद नहीं आएगी। हिसाब-किताब, कल की चिंता, कही-अनकही बातें, मन इन्हें बार-बार पलटता रहता है, मानो जागते रहना ही समाधान का रास्ता है।
पर यह वचन एक अलग रास्ता दिखाता है। बिछौने पर मन से बातें करना है, पर चुप रहकर। यानी हिसाब लगाना नहीं, बल्कि शांत होना। सोचना नहीं, बल्कि सौंपना।
यह चुप्पी कमज़ोरी नहीं है। यह भरोसे का चिन्ह है, कि परमेश्वर के सामने अब और तर्क करने की ज़रूरत नहीं। दिन जैसा बीता, वैसा ही उसके हाथों में रखा जा सकता है।
आज बुधवार की थकान, काम की बातें, छोटी-बड़ी उलझनें, सब कुछ शब्दों में बदलने की ज़रूरत नहीं। बस मन के भीतर एक क्षण रुकना है, और जो कुछ भारी लगा उसे कहकर छोड़ देना है।
आज
सोने से पहले, एक छोटे कागज़ पर आज की वह एक बात लिखें जो अब तक मन में अटकी हुई है। फिर उसे धीरे से ज़ोर से पढ़ें, परमेश्वर से कहें कि यह अब आपके हाथ में है, और कागज़ को मोड़कर अलग रख दें।
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17हमारे परमेश्वर यहोवा की मनोहरता हम पर प्रगट हो, तू हमारे हाथों का काम हमारे लिये दृढ़ कर, हमारे हाथों के काम को दृढ़ कर।
11जो मनुष्य बुद्धि से चलता है वह विलम्ब से क्रोध करता है, और अपराध को भुलाना उसको शोभा देता है।
3भला होता, कि मैं जानता कि वह कहाँ मिल सकता है, तब मैं उसके विराजने के स्थान तक जा सकता!
4मैं उसके सामने अपना मुकद्दमा पेश करता, और बहुत से प्रमाण देता।
4काँपते रहो और पाप मत करो; अपने-अपने बिछौने पर मन ही मन में ध्यान करो और चुपचाप रहो। (सेला) (इफि. 4:26)
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