अनजान राह पर भरोसे का सहारा
भरोसे का सहारा
शांत मन से मनन करने योग्य छोटे विचार, इन बाइबल अंशों से लिए गए यशायाह 42:16, नीतिवचन 16:26, रोमियों 7:19 and भजन संहिता 62:8.
☀ सुबह का पल
मैं अंधों को एक मार्ग से ले चलूँगा जिसे वे नहीं जानते और उनको ऐसे पथों से चलाऊँगा जिन्हें वे नहीं जानते। उनके आगे मैं अंधियारे को उजियाला करूँगा और टेढ़े मार्गों को सीधा करूँगा। मैं ऐसे-ऐसे काम करूँगा और उनको न त्यागूँगा। (लूका 3:5, यशा. 29:18)
यशायाह 42:16
पहाड़ी रास्ते पर भोर से पहले चलने वाला मार्गदर्शक अपने साथी का हाथ कसकर पकड़ लेता है। कोहरे में पथरीली पगडंडी दिखाई नहीं देती, पैर कहाँ रखना है यह अंदाज़े से नहीं, भरोसे से तय होता है। मार्गदर्शक हर मोड़ पर हल्के से हाथ दबाता है, कभी बाईं ओर, कभी दाईं ओर, बिना समझाए, बिना देर किए।
यशायाह इसी तस्वीर से परमेश्वर की बात कहता है। वह अंधे को ऐसे रास्ते से ले जाता है जो उसे खुद नहीं मालूम, और वहीं टेढ़े को सीधा कर देता है। यह किसी आँकड़े का वादा नहीं, बल्कि हाथ पकड़ने का वादा है।
आज का दिन भी कुछ ऐसा ही अनजाना है। कौन-सी बातचीत कठिन निकलेगी, कौन-सा फैसला उलझा देगा, यह अभी साफ नहीं। पर परमेश्वर रास्ते के आगे नहीं बल्कि साथ चलता है, हाथ में हाथ लिए।
यह भरोसा थकान को उड़ा नहीं देता, पर उसे हल्का कर देता है। जिस परमेश्वर के पास मार्ग है, वही अंधेरे को उजाला बनाना भी जानता है।
आज
घर से निकलने से पहले दरवाज़े की सिटकिनी पर हाथ रखें और धीरे से बोलें, यहोवा, आज के अनजाने रास्ते पर मुझे ले चल। फिर दरवाज़ा खोलकर दिन में चल पड़ें।
✦ दोपहर का पल
परिश्रमी की लालसा उसके लिये परिश्रम करती है, उसकी भूख तो उसको उभारती रहती है।
नीतिवचन 16:26
"भूख" शब्द पर थोड़ा ठहर जाओ। यह वही भूख है जो अभी तुम्हारे पेट में बोल रही है, जब घड़ी की सुई दोपहर के पास पहुँच रही है और डेस्क पर काम अभी अधूरा पड़ा है। तुम शायद इस भूख को रुकावट मानते हो, कुछ ऐसा जो काम से ध्यान भटकाता है।
पर नीतिवचन इसे अलग नजर से देखता है। यहाँ भूख कोई कमजोरी नहीं है, यह वही ताकत है जो सुबह से तुम्हें उठाकर काम पर ले आई। मुँह की माँग, पेट की जरूरत, यही तो एक इंसान को मेहनत के लिए प्रेरित करती है। यह शर्म की बात नहीं, यह जीवन की सच्चाई है जिसे परमेश्वर ने ही रचा है।
हम अक्सर सोचते हैं कि आध्यात्मिक होने का मतलब है शरीर की माँगों को नजरअंदाज करना। पर यह वचन याद दिलाता है कि शरीर की भूख भी परमेश्वर की रचना का हिस्सा है। जो थकान तुम्हें अभी महसूस हो रही है, वह गलत नहीं है, वह इंसान होने का हिस्सा है।
इसलिए इस भूख को दबाओ मत। इसे सुनो, और उसमें भी परमेश्वर की भलाई को पहचानो, जिसने तुम्हारे शरीर को इस तरह बनाया कि वह आराम और भोजन दोनों माँगे।
आज
अभी अपना खाना खोलो, फोन को एक तरफ रख दो, और पहला कौर खाने से पहले धीरे से यह कहो, "धन्यवाद, यह भोजन आपकी ओर से है।" फिर बिना जल्दी के, पूरे मन से खाना खाओ।
◐ दोपहर का पल
क्योंकि जिस अच्छे काम की मैं इच्छा करता हूँ, वह तो नहीं करता, परन्तु जिस बुराई की इच्छा नहीं करता, वही किया करता हूँ।
रोमियों 7:19
दोपहर के ठीक पौने दो बजे, मीटिंग रूम की मेज़ पर, उसने फिर वही तीखा जवाब दे दिया जो सुबह चाय पीते हुए न देने की कसम खाई थी। फोन बंद करते हुए उसे याद आया, यह इस हफ्ते तीसरी बार है।
पौलुस इस पद में कोई सफाई नहीं देता। वह यह नहीं कहता कि हालात कठिन थे या दूसरा व्यक्ति गलत था। वह सीधे कहता है, जो अच्छा करना चाहता हूँ वह नहीं करता, जो बुरा नहीं करना चाहता वही करता हूँ। यह किसी नए विश्वासी की बात नहीं, एक प्रेरित की स्वीकारोक्ति है।
यहाँ कोई तुरंत हल नहीं मिलता। पद के ठीक बाद पौलुस चिल्लाता है, यह अध्याय अभी दुख की गाँठ पर ही रुकता है, समाधान अगले पद में मिलता है, आज नहीं। यह चाहने पर भी हर बार असफल हो जाने की सच्चाई है, जिसे हम अक्सर छुपाकर रखते हैं।
शायद आज दोपहर की थकान में सवाल यही है, क्या मैं अपनी असफलता को इतनी साफ़गोई से देख पाता हूँ जितनी पौलुस ने देखी। हम अक्सर बहाना ढूँढते हैं, थकान, दबाव, दूसरे की गलती। पौलुस बहाना नहीं ढूँढता, वह सीधे अपने भीतर के द्वंद्व को नाम देता है।
यह पद हमें आराम नहीं देता, बेचैन करता है। और शायद यही इसका काम है, ताकि हम अपनी ताक़त पर भरोसा छोड़ें।
आज
अभी, इस पल, आज की उस एक बात को कागज़ पर लिख लें जो आपने करने की ठानी थी पर नहीं कर पाए, और उसे बिना बहाने के ऊँची आवाज़ में परमेश्वर के सामने कह दें।
☾ संध्या का क्षण
हे लोगों, हर समय उस पर भरोसा रखो; उससे अपने-अपने मन की बातें खोलकर कहो; परमेश्वर हमारा शरणस्थान है। (सेला)
भजन संहिता 62:8
रसोई की बत्ती अभी जल रही है, पर हाथ थम गए हैं। मंगलवार की भागदौड़ अब पीछे छूट रही है, और शरीर धीरे-धीरे यह मान रहा है कि आज का काम पूरा हुआ।
पूरे दिन मन में कई बातें इकट्ठी होती रहीं, कोई फैसला जो लेना था, कोई शब्द जो चुभ गया, कोई चिंता जो सुबह से साथ चल रही थी। ऐसी बातों को हम अक्सर अपने भीतर ही दबाए रखते हैं, यह सोचकर कि इन्हें संभालना हमारी ही ज़िम्मेदारी है।
पर भजनकार एक अलग रास्ता दिखाता है। वह कहता है कि हृदय को खोलकर परमेश्वर के सामने रख दिया जाए। यह कोई कमजोरी नहीं, बल्कि विश्वास का काम है, यह मान लेना कि परमेश्वर सच में सुन रहा है और सच में शरण है।
जो बात हम दिनभर अकेले ढोते रहे, वह इस शाम परमेश्वर के हाथ में रखी जा सकती है। वह हमें संभालने से थकता नहीं, और उसका ध्यान हमसे कभी नहीं हटता।
आज
इस शाम, चुपचाप बैठ जाइए और आज की सबसे भारी बात मन में लाइए। उसे शब्दों में बोलकर परमेश्वर के सामने रख दीजिए, बस इतना कहिए, यह मेरा बोझ है, और मैं इसे तेरे हाथ में सौंपता हूँ।
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16मैं अंधों को एक मार्ग से ले चलूँगा जिसे वे नहीं जानते और उनको ऐसे पथों से चलाऊँगा जिन्हें वे नहीं जानते। उनके आगे मैं अंधियारे को उजियाला करूँगा और टेढ़े मार्गों को सीधा करूँगा। मैं ऐसे-ऐसे काम करूँगा और उनको न त्यागूँगा। (लूका 3:5, यशा. 29:18)
26परिश्रमी की लालसा उसके लिये परिश्रम करती है, उसकी भूख तो उसको उभारती रहती है।
19क्योंकि जिस अच्छे काम की मैं इच्छा करता हूँ, वह तो नहीं करता, परन्तु जिस बुराई की इच्छा नहीं करता, वही किया करता हूँ।
8हे लोगों, हर समय उस पर भरोसा रखो; उससे अपने-अपने मन की बातें खोलकर कहो; परमेश्वर हमारा शरणस्थान है। (सेला)
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